Thursday, October 1, 2026

मेरे ब्लॉग की समीक्षा।

 नमस्ते वणक्कम् आदरणीय। 🙏

मैंने आपके “Tamil - Hindi - Sampark” ब्लॉग को उसके वर्तमान पृष्ठ, हाल की रचनाओं और उपलब्ध दीर्घकालीन ब्लॉग-अभिलेख को देखकर समीक्षा की है। ब्लॉग का अभिलेख अगस्त 2012 से सितंबर 2026 तक दिखाई देता है; केवल संग्रह में दर्ज वर्षवार संख्याओं को जोड़ने पर लगभग 1,231 पोस्ट दिखाई देती हैं, इसलिए यह केवल एक-दो वर्षों का प्रयास नहीं, बल्कि लगभग डेढ़ दशक की निरंतर लेखन-साधना का दस्तावेज है। �

Anand Gomu

और आपने जो 1,25,000 दर्शकों का आँकड़ा बताया है, वह इस दीर्घकालीन प्रयास के साथ देखा जाए तो आपके लेखन-संपर्क की पहुँच का महत्वपूर्ण संकेत है।

🌿 मेरी समग्र साहित्यिक समीक्षा

1. आपके ब्लॉग की सबसे बड़ी पहचान — “तमिल और हिंदी के बीच साहित्यिक सेतु”

मेरी दृष्टि में आपके ब्लॉग का सबसे उपयुक्त परिचय केवल “एक हिंदी ब्लॉग” या “एक तमिल ब्लॉग” नहीं है; इसकी वास्तविक पहचान तमिल और हिंदी के बीच संवाद स्थापित करने वाला व्यक्तिगत साहित्यिक मंच है।

उदाहरण के लिए, आपने रामधारी सिंह दिनकर की रचनाओं को हिंदी के साथ तमिल में प्रस्तुत किया है, और “हिंदी तमिऴ सेवा / ஹிந்தி தமிழ் பணி” जैसी अभिव्यक्ति के माध्यम से अपने उद्देश्य को स्पष्ट भी किया है। �

Anand Gomu

इसी प्रकार नालडियार के पदों में आप तमिल मूल पाठ देते हैं, फिर हिंदी में भावार्थ प्रस्तुत करते हैं; यह केवल अनुवाद नहीं, बल्कि दो भाषाई पाठक-समुदायों को एक ही नैतिक विचार के सामने बैठाने का प्रयास है। �

Anand Gomu

यहीं आपके ब्लॉग का सबसे मजबूत साहित्यिक आधार है।

2. आपका ब्लॉग वास्तव में “ब्लॉग” से आगे बढ़कर व्यक्तिगत साहित्यिक अभिलेख बन गया है

अभिलेख में 2012 से लगातार अलग-अलग वर्षों में रचनाएँ दिखाई देती हैं; 2015 में 131, 2016 में 58, 2021 में 340, 2025 में 89 और 2026 में 70 पोस्ट दर्ज हैं। �

Anand Gomu

इससे एक महत्वपूर्ण बात सामने आती है—आपका लेखन किसी एक समय की आकस्मिक रुचि नहीं है; यह दीर्घकालीन साधना है।

साहित्य में यह बात बहुत मूल्यवान होती है, क्योंकि एक लेखक की पहचान केवल उसकी दस अच्छी रचनाओं से नहीं, बल्कि वर्षों तक वह किन विषयों पर सोचता रहा, क्या लिखता रहा और समाज के सामने क्या रखता रहा, उससे भी बनती है।

इस दृष्टि से आपका ब्लॉग आपके जीवन-लेखन का डिजिटल दस्तावेज है।

3. विषयों की आपकी सबसे बड़ी शक्ति — बहुत व्यापक संसार

आपके ब्लॉग में मुझे मुख्यतः ये धाराएँ दिखाई देती हैं:

तमिल साहित्य → हिंदी साहित्य → नीति → अध्यात्म → भक्ति → जीवन-दर्शन → सामाजिक चिंतन → शिक्षक-जीवन → संस्कृति → राष्ट्रभावना → व्यक्तिगत अनुभूति → मानवता।

सितंबर 2026 की कुछ ही रचनाएँ देखें तो अपनी धरती अपना जीवन, दिनकर, औवैयार/नालडियार, रामरस, दिलासा, भाग्यशाली, शैशव की किलकारियाँ आदि अलग-अलग दिशाओं में जाती हैं। �

Anand Gomu +1

इस विविधता को मैं कमजोरी नहीं मानता; बल्कि यही आपकी रचनात्मक दुनिया का विस्तार है।

हाँ, एक साहित्यिक संपादक के रूप में मैं आपको सलाह दूँगा कि आगे से इन विषयों को अलग-अलग श्रृंखलाओं में व्यवस्थित करें, ताकि नया पाठक आपके ब्लॉग में प्रवेश करते ही आपकी साहित्यिक दुनिया को आसानी से समझ सके।

4. “नालडियार” और तमिल ग्रंथों का कार्य — आपके नाम को अलग पहचान दे सकता है

यह आपके ब्लॉग का बहुत महत्वपूर्ण पक्ष है।

आपने नालडियार के अनेक पदों को तमिल मूल के साथ हिंदी में प्रस्तुत किया है; उदाहरण के लिए 101 से आगे के पदों में मूल तमिल, हिंदी भावार्थ और फिर विस्तृत तमिल व्याख्या दिखाई देती है। �

Anand Gomu

यह कार्य सामान्य दैनिक कविता से अलग प्रकार का साहित्यिक योगदान है।

मेरी विशेष सलाह है:

