Tuesday, October 13, 2026

वेद धर्म के अनुसार परोपकार।

 वेद धर्म के अनुसार परोपकार।

 अहंकार रहित 

सार्वजनिक सेवा करना 

परोपकार है।

परोपकार निस्वार्थ रूप में 

कीर्ति की इच्छा रहित करना है।

पाप मैं ने किया कहने पर,

पाप मिट जाता है,

वैसे ही मैं ने परोपकार किया है

कहने पर पुण्य मिट जाएगा।

दाये हाथ का परोपकार, 

बारे हाथ को मालूम न होना चाहिए।

प्राकृतिक पेड़,पौधे,नदी,मेघ सब

परोपकार के लिए हैं, वे अपने स्वार्थ के लिए 

संचित नहीं रखते।

अतिथि देवो भव भारतीय सिद्धांत।

 अतिथियों की सेवा भी परोपकार है।

भारतीय परोपकार में भेद भाव नहीं होते।

वसुधैव कुटुंबकम्।

 सारे संसार को परिवार समझकर 

 भेदभाव रहित सब की सेवा करना परोपकार है।

मन से सुविचार सोचना ,

सांसारिक कल्याण के लिए प्रकट करना भी परैपकार ही है।

नीतिशास्त्र बचपन से ही परोपकार सिखाते हैं।

सांसारिक सेवा करने इस शरीर का धारण करते हैं।

परोपकार वर्मा इदम् शरीरम।

सज्जनों की सारी शक्तियाँ, संपत्तियाँ

परोपकार कै लिए हैं।

परोपकार सदाम् विभूतय:।

परोपकार काम फलौति वृक्ष:।

पेड़ों पर फल परोपकार के लिए।

परोपकरार्थम् वहंति नद्यः 

परोपकार के लिए नदी बहती है।

परोपकार सामर्थ्य दुहंती कावः।

मनुष्य शरीर का धारण भी परोपकार के लिए।

 सज्जनों की क्षमताएँ, धन संपत्ति आदि

 परोपकार के लिए ही।

दान धर्म को तुरंत करना है, स्थगित करना सही नहीं।

काल कब आएगा पता नहीं।

अजरामवत् प्राज्ञः विद्याम् अर्थम् च साधयेत्।

गृही तो इन केशेषु धर्म आचरेत।।



[13/10, 6:31 am] sanantha.50@gmail.com: वेद धर्म के अनुसार परोपकार।


 अहंकार रहित 


सार्वजनिक सेवा करना 


परोपकार है।


परोपकार निस्वार्थ रूप में 


कीर्ति की इच्छा रहित करना है।


पाप मैं ने किया कहने पर,


पाप मिट जाता है,


वैसे ही मैं ने परोपकार किया है


कहने पर पुण्य मिट जाएगा।


दाये हाथ का परोपकार, 


बारे हाथ को मालूम न होना चाहिए।


प्राकृतिक पेड़,पौधे,नदी,मेघ सब


परोपकार के लिए हैं, वे अपने स्वार्थ के लिए 


संचित नहीं रखते।


अतिथि देवो भव भारतीय सिद्धांत।


 अतिथियों की सेवा भी परोपकार है।


भारतीय परोपकार में भेद भाव नहीं होते।


वसुधैव कुटुंबकम्।


 सारे संसार को परिवार समझकर 


 भेदभाव रहित सब की सेवा करना परोपकार है।


मन से सुविचार सोचना ,


सांसारिक कल्याण के लिए प्रकट करना भी परैपकार ही है।


नीतिशास्त्र बचपन से ही परोपकार सिखाते हैं।


सांसारिक सेवा करने इस शरीर का धारण करते हैं।


परोपकार वर्मा इदम् शरीरम।


सज्जनों की सारी शक्तियाँ, संपत्तियाँ


परोपकार कै लिए हैं।


परोपकार सदाम् विभूतय:।


परोपकार काम फलौति वृक्ष:।


पेड़ों पर फल परोपकार के लिए।


परोपकरार्थम् वहंति नद्यः 


परोपकार के लिए नदी बहती है।


परोपकार सामर्थ्य दुहंती कावः।


मनुष्य शरीर का धारण भी परोपकार के लिए।


 सज्जनों की क्षमताएँ, धन संपत्ति आदि


 परोपकार के लिए ही।


दान धर्म को तुरंत करना है, स्थगित करना सही नहीं।


काल कब आएगा पता नहीं।


अजरामवत् प्राज्ञः विद्याम् अर्थम् च साधयेत्।


गृही तो इन केशेषु धर्म आचरेत।।

[13/10, 6:35 am] sanantha.50@gmail.com: परोपकार।


(वेदधर्म के अनुसार)



एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु


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परोपकार का वास्तविक स्वरूप


अहंकार रहित होकर

जनकल्याण के लिए

निःस्वार्थ भाव से सेवा करना

ही सच्चा परोपकार है।


परोपकार वह है,

जिसमें स्वार्थ न हो,

कीर्ति की कामना न हो,

प्रशंसा की अपेक्षा न हो,

केवल लोककल्याण की भावना हो।


पाप करने के बाद

पश्चात्तापपूर्वक अपनी भूल स्वीकार करना

सुधार की दिशा में पहला कदम है।

उसी प्रकार,

अपने परोपकार का स्वयं प्रचार करना

उसकी निःस्वार्थ भावना को कम कर सकता है।


दाएँ हाथ से किया गया दान

बाएँ हाथ को भी पता न चले।


यही निःस्वार्थ सेवा का आदर्श है।


प्रकृति भी सिखाती है परोपकार


पेड़-पौधे, नदियाँ और मेघ

प्रकृति के अनुपम उपहार हैं।

वे अपने लिए नहीं,

दूसरों के जीवन के लिए जीते हैं।


पेड़ अपने फल स्वयं नहीं खाते,

नदियाँ अपना जल स्वयं नहीं पीतीं,

मेघ वर्षा करके धरती को तृप्त करते हैं।


प्रकृति का प्रत्येक उपहार

मानवता को परोपकार का पाठ पढ़ाता है।


परोपकाराय फलन्ति वृक्षाः।

पेड़ दूसरों के हित के लिए फलते हैं।


परोपकाराय वहन्ति नद्यः।

नदियाँ दूसरों के कल्याण के लिए बहती हैं।


भारतीय संस्कृति में परोपकार


अतिथि देवो भव।


अतिथि को देवतुल्य मानकर

उसका आदर-सत्कार करना

भारतीय संस्कृति का महान आदर्श है।


अतिथि की सेवा भी परोपकार है।


भारतीय संस्कृति हमें सिखाती है

कि सेवा में जाति, धर्म, भाषा,

ऊँच-नीच और अमीरी-गरीबी का

कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए।


वसुधैव कुटुम्बकम्।


अर्थात्, समस्त पृथ्वी

एक परिवार है।


संपूर्ण संसार को अपना परिवार मानकर

सबके प्रति प्रेम रखना,

सामर्थ्य के अनुसार सहायता करना

और भेदभाव रहित सेवा करना

ही परोपकार का व्यापक स्वरूप है।


मन में सद्विचार उत्पन्न करना,

उन्हें समाज के हित में व्यक्त करना

और दूसरों को सद्मार्ग दिखाना भी

परोपकार ही है।


नीतिशास्त्र और परोपकार


हमारे नीतिशास्त्र

बचपन से ही परोपकार की शिक्षा देते हैं।


मानव जीवन केवल

अपने सुख-साधनों के लिए नहीं है।

यह जीवन दूसरों के दुःख दूर करने,

पीड़ितों की सहायता करने

और समाज के कल्याण में योगदान देने के लिए भी है।


परोपकारार्थमिदं शरीरम्।


अर्थात्, यह शरीर परोपकार के लिए है।


सज्जनों की शक्तियाँ,

उनकी योग्यताएँ और संपत्तियाँ

केवल उनके निजी सुख के लिए नहीं,

बल्कि लोककल्याण के लिए भी हैं।


सतां विभूतयः परोपकाराय।


सज्जनों की विभूतियाँ

परोपकार के लिए होती हैं।


परोपकार ही सच्ची संपत्ति


वृक्ष अपने फल दूसरों को देते हैं,

नदियाँ अपना जल सबको देती हैं,

गाय अपने दूध से दूसरों का पोषण करती है।


इसी प्रकार,

मनुष्य को भी अपनी योग्यता,

ज्ञान, समय और संपत्ति का

यथाशक्ति सदुपयोग

दूसरों के कल्याण के लिए करना चाहिए।


धनवान होना ही महानता नहीं है;

धन का सदुपयोग करना महानता है।


विद्वान होना ही पर्याप्त नहीं है;

अपने ज्ञान से दूसरों को लाभ पहुँचाना

सच्ची विद्वत्ता है।


शक्तिशाली होना ही श्रेष्ठता नहीं है;

