[23/09, 7:58 pm] sanantha.50@gmail.com: अपनी धरती अपना जीवन।
एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु
24-9-26.
जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी" एक प्रसिद्ध संस्कृत सूक्ति है जिसका अर्थ है कि माता और मातृभूमि स्वर्ग से भी महान या श्रेष्ठ हैं
हमारे बचपन यही पिता।
हमारे खून के रिश्ते यहीं रहते हैं।
यहीं हमें शिक्षा मिली है।
यहीं हम अपने सहपाठियों के साथ खेले कूदे मौज उड़ाये।
यह मातृभूमि ही विश्व गुरु ।
जिसने विश्व को संदेश दिया,
सारा संसार एक परिवार है।
अपनी धरती अपना जीवन
सत्य का मार्ग दिखाया।
अहिंसा का मार्ग दिखाया।
सिखाया नारा दिया
जय जगत।
यहीं से गूँज उठा नारा
सर्वे जना सुखिनो भवन्तु।
त्याग का मार्ग दिखाया।
जगत मिथ्या।
जग अनश्वर
ब्रह्म सत्यं।
सनातन धर्म सिखाया
मानव के अंतिम समय
कफ़न ही,वह भी श्मशान तक।।
काली हाथ आये हैं,
खाली हाथ जाएँगे।
सिकंदर को सिखाया
बर्फ प्रदेश में
एक साधु ने
सोना चांदी नहीं चाहिए।
मेरा अपना देश ने सिखाया
आत्मा को पहचानो,
आत्मज्ञान प्राप्त करो।
माया देवी छोड़ेगी नहीं,
नारी सुख परिणाम
संतान प्रेम।
मानव का शैशव मरता है,
बचपन मरता है
जवानी मरती है
प्रोढावस्था मरती है।
इतनी बार बुढ़ापे में
मरता है।
अतः अपनी धरती अपना जीवन
जीते जी सुकर्म करो।
परोपकार करो।
वही मनुष्य है जो दूसरों केलिए जीता है मरता है।
ऐसे त्याग की भूमि,
ज्ञान भूमि
निर्गुण सगुण भक्ति की भूमि,
मेरी धरती मेरा जीवन
शांति की भूमि, अहिंसा की भूमि
संतोष की भूमि
आध्यात्मिक भूमि
अपना जीवन ब्रह्मानंद से भरा।
भारत भूमि विश्व में महान।
[23/09, 8:03 pm] sanantha.50@gmail.com: अपनी धरती, अपना जीवन
एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु
24-9-2026
“जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।”
यह प्रसिद्ध संस्कृत सूक्ति हमें सिखाती है कि माता और मातृभूमि स्वर्ग से भी महान हैं।
हमारा बचपन यहीं बीता,
हमारे पिता-पुर्खों की स्मृतियाँ यहीं जुड़ी हैं,
हमारे खून के रिश्ते यहीं रहते हैं।
यहीं हमें शिक्षा मिली,
यहीं सहपाठियों के साथ खेले-कूदे,
हँसे, मौज की और जीवन के सुंदर दिन बिताए।
अपनी धरती, अपना जीवन।
यह वही मातृभूमि है,
जिसने विश्व को ज्ञान का संदेश दिया।
“वसुधैव कुटुम्बकम्”—
सारा संसार एक परिवार है।
यहीं से सत्य का मार्ग दिखाया गया,
अहिंसा का मार्ग दिखाया गया,
“जय जगत्” का नारा गूँजा,
और प्रार्थना हुई—
“सर्वे भवन्तु सुखिनः,
सर्वे सन्तु निरामयाः।”
इस धरती ने त्याग का मार्ग दिखाया,
आत्मज्ञान का मार्ग दिखाया,
सिखाया कि बाहरी माया के पीछे भागना ही जीवन का उद्देश्य नहीं है।
“ब्रह्म सत्यं, जगन्मिथ्या”
का आध्यात्मिक संदेश
मनुष्य को अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानने की प्रेरणा देता है।
मानव जीवन की यात्रा भी कितनी अद्भुत है—
शैशव बीत जाता है,
बचपन बीत जाता है,
जवानी बीत जाती है,
प्रौढ़ावस्था भी बीत जाती है।
अंततः बुढ़ापे में मनुष्य समझता है कि
जीवन कितनी तेजी से हाथ से निकल गया।
मृत्यु के समय
न धन साथ जाता है,
न सोना-चाँदी,
न संपत्ति,
न पद-प्रतिष्ठा।
खाली हाथ आए हैं,
खाली हाथ ही जाएँगे।
सिकंदर जैसे महान विजेता को भी
भारत की धरती पर एक साधु ने
धन-संपत्ति की वास्तविकता का बोध कराया—
मनुष्य अंततः अपने साथ कुछ नहीं ले जा सकता।
मेरे अपने देश ने मुझे सिखाया—
अपने भीतर झाँको,
अपनी आत्मा को पहचानो,
आत्मज्ञान प्राप्त करो।
माया मनुष्य को बाँधती है—
नारी-सुख, संतान-प्रेम,
धन-दौलत और संसार के अनेक मोह
जीवन को अपनी ओर खींचते रहते हैं।
फिर भी इस धरती की महान शिक्षा है—
जीते-जी सुकर्म करो,
परोपकार करो,
दूसरों के जीवन में सुख और शांति बाँटो।
“वही मनुष्य है
जो दूसरों के लिए जीता है।”
ऐसी है मेरी धरती—
त्याग की भूमि,
ज्ञान की भूमि,
निर्गुण-सगुण भक्ति की भूमि,
शांति की भूमि,
अहिंसा की भूमि,
संतोष की भूमि,
आध्यात्मिक साधना की भूमि।
अपनी धरती, अपना जीवन—
यही मेरी पहचान,
यही मेरा गौरव,
यही मेरा भारत।
मेरी धरती मेरा जीवन,
मेरा जीवन ब्रह्मानंद से भरा।
यह भारत केवल मेरी जन्मभूमि नहीं, मेरी आत्मभूमि है—जिसकी मिट्टी में ऋषियों का तप, वीरों का बलिदान और संतों की करुणा आज भी धड़कती है। इसकी सेवा करना मेरे लिए पूजा है, इसके जन-जन में ईश्वर को देखना मेरी साधना है। जब तक मेरे हृदय में प्राण हैं, तब तक भारत की गरिमा, एकता और मानवता के लिए मेरा जीवन समर्पित रहेगा।
भारतभूमि विश्व में महान!
वंदे मातरम्!