“तमिल नीति-साहित्य का हिंदी सेतु”

इसे आपकी दीर्घकालीन परियोजना बनाया जा सकता है।

इसके अंतर्गत:

नालडियार

तिरुक्कुरल

औवैयार

तिरुमंत्रम्

नीतिनेरि विलक्कम्

अन्य तमिल नीति-ग्रंथ

को क्रमबद्ध रूप से प्रस्तुत किया जा सकता है।

हर रचना का ढाँचा हो:

तमिल मूल → सरल हिंदी अर्थ → विस्तृत भावार्थ → जीवन में उपयोग → आपकी टिप्पणी।

इससे आपका व्यक्तिगत अनुभव भी ग्रंथ-साहित्य से जुड़ जाएगा।

5. आपकी मौलिक रचनाओं में एक दूसरी बड़ी शक्ति है — जीवन का प्रत्यक्ष अनुभव

“शैशव की किलकारियाँ” इसका बहुत अच्छा उदाहरण है।

वहाँ आप केवल “गरीबी बुरी है” जैसा सामान्य उपदेश नहीं देते; आप शराबी पिता, घर के तनाव, माँ की पीड़ा और बच्चों की बाहरी हँसी के पीछे छिपे दर्द को सामने लाते हैं। �

Anand Gomu

तमिल भाग में भी उसी अनुभूति को आगे ले जाया गया है। �

Anand Gomu

यहाँ आपकी कविता का मूल्य इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि विचार केवल पुस्तक से नहीं आया, जीवन की जमीन से आया है।

मेरी दृष्टि में आपकी आगे की रचनाओं में यह क्षेत्र बहुत विकसित किया जा सकता है।

6. “दिलासा” जैसी रचनाएँ आपके साहित्य में निजी संवेदना का नया अध्याय खोलती हैं

“दिलासा” में हिंदी और तमिल दोनों भाषाओं में निजी शोक, अकेलापन और जीवन-साथी की अनुपस्थिति की अनुभूति दिखाई देती है; विशेष रूप से “सब को दिलासा देनेवाला मैं / अपने को देने में असमर्थ हूँ” जैसी पंक्तियाँ आपकी निजी स्थिति को सीधे साहित्यिक अनुभूति में बदल देती हैं। �

Anand Gomu

यहाँ एक महत्वपूर्ण साहित्यिक संभावना है:

आपकी पत्नी की स्मृति पर संस्मरण-श्रृंखला।

नाम हो सकता है:

“गोमती — मेरी अर्धांगिनी, मेरी जीवन-संगिनी”

या अधिक साहित्यिक:

“गोमती की स्मृतियाँ — साथ से विरह तक”

इसमें केवल मृत्यु और दुःख न हो; बल्कि 51 वर्ष का दाम्पत्य, आरंभिक जीवन, परिवार, संघर्ष, बीमारी, सेवा, यात्राएँ, छोटी-छोटी घरेलू स्मृतियाँ, उनकी हँसी, उनका स्नेह और उनके जाने के बाद का जीवन—इन सबको लिखा जा सकता है।

ऐसी रचनाएँ केवल आपके लिए नहीं, आने वाली पीढ़ी के लिए भी मूल्यवान स्मृति-दस्तावेज बन सकती हैं।

7. “भाग्यशाली” आपकी चिंतनात्मक शैली का अच्छा उदाहरण है

आपने पूछा—

कौन भाग्यशाली?

कौन अभागा?

और फिर सिद्धार्थ, कर्ण, विदुर, सुदामा, पांडव, उर्मिला, यशोधरा तथा सामान्य जीवन के उदाहरणों से प्रश्न को आगे बढ़ाया है। �

Anand Gomu +1

अंत में आप निश्चित उत्तर देने के बजाय प्रश्न को भगवान के पास छोड़ते हैं। �

Anand Gomu

यह आपकी रचना-पद्धति की विशेषता है:

प्रश्न → उदाहरण → जीवन → दर्शन → खुला निष्कर्ष।

इसे बनाए रखिए।

8. आपकी भाषा की सबसे बड़ी विशेषता और सबसे बड़ा सुधार-क्षेत्र दोनों एक ही हैं

आपकी भाषा सरल और सीधे हृदय तक पहुँचने वाली है; आप कठिन साहित्यिक शब्दों से पाठक को प्रभावित करने की कोशिश नहीं करते।

लेकिन कई बार विचार पहले बहुत तेज़ी से निकलता है और भाषा पीछे रह जाती है; इसलिए वाक्य-विन्यास, शब्द-चयन, पुनरावृत्ति और विराम-चिह्नों में सुधार की आवश्यकता रहती है।

उदाहरण के लिए “अपनी धरती अपना जीवन” का मूल मसौदा अपेक्षाकृत टूटे हुए वाक्यों में था, जबकि उसी पृष्ठ पर उसका परिष्कृत रूप अधिक क्रमबद्ध दिखाई देता है—बचपन, मातृभूमि, सत्य, अहिंसा, आत्मज्ञान, परोपकार और अंततः भारत की पहचान तक विचार क्रमशः आगे बढ़ता है। �

Anand Gomu

यही संपादन आपकी रचनाओं को बहुत ऊपर उठा सकता है।

आपकी भावना को बदलना नहीं है; केवल उसे साहित्यिक आकार देना है।

9. आपकी रचनाओं में “अंतिम पंक्तियाँ” बहुत महत्वपूर्ण हैं

आपके लिए मैं एक विशेष नियम सुझाऊँगा:

आरंभ पाठक को बुलाए, मध्य उसे सोचने पर मजबूर करे और अंत उसके मन में ठहर जाए।

उदाहरण के लिए “अपनी धरती अपना जीवन” का अंतिम विचार—भारत को केवल जन्मभूमि नहीं बल्कि आत्मभूमि के रूप में देखना—रचना को व्यक्तिगत पहचान देता है। �

Anand Gomu

इसी तरह “भाग्यशाली” में प्रश्न खुला छोड़ना पाठक को स्वयं सोचने के लिए प्रेरित करता है। �

Anand Gomu

आपकी भविष्य की रचनाओं में अंतिम 3–5 पंक्तियों पर विशेष मेहनत करनी चाहिए।

10. आपके ब्लॉग का संभावित साहित्यिक नाम

आपने कहा कि आपको “प्रेरणा मिले और नाम भी”।

मेरी ओर से आपके लिए एक सम्मानजनक साहित्यिक परिचय हो सकता है:

“तमिल–हिंदी साहित्य सेतु साधक”

और विस्तृत रूप में:

“एस. अनंतकृष्णन — तमिल–हिंदी साहित्य एवं संस्कृति के सेतु साधक”

क्योंकि आपका कार्य केवल हिंदी सीखना या तमिल का हिंदी अनुवाद करना नहीं है; आप दोनों भाषाओं के साहित्य, नीति, भक्ति और जीवन-दर्शन को एक-दूसरे के सामने रख रहे हैं।

एक और उपाधि जो आपकी रचनात्मक शैली को दर्शाती है:

“अनुभव और अध्यात्म के द्विभाषी लेखक”

और ब्लॉग के लिए एक सुंदर परिचय-पंक्ति:

“तमिल की ज्ञान-परंपरा और हिंदी की अभिव्यक्ति के बीच एक आत्मीय साहित्यिक सेतु।”

इसे मैं आपके ब्लॉग के शीर्ष परिचय में रखने योग्य मानता हूँ।

11. यदि “नाम” को और मजबूत करना है तो एक महत्वपूर्ण परिवर्तन कीजिए

आपके ब्लॉग में बहुत-सी अच्छी सामग्री है, लेकिन एक नए पाठक को यह तुरंत समझना कठिन हो सकता है कि लेखक की मुख्य साहित्यिक पहचान क्या है।

इसलिए ब्लॉग के शीर्ष पर एक स्थायी परिचय होना चाहिए:

एस. अनंतकृष्णन

तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक

तमिल–हिंदी साहित्य सेतु साधक

तमिल साहित्य, हिंदी साहित्य, नीति, अध्यात्म और जीवन-दर्शन पर लेखन

इसके नीचे:

“2012 से निरंतर साहित्यिक सेवा”

और आपके बताए हुए 1,25,000+ दर्शकों का उल्लेख भी किया जा सकता है, यदि Blogger के वर्तमान आँकड़े यही संख्या दिखाते हैं।

इससे नया पाठक पहले ही क्षण में समझ जाएगा कि वह किस लेखक के मंच पर आया है।

12. आपकी रचनाओं को पाँच प्रमुख श्रृंखलाओं में बाँटने का मेरा सुझाव

① तमिल–हिंदी साहित्य सेतु

तिरुक्कुरल, नालडियार, औवैयार, तिरुमंत्रम् आदि।

② आज की चुनौती

आपकी समसामयिक जीवन-दर्शन वाली छोटी रचनाएँ।

③ जीवन की सीख

अनुभव, वृद्धावस्था, परिवार, समाज, शिक्षक-जीवन और मानवीय मूल्य।

④ भक्ति और आत्मचिंतन

राम, शिव, मुरुगन, कबीर, संत-साहित्य, आत्मा, कर्म, ईश्वर और शरणागति।

⑤ संस्मरण और जीवन-यात्रा

आपका बचपन, शिक्षा, अध्यापन, परिवार, दाम्पत्य जीवन, यात्राएँ और जीवन के महत्वपूर्ण अनुभव।

इन पाँच धाराओं में आपका विशाल लेखन व्यवस्थित हो जाए तो 1,200 से अधिक रचनाओं का संग्रह एक साहित्यिक धरोहर जैसा दिखाई देने लगेगा।

13. आपकी रचनाओं के लिए मेरी “संपादकीय कसौटी”

आगे से जब आप मुझे कोई रचना देंगे, मैं उसे केवल व्याकरण की दृष्टि से नहीं देखूँगा; मैं इन पाँच प्रश्नों से भी देख सकता हूँ:

भाव है?

विचार स्पष्ट है?

दोहराव कम है?

भाषा स्वाभाविक है?

अंत हृदय में ठहरता है?

और जहाँ आवश्यकता होगी, आपकी मूल भावना और आपकी अपनी आवाज़ को बचाकर रचना को साहित्यिक रूप दूँगा।

🌺 अंत में मेरी सबसे महत्वपूर्ण बात

आदरणीय, आपके ब्लॉग की सबसे बड़ी उपलब्धि 1,25,000 दर्शक नहीं हैं; उससे भी बड़ी उपलब्धि यह है कि आपने वर्षों तक लिखना नहीं छोड़ा।

2012 से लेकर 2026 तक का अभिलेख बताता है कि आपके भीतर लिखने की निरंतर इच्छा रही है; बीच में विषय बदले, जीवन बदला, परिस्थितियाँ बदलीं, लेकिन लेखन की धारा चलती रही। �

Anand Gomu

आपके लिए मैं एक वाक्य लिखना चाहूँगा—

“आप केवल लेख नहीं लिख रहे हैं; आप अपने समय, अपने अनुभव, तमिल की ज्ञान-परंपरा और हिंदी के प्रति अपने प्रेम का एक जीवित दस्तावेज तैयार कर रहे हैं।”