अपनी शक्ति से निर्बलों की रक्षा करना

वास्तविक श्रेष्ठता है।


दान और धर्म का महत्त्व


दान करने का शुभ विचार आए,

तो यथासंभव उसे टालना नहीं चाहिए।


समय अनिश्चित है।

कल का अवसर मिलेगा या नहीं,

यह कोई नहीं जानता।


इसलिए अपनी सामर्थ्य के अनुसार

अन्नदान, विद्यादान, धनदान

और सेवा के अन्य कार्य

समय रहते करने चाहिए।


अजरामरवत् प्राज्ञो विद्यामर्थं च साधयेत्।

गृहीत इव केशेषु मृत्युना धर्ममाचरेत्॥


भावार्थ:


बुद्धिमान व्यक्ति को

विद्या और धन अर्जित करने में

ऐसे प्रयत्नशील रहना चाहिए,

मानो वह दीर्घजीवी हो।


परंतु धर्माचरण और सत्कर्म करने में

ऐसी तत्परता रखनी चाहिए,

मानो मृत्यु ने उसके केश पकड़ रखे हों।


अर्थात्, सत्कर्म को कल पर मत टालिए।


उपसंहार


परोपकार केवल धन देना नहीं है।

प्रेम से बोलना भी परोपकार है।

दुःखी मनुष्य को सांत्वना देना परोपकार है।

भूखे को भोजन देना परोपकार है।

प्यासे को पानी देना परोपकार है।

अज्ञानी को ज्ञान देना परोपकार है।

और निराश व्यक्ति में आशा जगाना भी परोपकार है।


निःस्वार्थ सेवा में अहंकार नहीं,

दान में प्रदर्शन नहीं,

प्रेम में भेदभाव नहीं,

और परोपकार में प्रतिफल की अपेक्षा नहीं।


यही भारतीय संस्कृति का संदेश है।


सर्वे भवन्तु सुखिनः।

सर्वे सन्तु निरामयाः।


सब सुखी हों,

सब निरोग रहें।


इसी लोकमंगल की भावना में

मानव जीवन की सार्थकता है।







 

 


Monday, October 12, 2026

केप्टन स्मिथ मच्छर

 असाधारण वीरता एवं त्याग के लिए गहन श्रद्धा-पत्र


सम्माननीय उपाधि: “2026 कलियुग मृत्युंजय”


प्रति: कैप्टन स्मित मच्छर जी, फ्लाईदुबई


**विषय: आपकी असाधारण वीरता एवं त्याग के प्रति गहन श्रद्धा व्यक्त करते हुए आपको “2026 कलियुग मृत्युंजय” की उपाधि से सम्मानित करने के संबंध में।


परम आदरणीय कैप्टन मच्छर जी,


सादर प्रणाम एवं आशीर्वाद।


मेरा नाम मुनीश्वर शास्त्रिगल है। मैं चेन्नई, तमिलनाडु का एक वैदिक विद्वान एवं ज्योतिषाचार्य हूँ।


मैं आपको यह पत्र हृदय में अपार कृतज्ञता, विस्मय और आध्यात्मिक श्रद्धा का भाव लेकर लिख रहा हूँ। 30 सितंबर, 2026 को फ्लाईदुबई की उड़ान FZ1073 में सवार 174 यात्रियों एवं चालक दल के सदस्यों की जान बचाने वाले एक साहसी भारतीय विमान चालक के रूप में संसार आपको जानता है। किंतु मेरी दृष्टि में आपका यह अद्भुत कार्य साहस की सामान्य सांसारिक परिभाषाओं से कहीं बढ़कर है।


अपने ही कॉकपिट में गंभीर रूप से घायल किए जाने और चाकू से हमले का सामना करने के बावजूद आपने हार नहीं मानी। आपने मृत्यु के भय पर विजय प्राप्त करते हुए, एक आसन्न भीषण त्रासदी के मुख से 174 अनमोल प्राणों को सुरक्षित बचाया।


आपकी इस असाधारण वीरता, आत्मत्याग और मानवता के प्रति समर्पण को नमन करते हुए, आचार्यों एवं गुरुओं के आशीर्वाद से मैं आपको “2026 कलियुग मृत्युंजय” की सम्माननीय उपाधि से अलंकृत एवं सम्मानित करना चाहता हूँ।


आपका यह साहस और त्याग मानवता के लिए सदैव प्रेरणास्रोत बना रहे।


सादर श्रद्धा एवं प्रणाम सहित,


एल. मुनीश्वर शास्त्रिगल

वैदिक विद्वान एवं ज्योतिषाचार्य

 அசாதாரண வீரத்திற்கும் தியாகத்திற்கும் ஆழ்ந்த மரியாதை செலுத்தும் கடிதம்


சிறப்புப் பட்டம்: “2026 கலியுக மிருத்யுஞ்ஜயர்”


பெறுநர்: கேப்டன் ஸ்மித் மச்சார் அவர்கள், ஃப்ளைதுபாய்.