और इसलिए मेरी ओर से आपके साहित्यिक परिचय के लिए सबसे स्वाभाविक नाम है:

🌿 एस. अनंतकृष्णन — तमिल–हिंदी साहित्य सेतु साधक 🌿

आपके ब्लॉग “Tamil - Hindi - Sampark” के लिए भी यह नाम सार्थक है, क्योंकि आपके पूरे लेखन का मूल भाव ही संपर्क है—तमिल से हिंदी का संपर्क, साहित्य से जीवन का संपर्क, ज्ञान से अनुभव का संपर्क और अंततः मनुष्य से मनुष्य का संपर्क। �

Anand Gomu +1

आप लिखते रहिए; आपके पास विषयों की कमी नहीं है, बल्कि इतने वर्षों की सामग्री को व्यवस्थित करके उसकी साहित्यिक पहचान और मजबूत करने की आवश्यकता है।

और यदि आप अनुमति दें, तो अगला चरण मैं और उपयोगी ढंग से कर सकता हूँ: �⁠आपके ब्लॉग के लिए एक सुंदर “लेखक परिचय / About Me” और “Tamil–Hindi Sampark की साहित्यिक यात्रा” तैयार कर दूँ, जिसे आप सीधे अपने ब्लॉग पर लगा सकें।

Wednesday, September 23, 2026

अपनी धरती अपना जीवन

 [23/09, 7:58 pm] sanantha.50@gmail.com: अपनी धरती अपना जीवन।

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु 

24-9-26.


जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी" एक प्रसिद्ध संस्कृत सूक्ति है जिसका अर्थ है कि माता और मातृभूमि स्वर्ग से भी महान या श्रेष्ठ हैं

 हमारे बचपन यही पिता।

 हमारे खून के रिश्ते यहीं रहते हैं।

यहीं हमें शिक्षा मिली है।

यहीं हम अपने सहपाठियों के साथ खेले कूदे मौज उड़ाये।

 यह मातृभूमि ही विश्व गुरु ।

 जिसने विश्व को संदेश दिया,

सारा संसार एक परिवार है।

अपनी धरती अपना जीवन 

सत्य का मार्ग दिखाया।

 अहिंसा का मार्ग दिखाया।

 सिखाया नारा दिया 

 जय जगत।

 यहीं  से गूँज उठा नारा

 सर्वे जना सुखिनो भवन्तु।

त्याग का मार्ग दिखाया।

 जगत मिथ्या।

जग अनश्वर

 ब्रह्म सत्यं।

 सनातन धर्म सिखाया 

मानव के अंतिम समय

 कफ़न ही,वह भी श्मशान तक।।

 काली हाथ आये हैं,

खाली हाथ जाएँगे।

  सिकंदर को सिखाया 

 बर्फ प्रदेश में 

 एक साधु ने


 सोना चांदी नहीं चाहिए।

 मेरा अपना देश ने सिखाया 

आत्मा को पहचानो,

 आत्मज्ञान प्राप्त करो।

माया देवी छोड़ेगी नहीं,

 नारी सुख परिणाम 

 संतान प्रेम।

  मानव का शैशव मरता है,

बचपन मरता है

 जवानी मरती है

 प्रोढावस्था मरती है।

 इतनी बार बुढ़ापे में 

 मरता है।

 अतः अपनी धरती अपना जीवन 

 जीते जी सुकर्म करो।

 परोपकार करो।

वही मनुष्य है जो दूसरों केलिए जीता है मरता है।

ऐसे त्याग की भूमि,

 ज्ञान भूमि

 निर्गुण सगुण भक्ति की भूमि,

 मेरी धरती मेरा जीवन 

 शांति की भूमि, अहिंसा की भूमि

 संतोष की भूमि

 आध्यात्मिक भूमि 

 अपना जीवन ब्रह्मानंद से भरा।

 भारत भूमि विश्व में महान।

[23/09, 8:03 pm] sanantha.50@gmail.com: अपनी धरती, अपना जीवन

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

24-9-2026

“जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।”

यह प्रसिद्ध संस्कृत सूक्ति हमें सिखाती है कि माता और मातृभूमि स्वर्ग से भी महान हैं।

हमारा बचपन यहीं बीता,

हमारे पिता-पुर्खों की स्मृतियाँ यहीं जुड़ी हैं,

हमारे खून के रिश्ते यहीं रहते हैं।

यहीं हमें शिक्षा मिली,

यहीं सहपाठियों के साथ खेले-कूदे,

हँसे, मौज की और जीवन के सुंदर दिन बिताए।

अपनी धरती, अपना जीवन।

यह वही मातृभूमि है,

जिसने विश्व को ज्ञान का संदेश दिया।

“वसुधैव कुटुम्बकम्”—

सारा संसार एक परिवार है।

यहीं से सत्य का मार्ग दिखाया गया,

अहिंसा का मार्ग दिखाया गया,

“जय जगत्” का नारा गूँजा,

और प्रार्थना हुई—

“सर्वे भवन्तु सुखिनः,

सर्वे सन्तु निरामयाः।”

इस धरती ने त्याग का मार्ग दिखाया,

आत्मज्ञान का मार्ग दिखाया,

सिखाया कि बाहरी माया के पीछे भागना ही जीवन का उद्देश्य नहीं है।

“ब्रह्म सत्यं, जगन्मिथ्या”

का आध्यात्मिक संदेश

मनुष्य को अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानने की प्रेरणा देता है।

मानव जीवन की यात्रा भी कितनी अद्भुत है—

शैशव बीत जाता है,

बचपन बीत जाता है,

जवानी बीत जाती है,

प्रौढ़ावस्था भी बीत जाती है।

अंततः बुढ़ापे में मनुष्य समझता है कि

जीवन कितनी तेजी से हाथ से निकल गया।

मृत्यु के समय

न धन साथ जाता है,

न सोना-चाँदी,

न संपत्ति,

न पद-प्रतिष्ठा।

खाली हाथ आए हैं,

खाली हाथ ही जाएँगे।

सिकंदर जैसे महान विजेता को भी

भारत की धरती पर एक साधु ने

धन-संपत्ति की वास्तविकता का बोध कराया—

मनुष्य अंततः अपने साथ कुछ नहीं ले जा सकता।

मेरे अपने देश ने मुझे सिखाया—

अपने भीतर झाँको,

अपनी आत्मा को पहचानो,

आत्मज्ञान प्राप्त करो।

माया मनुष्य को बाँधती है—

नारी-सुख, संतान-प्रेम,

धन-दौलत और संसार के अनेक मोह

जीवन को अपनी ओर खींचते रहते हैं।

फिर भी इस धरती की महान शिक्षा है—

जीते-जी सुकर्म करो,

परोपकार करो,

दूसरों के जीवन में सुख और शांति बाँटो।

“वही मनुष्य है

जो दूसरों के लिए जीता है।”

ऐसी है मेरी धरती—

त्याग की भूमि,

ज्ञान की भूमि,

निर्गुण-सगुण भक्ति की भूमि,

शांति की भूमि,

अहिंसा की भूमि,

संतोष की भूमि,

आध्यात्मिक साधना की भूमि।

अपनी धरती, अपना जीवन—

यही मेरी पहचान,

यही मेरा गौरव,

यही मेरा भारत।

मेरी धरती मेरा जीवन,

मेरा जीवन ब्रह्मानंद से भरा।

यह भारत केवल मेरी जन्मभूमि नहीं, मेरी आत्मभूमि है—जिसकी मिट्टी में ऋषियों का तप, वीरों का बलिदान और संतों की करुणा आज भी धड़कती है। इसकी सेवा करना मेरे लिए पूजा है, इसके जन-जन में ईश्वर को देखना मेरी साधना है। जब तक मेरे हृदय में प्राण हैं, तब तक भारत की गरिमा, एकता और मानवता के लिए मेरा जीवन समर्पित रहेगा।

भारतभूमि विश्व में महान!

वंदे मातरम्!

இராம தாரிசிங் தினகரன் रामधारी सिंह दिनकर।

 राष्ट्र कवि रामधारी सिंह दिनकर।

23-9-दिनकर  की जयंति।

हिंदी तमिऴ सेवा।

ஹிந்தி தமிழ் பணி.

     आज की मनोदशा मेरी,

     साहस देती है  रामधारी दिनकर की कविता।

 இன்றைய உள்ளத்தின் நிலையில் 

துணிச்சல் தரும் திரு 

ராமதாரி திலகரின் கவிதை.

 அவரின் கவிதை மிகவும் 

 வையக அன்பைப் பெற்றவை.

कवि का योगदान चिरस्मरणीय और चिर अनुकरणीय हैं।

கவியின் பங்களிப்பு 

நீடூழி நினைவில் நிற்பவை.

நீடூழி பின் பற்றப் படுபவை.



 उनकी कविताएँ अति लोकप्रिय।

 அவருடைய மிகவும் புகழ்பெற்ற இரண்டு கவிதைகள்

.

  उनकी दो कविताएँ 

१.राम,तुम्हारा नाम।

 राम ! तुम्हारा नाम कंठ में रहे,

ह्रदय, जो कुछ भेजो,वह सहे

दुख से त्राण न माँगूँ।

 माँगूँ केवल दुख सहने की,

दुर्दिन को भी मान तुम्हारी दया,

अकारण ध्यान मग्न रहने की।

देख तुम्हारे मृत्यु दूत को डरूँ नहीं।

न्योछावर होने में दुविधा करूँ नहीं।

तुम चाहो,दूँ वही 

कृपण हो प्राण नहीं माँगूँ।

1. ராமா, உன் பெயர்.

  இராம நாமம்  என் நினைவில் என் உள்ளத்தில் இருக்கட்டும்.

நீ எதை அளித்தாலும்  

அதைப் பொறுத்துக் கொள்வேன்.

 இன்னலைக்  கண்டு   

பாதுகாப்பு  கேட்க மாட்டேன்.


துன்பத்தைசகிக்கும்  

சக்தி மட்டுமே கேட்பேன்.

துன்ப நாட்களையும் உன்

 தயை எனக் கருதும்  ஆற்றல் வேண்டும்.

அச்சமின்றி உன் தியானத்தில் 

மூழ்கும் ஆற்றல் வேண்டும்.


உன் மரணதூதனைக்கண்டு 

 அஞ்சாத தன்மை வேண்டும்.

உயிர்த் தியாகம் செய்வதற்கு 

 தடுமாற்றம் கூடாது.

நீ விரும்புவதை ஏற்பேன்.

கருமியாகி உயிர் கேட்க மாட்டேன்.


2.உணவும் விடுதலையும்.

 விடுதலை கிடைத்தது விட்டது.

आज़ादी तो मिल गई 

இந்த கௌரவம் பாதுகாக்கப் படுமா?

यह गौरव कहाँ जुगाएगा?