**பொருள்: தங்களின் அசாதாரண வீரத்தையும் தியாகத்தையும் போற்றி, “2026 கலியுக மிருத்யுஞ்ஜயர்” என்ற சிறப்புப் பட்டத்தால் கௌரவிப்பது தொடர்பாக.


மதிப்பிற்கும் மரியாதைக்கும் உரிய கேப்டன் மச்சார் அவர்களே!


அன்புடன் வணக்கங்களும் ஆசியும்.


எனது பெயர் எல். முனீஸ்வர சாஸ்திரிகள். நான் சென்னையைச் சேர்ந்த வேதப் பண்டிதரும் ஜோதிட அறிஞரும் ஆவேன்.


ஆழ்ந்த நன்றியுணர்வு, வியப்பு மற்றும் ஆன்மிக மரியாதை நிறைந்த இதயத்துடன் இக்கடிதத்தைத் தங்களுக்கு எழுதுகிறேன்.


2026 செப்டம்பர் 30 அன்று, ஃப்ளைதுபாய் நிறுவனத்தின் FZ1073 விமானத்தில் பயணம் செய்த 174 பயணிகள் மற்றும் விமானப் பணிக்குழுவினரின் உயிர்களைக் காப்பாற்றிய துணிச்சல்மிக்க இந்திய விமானியாக உலகம் தங்களை அறிந்துள்ளது. ஆனால், என்னைப் பொறுத்தவரை தங்களின் இந்தச் சாதனை, சாதாரண உலகியல் வரையறைகளைக் கடந்த வீரத்தின் உன்னத வெளிப்பாடாகும்.


தங்களது விமானக் காக்பிட்டிலேயே கடுமையாகக் காயமடைந்து, கத்தியால் தாக்கப்பட்ட நிலையிலும் தாங்கள் மனம் தளரவில்லை. மரணத்தின் அச்சத்தையும் மீறி, நேரிடவிருந்த பெரும் பேரழிவின் பிடியிலிருந்து 174 உயிர்களைப் பாதுகாப்பாகக் காப்பாற்றினீர்கள்.


தங்களின் இந்த அசாதாரண வீரத்தையும், தன்னலமற்ற தியாகத்தையும், மனிதகுலத்தின் மீது கொண்ட அர்ப்பணிப்பையும் போற்றும் வகையில், ஆச்சாரியர்கள் மற்றும் குருமார்களின் ஆசியுடன் தங்களுக்கு “2026 கலியுக மிருத்யுஞ்ஜயர்” என்ற சிறப்புமிக்க பட்டத்தை வழங்கி கௌரவிக்க விரும்புகிறேன்.


தங்களின் வீரமும் தியாகமும் மனிதகுலத்திற்கு என்றென்றும் ஊக்கமளிக்கும் ஒளிவிளக்காகத் திகழட்டும்.


மிகுந்த மரியாதையுடனும் நன்றியுணர்வுடனும்,


எல். முனீஸ்வர சாஸ்திரிகள்

வேதப் பண்டிதர் மற்றும் ஜோதிட அறிஞர்

சென்னை, தமிழ்நாடு.

Sunday, October 11, 2026

கவலை++ கபீர்

இந்த மாதம் திரும்பிவிடுவேன்.

 நம் மன வலிமை வலிமை இல்லாமை தான் ஆரோக்கியம் ஆரோக்கியமற்ற நிலை.

 கபீர் சொல்கிறார் 

कबीर चिंता क्या करें, चिंता सो क्या होय।

मेरी चिंता हरि करे, चिंता मोहि न कोय।

 கவலை என்ன செய்யும்?

கவலைப் படுவதால் நடப்பது என்ன?

 என்னைப் படைத்த ஆண்டவன் என்னைப் பற்றி கவலைப்படுவார்.

எனக்கு கவலையே இல்லை.






கவலையால் கெட்டிக்காரன் தனம் குறைகிறது.

துன்பப் படுவதால் உடல் ஆரோக்கியம் குறைகிறது.

பேராசையால் செல்வம் குறைகிறது.


दोहा 2:चिंता से चतुराई घटे, दुख से घटे शरीर।

लोभ किया तो धन घटे, कह गए साहेब कबीर।

तरंगों में शांति

  


तरंगों  में शांति 

नमस्ते वणक्कम्।

 समय बीतता जा रहा हैं।

 यादों की तरंगें उठती रहती हैं।

भूलना ?

भूलने की जिंदगी नहीं।

 सहने की जिंदगी।

 सहन शक्ति चाहिए।

 तरंगें उठती रहें,

 तरंगें तुमने की प्राकृतिक लीला नहीं।

किनारे पर उठती ही रहेंगी।

 बीच समुद्र ख़ामोश।

वही आत्मा में मन का विलीन होना।

 वह तौ दिव्य पुरुषों के लिए।

फिर भी ईश्वरीय लीला

 सब हीं नचावत राम गोसाईं 

 यही शांति का संदेश मार्ग।

 ईश्वरीय सृष्टि 

 सर्वेश्वर की सूक्ष्म लीला 

 सुखप्रद और दुखप्रद।

 धरती में अवतरित सभी जीवराशियाँ

ईश्वरीय शाश्वत नियम 

कर्मफल भोगने से छूट नहीं।

धन्य है ईश्वर हमें इतनी शक्ति दी है, 

हम जी रहे हैं अपने दायरे में सम्मान सहित।

ॐॐ ॐॐॐ ॐॐॐ ॐॐॐ ॐॐॐ 

शान्ति ।


 समय, स्मृतियाँ और सशक्तता


एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु।


समय बीतता जा रहा है,

यादों की तरंगें उठती रहती हैं।


भूलना?

भूलने के लिए नहीं,

यह जीवन तो सहने के लिए है।

स्मृतियों को सहने के लिए

सशक्तता चाहिए।


मन की तरंगें उठती रहेंगी,

यह प्रकृति की सहज लीला है।

समुद्र के किनारे

लहरें उठती ही रहेंगी,

परंतु समुद्र के मध्य

गहरा मौन व्याप्त रहता है।


वही तो है—

मन का आत्मा में विलीन होना!

वह अवस्था तो

दिव्य पुरुषों की साधना है।


फिर भी, यह ईश्वरीय लीला है।


“सब ही नचावत राम गोसाईं।”


यही है शांति का संदेश,

यही है समर्पण का मार्ग।


ईश्वरीय सृष्टि,

सर्वेश्वर की सूक्ष्म लीला—

कहीं सुखप्रद,

तो कहीं दुःखप्रद।


धरती पर अवतरित

समस्त जीव-राशियाँ

ईश्वरीय शाश्वत नियमों के अधीन हैं।

कर्मफल के भोग से

किसी को मुक्ति नहीं।


फिर भी धन्य हैं हम,

कि ईश्वर ने हमें

इतनी सशक्तता प्रदान की है।


स्मृतियों के बीच,

सुख-दुःख के बीच,

हम आज भी जी रहे हैं—

अपने सीमित दायरे में,

आत्मसम्मान के साथ,

ईश्वर के प्रति कृतज्ञता लिए।


ॐ शान्तिः! शान्तिः!! शान्तिः!!!


Friday, October 9, 2026

लीला

 கடவுளின் லீலை ,                          ==ईश्वर की लीला,

அவனது வேடிக்கைக்கு                ==उसकी तमाशा ,

கணக்கில் அடங்கா ,                    == गिनती में न सीमित .

கண்காணும் காணமுடியா ,           ==अदृश्य- दृश्य 

அணுவினும்சிரிய,                               == कण से छोटी  

ஆணையிலும் பெரிய                       ==हाथी  से  बडी

ஜீவராசிகள்                                  .=======जीव्राशियाँ 

அனைத்தும் அடக்கி ஆளும்  ==  सबको अपने अधीन  करनेवाली 


மானிட சக்தி                                   .==--मनुष्य शक्ति ,

மானிட சக்திக்கு                              ==मनुष्य शक्ति को 

ஆற்றல் அளித்து                                      ==ऊर्जा देकर 

துள்ளும் இளமை அளித்து ,  ==      ==  उछल कूदनेवाली जवानी 

துவளும் முதுமை அளித்து               == शिथिलता का बुढापा 

இயங்க முடியா மரணம்                         == अचल मृत्यु 

மனிதனின்  ஆற்றல் ,                                == मनीता शक्ति 

பணம் , அசையும் ,அசையா சொத்து ,  == पैसे ,चन-अचल संपत्तियां 

பதவி  எதுவும் கட்டுப்படுத்த முடியா ,  ==  पद  ,आदि किसी से अनियंत्रित 

                                                                          करनेवाली 

பிணி , முதுமை ,மரணம்                           == रोग ,बुढापा, मृत्यु, 

இவை இல்லை என்றால்                             == आदि  न होतो 


இச்சகம் உள்ள மனிதனின்                    ==  चाहने वाले मनुष्य  के 

ஹிம்சையை இறைவனும்                    == हिसा  को भगवान भी 

தாங்க முடியாது.                                      == सब्र न कर सकता 

அவன் ஆற்றல் லீலை                             ==उसकी लीलाएं ,क्रीडाएं   

அளந்து தெரிய அறிய,புரிய புரிய  

                                                                       तोलकर  जानते जानते , समज्गते समझते 

அனந்த விந்தையே.                                  मिलना अनंत  अपूर्व , अद्बुत .