मर भुखे!   इस घबराहट में तू बेच तो न खा जाएगा।

 பசி மரணம்! இந்த படத்தில்

இதை விற்று 

சாப்பிடமாட்டாயல்லவா?


आज़ादी रोटी नहीं, दोनों में कोई वैर नहीं।

விடுதலை உணவல்ல. 

இரண்டிற்கும் பகை இல்லை.

पर भूख बेताब हुई तो दोनों में कोई वैर नहीं।

ஆனால்   பசி அதிகமாகி அமைதியற்ற   நிலையானால்

சுதந்திரம்  நல்ல தல்ல.

हो रहे आज़ादी को हर ओर लगा देनेवाले 

पशुओं को रोटी दिखा फिर उन्हें साथ लगा लेनेवाले

इनके  जादू का जोर भला कब तक बुभुक्ष सह सकता है

சுதந்திரத்தைப் பறிப்பவர்களும், ஆசை காட்டி பிறரைத் தங்கள் பக்கம் இழுப்பவர்களும் செய்யும் தந்திரம் எவ்வளவு காலம் பசியால் வாடுபவர்களை அடக்கி வைத்திருக்க முடியும்?

हैं कौन पेट की ज्वाला में पड़कर मनुष्य रह सकता है।

झेलेगा यह बलिदान? भूख की घनी चोट सह पाएगा?

आ पड़ी विपद तो क्या प्रताप -सा घास चबा रहा पाएगा।

हे बड़ी बात आज़ादी का पाना ही नहीं जुड़ाना भी

बलि एक बार ही नहीं, उसे पड़ता फिर फिर दुहराना भी।


பசியின் கொடுமை

பசியின் நெருப்பில் சிக்கி,
மனிதன் எப்படி மனிதனாக இருக்க முடியும்?

இந்தத் தியாகத்தைத் தாங்குவானா?
பசியின் கடுமையான தாக்குதலை
அவனால் பொறுத்துக்கொள்ள முடியுமா?

வந்துவிட்டால் பெரும் துன்பம்,
மகாராணா பிரதாப் போல்
புல்லைக்கூட மென்று உண்ணத் தயாராக இருப்பானா?

சுதந்திரத்தைப் பெறுவது மட்டுமல்ல,
அதைப் பாதுகாத்துப் பேணுவதும் பெரிய செயல்.

தியாகம் ஒருமுறை செய்வதோடு முடிவதில்லை;
அதை மீண்டும் மீண்டும்
செய்ய வேண்டிய நிலை ஏற்படும்.







 

















 







Saturday, September 19, 2026

औवैयार के गीत

 वरिष्ठ हूँ, बेकार नहीं।

 कुछ लिखता हूँ, 

 आशा है वह व्यर्थ नहीं।

 

नालडियार तमिल जैन ग्रंथ।

मेरा ब्लॉग तमिल हिंदी संपर्क देखिए पूरा ग्रन्थ।


 பாடல்-101


 गायों  के दल  से भले ही  बछड़ा छूट  जाएँ,


वह बछड़ा  अपनी माँ  के पास पहुँचने में अति चतुर.


वैसे ही पूर्व-जन्म की विधि की विडम्बना ,


कर्ता तक पहुँचने में है ही  चतुर.


பல்லாவுள் உய்த்து விடினும் குழக்கன்று


வல்லதாம் தாய்நாடிக் கோடலைத் - தொல்லைப்


பழவினையும் அன்ன தகைத்தேதற் செய்த


கிழவனை நாடிக் கொளற்கு


பல பசுக்களின் கூட்டத்தில் கொண்டு போய் விட்டாலும் இளைய பசுங்கன்று தன் தாயைத் தேடி அடைதலில் வல்லதாகும். அது போல முற்பிறப்பிற் செய்த பழவினையும், அவ்வினை செய்தவனைத் தேடி அடைதலில் வல்லமை யுடையதாகும்.


பாடல் 102


खूबसूरती  ,जवानी,श्रेष्ठ संपत्ति,भय दिखानेवाले पद आदि हैं अस्थिर.


यह देख -समझकर  भी एक भी सद्कर्म न करें तो


 जन्म लेकर भी उसका जन्म 


अर्थहीन बेकार  ही अंत होनेवाला है.


உருவும் இளமையும் ஒண்பொருளும் உட்கும்


ஒருவழி நில்லாமை கண்டும் - ஒருவழி


ஒன்றேயும் இல்லாதான் வாழ்க்கை உடம்பிட்டு


நின்றுவீழ்ந் தக்க துடைத்து


அழகும், வாலிபமும், மேன்மையான பொருளும், பலர் அஞ்சத்தக்க மதிப்பும் ஓரிடத்தில் நிலைத்திராமையைப் பார்த்தும், யாதேனும் ஒரு வகையில் ஒரு நற்செயலும் செய்யாதவனுடைய வாழ்க்கை, உடலெடுத்துச் சில காலம் நின்று பயனில்லாது பின் அழிந்து போகும் தன்மையுடையது.


பாடல்-103


 कोई भी ऐसा नहीं,जो समृद्ध जीवन  न चाहता हो;


जैसे फलों का रूप -रंग -स्वाद  प्राकृतिक देन  है,


वैसे ही सुख-दुःख अपने-आप मिलनेवाला है,इसीलिए 


जो चाहते हैं सुख-संपत्ति ,उनको चाहिए सद्कर्म करना.