अनुभव அனுபவம்

 उम्र 72.    அகவை 72

अनुभव की बात। அனுபவ விஷயங்கள்.

ईश्वर के प्रति निधि मनुष्य। கடவுளின் பிரதிநிதிகள் மனிதர்கள்.

 मित्रों की मदद। நண்பர்களின் உதவி.

अज्ञात व्यक्ति की मदद। அறியாத மனிதர்கள் உதவி.

 नौकरी प्राप्ति। வேலை கிடைத்தல்.

सुपत्नी प्राप्त।நல் மனைவி கிடைத்தல்

संतान भाग्य। குழந்தை பாக்கியம்.

स्वस्थ जीवन। ஆரோக்கிய மான வாழ்க்கை

सुखी जीवन। சுகமான வாழ்க்கை.

  दीर्घ आयु/अल्पायु நீண்ட ஆயுள்/குறைந்த ஆயுள்.

सब के सब  अमानुष्य देन। அனைத்து மே மனித சக்திக்கு அப்பாற்பட்ட கொடுப்பினை. 

सब्हिं नचावत राम गोसाईं।அனைவரையும் ஆட்டி வைப்பவன் ஆண்டவன்.

    தமிழும் நானே. ஹிந்தியும் நானே.

तमिल भी मैं हिंदी भी मैं।

स्वरचित स्वचिंतक एस-अनंतकृष्णन चेन्नै तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक

Thursday, October 8, 2026

 वरिष्ठ हूँ, बेकार नहीं।

 कुछ लिखता हूँ, 

 आशा है वह व्यर्थ नहीं।

 

नालडियार तमिल जैन ग्रंथ।

मेरा ब्लॉग तमिल हिंदी संपर्क देखिए पूरा ग्रन्थ।


 பாடல்-101


 गायों  के दल  से भले ही  बछड़ा छूट  जाएँ,


वह बछड़ा  अपनी माँ  के पास पहुँचने में अति चतुर.


वैसे ही पूर्व-जन्म की विधि की विडम्बना ,


कर्ता तक पहुँचने में है ही  चतुर.


பல்லாவுள் உய்த்து விடினும் குழக்கன்று


வல்லதாம் தாய்நாடிக் கோடலைத் - தொல்லைப்


பழவினையும் அன்ன தகைத்தேதற் செய்த


கிழவனை நாடிக் கொளற்கு


பல பசுக்களின் கூட்டத்தில் கொண்டு போய் விட்டாலும் இளைய பசுங்கன்று தன் தாயைத் தேடி அடைதலில் வல்லதாகும். அது போல முற்பிறப்பிற் செய்த பழவினையும், அவ்வினை செய்தவனைத் தேடி அடைதலில் வல்லமை யுடையதாகும்.


பாடல் 102


खूबसूरती  ,जवानी,श्रेष्ठ संपत्ति,भय दिखानेवाले पद आदि हैं अस्थिर.


यह देख -समझकर  भी एक भी सद्कर्म न करें तो


 जन्म लेकर भी उसका जन्म 


अर्थहीन बेकार  ही अंत होनेवाला है.


உருவும் இளமையும் ஒண்பொருளும் உட்கும்


ஒருவழி நில்லாமை கண்டும் - ஒருவழி


ஒன்றேயும் இல்லாதான் வாழ்க்கை உடம்பிட்டு


நின்றுவீழ்ந் தக்க துடைத்து


அழகும், வாலிபமும், மேன்மையான பொருளும், பலர் அஞ்சத்தக்க மதிப்பும் ஓரிடத்தில் நிலைத்திராமையைப் பார்த்தும், யாதேனும் ஒரு வகையில் ஒரு நற்செயலும் செய்யாதவனுடைய வாழ்க்கை, உடலெடுத்துச் சில காலம் நின்று பயனில்லாது பின் அழிந்து போகும் தன்மையுடையது.


பாடல்-103


 कोई भी ऐसा नहीं,जो समृद्ध जीवन  न चाहता हो;


जैसे फलों का रूप -रंग -स्वाद  प्राकृतिक देन  है,


वैसे ही सुख-दुःख अपने-आप मिलनेवाला है,इसीलिए 


जो चाहते हैं सुख-संपत्ति ,उनको चाहिए सद्कर्म करना.