வளம்பட வேண்டாதார் யார்யாரு மில்லை;


அளந்தன போகம் அவரவர் ஆற்றான்


விளங்காய் திரட்டினார் இல்லை களங் கனியைக்


காரெனச் செய்தாரும் இல்


செல்வம் முதலியவற்றால் வளமுடன் வாழ்தலை விரும்பாதவர் யாரும் உலகில் இல்லை. ஆனால் அவரவர் செய்த புண்ணியங்களுக்கு ஏற்ப அவரவர்களுடைய இன்ப நுகர்வுகள் (சுகபோகங்கள்) வரையறை செய்யப்பட்டுள்ளன. விளாங்காயை உருண்டை வடிவமாகச் செய்தவரும் இல்லை களாப்பழத்தைக் கருமையுடையதாகச் செய்தவரும் இல்லை! (விளாங்காய் ஒருவரால் திரட்டப்படாமல் இயற்கையாகத் திரண்டிருப்பது போலவும், களாப்பழம் ஒருவரால் கறுப்பாக்கப்படாமல் தானே கறுப்பாய் இருப்பது போலவும், அவரவர் இன்பமும் அவரவர் புண்ணிய இயற்கையால் அமைந்துள்ளது. ஆகவே இன்பம் விரும்புவோர் நல்வினையே செய்தல் வேண்டும்).


பாடல்-104


जो बुराई आती हैं ,उनको ऋषि-मुनि भी रोक नहीं सकते .वैसे ही 


आनेवाली भलाइयों को  कोई भी रोक नहीं  सकते.


वर्षा  न हुयी ,तो कोई भी बरसा नहीं सकते;


जोर की वर्षा हो तो कोई भी रोक नहीं  सकते.


உறற்பால நீக்கல் உறுவர்க்கும் ஆகா,


பெறற்பால அனையவும் அன்னவாம் மாரி


வறப்பின் தருவாரும் இல்லை அதனைச்


சிறப்பின் தணிப்பாரும் இல்.


வந்து சேரும் தீமைகளை முனிவர்களாலும் தடுக்க முடியாது! அவ்வாறே பெறக் கூடிய நன்மைகளையும் யாராலும் தடுக்க முடியாது! மழை பெய்யாது ஒழிந்தால் அதனைப் பெய்விப்பாரும் இல்லை! அதிகமாகப் பெய்தால் அதனைத் தடுத்து நிறுத்துவாரும் இல்லை!


பாடல்-105


ताड के पेड़ समान,जो सम्मान  के शिखर पर है ,


वे भी तिनके समान  सम्मान खो बैठेंगे.


इसके  कारण  पूर्व जन्म के बद्कर्म के फल ही है.


और कोई कारण है नहीं.


தினைத்துணைய ராகித்தந் தேசுள் அடக்கிப்


பனைத்துணையார் வைகலும் பாடழிந்து வாழ்வர்;


நினைப்பக் கிடந்தது எவனுண்டாம் மேலை


வினைப்பயன் அல்லால் பிற.


பனை அளவாக உயர்ந்த பெருமை மிக்கவரும் தினையளவாகச் சிறுத்துச் சிறுமையுற்று வருந்தி வாழ்வர்! இதற்குக் காரணம் முற்பிறப்பில் செய்த தீவினையின் பயனேயன்றி வேறில்லை. (உயர்ந்தோர் தாழ்ந்தோர் ஆவதற்குக் காரணம் முன் செய்வினையே).


பாடல்-106


 आप  जानते हैं ,कई चतुर होशियार अल्प आयु में मर जाते हैं,


अशिक्षित लोग दीर्घ  जीवन बिताते हैं,


इसका कारण सार हीन होना ही है,


रस  हीनों को यम जीने देते हैं.


பல்லான்ற கேள்விப் பயனுணர்வார் வீயவும்


கல்லாதார் வாழ்வதும் அறிதிரேல் - கல்லாதார்


சேதனம் என்னுமச் சாறகத் தின்மையால்


கோதென்று கொள்ளாதாம் கூற்று.


பல மேன்மைப்பட்ட நூற்கேள்விகளின் பயனை அறிந்தவர்கள் இறப்பதையும், அறிவீனர்கள் நீடு வாழ்வதையும் அறிந்திருக்கிறீர்கள்! இதற்குக் காரணம், அறிவு என்னும் 'சாறு' கல்லாதார் உள்ளத்தில் இல்லாமையால் அவர்களை வெறும் 'சக்கை' என்று நினைத்து எமன் கொள்வதில்லை.


பாடல்-107


अदम्ब  नामक लताओं को हंस तोड़ते हैं,


लहरों वाले सागर के किनारे पर रहनेवाले नृप!जान  लो.


बड़े महल में रहनेवाले , और उसके सामने खड़े होकर भीख माँगनेवाले ,


ये सब पूर्व जन्म के पाप -पुण्य  के फल ही है.


இடும்பைகூர் நெஞ்சத்தார் எல்லாரும் காண


நெடுங்கடை நின்றுழல்வ தெல்லாம் - அடம்பப்பூ


அன்னங் கிழிக்கும் அலைகடல் தண்சேர்ப்ப


முன்னை வினையாய் விடும்.


அடம்பங் கொடியின் மலர்களை அன்னங்கள் கோதிக் கிழிக்கும் அலைகடலினது குளிர்ச்சியாகிய கரையையுடைய மன்னனே! சிலர் துன்பம் மிகுந்த மனமுடையவராகி யாவரும் காண, பெரிய வீடுகளின் தலைவாயிலில் நின்று பிச்சை கேட்டு வருந்தும் செயல் எல்லாம் முற்பிறப்பிற் செய்த தீவினையின் பயனே ஆகும். (வறுமைக்குக் காரணம் தீவினையே).