வளம்பட வேண்டாதார் யார்யாரு மில்லை;


அளந்தன போகம் அவரவர் ஆற்றான்


விளங்காய் திரட்டினார் இல்லை களங் கனியைக்


காரெனச் செய்தாரும் இல்


செல்வம் முதலியவற்றால் வளமுடன் வாழ்தலை விரும்பாதவர் யாரும் உலகில் இல்லை. ஆனால் அவரவர் செய்த புண்ணியங்களுக்கு ஏற்ப அவரவர்களுடைய இன்ப நுகர்வுகள் (சுகபோகங்கள்) வரையறை செய்யப்பட்டுள்ளன. விளாங்காயை உருண்டை வடிவமாகச் செய்தவரும் இல்லை களாப்பழத்தைக் கருமையுடையதாகச் செய்தவரும் இல்லை! (விளாங்காய் ஒருவரால் திரட்டப்படாமல் இயற்கையாகத் திரண்டிருப்பது போலவும், களாப்பழம் ஒருவரால் கறுப்பாக்கப்படாமல் தானே கறுப்பாய் இருப்பது போலவும், அவரவர் இன்பமும் அவரவர் புண்ணிய இயற்கையால் அமைந்துள்ளது. ஆகவே இன்பம் விரும்புவோர் நல்வினையே செய்தல் வேண்டும்).


பாடல்-104


जो बुराई आती हैं ,उनको ऋषि-मुनि भी रोक नहीं सकते .वैसे ही 


आनेवाली भलाइयों को  कोई भी रोक नहीं  सकते.


वर्षा  न हुयी ,तो कोई भी बरसा नहीं सकते;


जोर की वर्षा हो तो कोई भी रोक नहीं  सकते.


உறற்பால நீக்கல் உறுவர்க்கும் ஆகா,


பெறற்பால அனையவும் அன்னவாம் மாரி


வறப்பின் தருவாரும் இல்லை அதனைச்


சிறப்பின் தணிப்பாரும் இல்.


வந்து சேரும் தீமைகளை முனிவர்களாலும் தடுக்க முடியாது! அவ்வாறே பெறக் கூடிய நன்மைகளையும் யாராலும் தடுக்க முடியாது! மழை பெய்யாது ஒழிந்தால் அதனைப் பெய்விப்பாரும் இல்லை! அதிகமாகப் பெய்தால் அதனைத் தடுத்து நிறுத்துவாரும் இல்லை!


பாடல்-105


ताड के पेड़ समान,जो सम्मान  के शिखर पर है ,


वे भी तिनके समान  सम्मान खो बैठेंगे.


इसके  कारण  पूर्व जन्म के बद्कर्म के फल ही है.


और कोई कारण है नहीं.


தினைத்துணைய ராகித்தந் தேசுள் அடக்கிப்


பனைத்துணையார் வைகலும் பாடழிந்து வாழ்வர்;


நினைப்பக் கிடந்தது எவனுண்டாம் மேலை


வினைப்பயன் அல்லால் பிற.


பனை அளவாக உயர்ந்த பெருமை மிக்கவரும் தினையளவாகச் சிறுத்துச் சிறுமையுற்று வருந்தி வாழ்வர்! இதற்குக் காரணம் முற்பிறப்பில் செய்த தீவினையின் பயனேயன்றி வேறில்லை. (உயர்ந்தோர் தாழ்ந்தோர் ஆவதற்குக் காரணம் முன் செய்வினையே).


பாடல்-106


 आप  जानते हैं ,कई चतुर होशियार अल्प आयु में मर जाते हैं,


अशिक्षित लोग दीर्घ  जीवन बिताते हैं,


इसका कारण सार हीन होना ही है,


रस  हीनों को यम जीने देते हैं.


பல்லான்ற கேள்விப் பயனுணர்வார் வீயவும்


கல்லாதார் வாழ்வதும் அறிதிரேல் - கல்லாதார்


சேதனம் என்னுமச் சாறகத் தின்மையால்


கோதென்று கொள்ளாதாம் கூற்று.


பல மேன்மைப்பட்ட நூற்கேள்விகளின் பயனை அறிந்தவர்கள் இறப்பதையும், அறிவீனர்கள் நீடு வாழ்வதையும் அறிந்திருக்கிறீர்கள்! இதற்குக் காரணம், அறிவு என்னும் 'சாறு' கல்லாதார் உள்ளத்தில் இல்லாமையால் அவர்களை வெறும் 'சக்கை' என்று நினைத்து எமன் கொள்வதில்லை.


பாடல்-107


अदम्ब  नामक लताओं को हंस तोड़ते हैं,


लहरों वाले सागर के किनारे पर रहनेवाले नृप!जान  लो.


बड़े महल में रहनेवाले , और उसके सामने खड़े होकर भीख माँगनेवाले ,


ये सब पूर्व जन्म के पाप -पुण्य  के फल ही है.


இடும்பைகூர் நெஞ்சத்தார் எல்லாரும் காண


நெடுங்கடை நின்றுழல்வ தெல்லாம் - அடம்பப்பூ


அன்னங் கிழிக்கும் அலைகடல் தண்சேர்ப்ப


முன்னை வினையாய் விடும்.


அடம்பங் கொடியின் மலர்களை அன்னங்கள் கோதிக் கிழிக்கும் அலைகடலினது குளிர்ச்சியாகிய கரையையுடைய மன்னனே! சிலர் துன்பம் மிகுந்த மனமுடையவராகி யாவரும் காண, பெரிய வீடுகளின் தலைவாயிலில் நின்று பிச்சை கேட்டு வருந்தும் செயல் எல்லாம் முற்பிறப்பிற் செய்த தீவினையின் பயனே ஆகும். (வறுமைக்குக் காரணம் தீவினையே).


பாடல்-108


शहद और लम्बे समुद्रके किनारे पर शासन करनेवाले नृप!


जान-समझ  लो,


बुद्धिमान चतुर होशियार भी अपयश के कर्म करते हैं,


इसके कारण भी पूर्व-जन्म के कर्म-फल ही हैं.


அறியாரும் அல்லர் அறிவ தறிந்தும்


பழியோடும் பட்டவை செய்தல் - வளியோடி


நெய்தல் நறவுயிர்க்கும் நீள்கடல் தண்சேர்ப்ப!


செய்த வினையான் வரும்.


காற்று வீசி நெய்தல் நிலங்களிலே தேனைச் சிந்தும் நீண்ட கடலினது குளிர்ச்சி பொருந்திய கரையையுடைய வேந்தனே! அறிவீனராக இன்றி அறிவுடையவராகத் திகழ்ந்தாலும் சிலர், பழியுடன் கூடிய செயல்களைச் செய்தல், முற்பிறப்பிற் செய்த தீவினையின் விளைவாகும். (நல்லறிவு கெடுதற்கும் காரணம் தீவினையே).


பாடல்-109


समुद्र से घेरे  अग जग में जीनेवाले सब,


ज़रा भी हानि  न चाहेंगे;


भला ही चाहेंगे; फिर भी 


पूर्व-जन्म के कर्म-फल  के अनुसार 


जो आना है,आजायेगा.


ஈண்டுநீர் வையத்துள் எல்லாரும எத்துணையும்


வேண்டார்மன் தீய; விழைபயன் நல்லவை;


வேண்டினும் வேண்டா விடினும் உறற்பால


தீண்டா விடுதல் அரிது.


மிகுதியான நீரையுடைய கடலால் சூழப்பட்ட இவ்வுலகில் வாழும் எல்லாரும் சிறிய தீமையையும் விரும்பமாட்டார்கள். நல்லதையே விரும்புவார்கள். ஆனால் அவர்கள் விரும்பினாலும் விரும்பாவிட்டாலும் முன்வினைப் பயனால் வரத்தக்கவை வராமற் போவதில்லை.


பாடல்-110


गर्भ में उत्पन्न  विधि शिरोरेखा  कर्म फल  न होगा  कभी कम.


न बढेगा;न घटेगा; नियम न बदलेगा;


जो भोगना है ,वे उचित समय पर आ ही जाएगा;


फिर भी मनुष्य क्यों होता हैं दुखी अपने अंतिम समय पर;


சிறுகா பெருகா முறைபிறழ்ந்து வாரா


உறுகாலத் தூற்றாகா ஆமிடத்தே யாகும்


சிறுகாலைப் பட்ட பொறியும் அதனால்


இறுகாலத் தென்னை பரிவு.


கரு அமைந்த காலத்திலேயே உண்டான ஊழ் வினைகள் குறையமாட்டா வளரமாட்டா முறைமாறி வரமாட்டா துன்பம் வந்த காலத்தே ஊன்றுகோலாக மாட்டா எவையும் வரவேண்டிய காலத்தே வந்து சேரும். அப்படியிருக்க மரண காலத்தில் ஒருவன் வருந்துவது ஏன்?