பாடல்-108


शहद और लम्बे समुद्रके किनारे पर शासन करनेवाले नृप!


जान-समझ  लो,


बुद्धिमान चतुर होशियार भी अपयश के कर्म करते हैं,


इसके कारण भी पूर्व-जन्म के कर्म-फल ही हैं.


அறியாரும் அல்லர் அறிவ தறிந்தும்


பழியோடும் பட்டவை செய்தல் - வளியோடி


நெய்தல் நறவுயிர்க்கும் நீள்கடல் தண்சேர்ப்ப!


செய்த வினையான் வரும்.


காற்று வீசி நெய்தல் நிலங்களிலே தேனைச் சிந்தும் நீண்ட கடலினது குளிர்ச்சி பொருந்திய கரையையுடைய வேந்தனே! அறிவீனராக இன்றி அறிவுடையவராகத் திகழ்ந்தாலும் சிலர், பழியுடன் கூடிய செயல்களைச் செய்தல், முற்பிறப்பிற் செய்த தீவினையின் விளைவாகும். (நல்லறிவு கெடுதற்கும் காரணம் தீவினையே).


பாடல்-109


समुद्र से घेरे  अग जग में जीनेवाले सब,


ज़रा भी हानि  न चाहेंगे;


भला ही चाहेंगे; फिर भी 


पूर्व-जन्म के कर्म-फल  के अनुसार 


जो आना है,आजायेगा.


ஈண்டுநீர் வையத்துள் எல்லாரும எத்துணையும்


வேண்டார்மன் தீய; விழைபயன் நல்லவை;


வேண்டினும் வேண்டா விடினும் உறற்பால


தீண்டா விடுதல் அரிது.


மிகுதியான நீரையுடைய கடலால் சூழப்பட்ட இவ்வுலகில் வாழும் எல்லாரும் சிறிய தீமையையும் விரும்பமாட்டார்கள். நல்லதையே விரும்புவார்கள். ஆனால் அவர்கள் விரும்பினாலும் விரும்பாவிட்டாலும் முன்வினைப் பயனால் வரத்தக்கவை வராமற் போவதில்லை.


பாடல்-110


गर्भ में उत्पन्न  विधि शिरोरेखा  कर्म फल  न होगा  कभी कम.


न बढेगा;न घटेगा; नियम न बदलेगा;


जो भोगना है ,वे उचित समय पर आ ही जाएगा;


फिर भी मनुष्य क्यों होता हैं दुखी अपने अंतिम समय पर;


சிறுகா பெருகா முறைபிறழ்ந்து வாரா


உறுகாலத் தூற்றாகா ஆமிடத்தே யாகும்


சிறுகாலைப் பட்ட பொறியும் அதனால்


இறுகாலத் தென்னை பரிவு.


கரு அமைந்த காலத்திலேயே உண்டான ஊழ் வினைகள் குறையமாட்டா வளரமாட்டா முறைமாறி வரமாட்டா துன்பம் வந்த காலத்தே ஊன்றுகோலாக மாட்டா எவையும் வரவேண்டிய காலத்தே வந்து சேரும். அப்படியிருக்க மரண காலத்தில் ஒருவன் வருந்துவது ஏன்?

Thursday, September 17, 2026

பிபரே ராமரசம்

कबीर।

तमिल हिंदी सेवा। தமிழ் ஹிந்தி பணி 

 கற்றது கை மண் அளவு கல்லாதது உலகளவு.


 "रामरस" (बिबरे रामरस / राम रस मीठो घणो)यह कबीर जी का एक दूसरा बेहद लोकप्रिय भजन है, जिसे लोक संगीत में "बिबरे रामरस", "राम रस मीठो घणो" या "रामरस ऐसो है मेरे भाई" के नाम से गाया जाता है। यहाँ 'रामरस' का अर्थ ईश्वर की भक्ति या आत्मज्ञान के अमृत (रस) से है।इस भजन की प्रसिद्ध पंक्तियाँ इस प्रकार हैं:राम रस मीठो घणो रे जोगिया, पीवे सो अमर हो जाए।ध्रुव पियो, प्रहलाद पियो रे जोगिया, पीयो वो रैदास।भगत कबीरा भर-भर पीयो, फिर भी पीवण री आस॥

 பகவானின் இராமனுடைய பெயர் உண்மையான இரசாயனம். அதாவது மருந்து.அது அன்பு ரசத்திற்கு சமமானது.

இந்த இராசயன மருந்து மிகவும் இனிப்பானது.

ஆனந்தம் அளிக்கக் கூடியது.

ஆனால் இந்த அன்பு ரசத்தைப் பெறுவது மிகவும் அரிதானது.

இதைப் பெற சாதகன் தனது ஆணவத்தை விட்டு விட வேண்டும். 

அது எப்படி என்றால் மது விற்பவன்  குடிப்பவனிடம் இருந்து  அனைத்தையும்  கேட்பான்.

பகவானின் பக்தியில் அனைத்தையும் அர்ப்பணிக்க வேண்டும்.

 சுயநலம் கூடாது.

Wednesday, September 16, 2026

दिलासा

 मैं सकुशल हूँ।

நான் நலம்.


पर मेरी प्रिय

ஆனால் என் அன்பு 

 अर्द्धांगिनी ईश्वर के

மனைவி கடவளிடம் 

 यहाँ चल बसी। 

சென்றுவிட்டாள்.

तीन महीने हो गये।‌

மூன்று மாதங்கள் ஆகிவிட்டன.

 विधि की विडंबना।

விதியின் விளையாட்டு.

 वेदना की चरम सीमा।

வேதனையின் இறுதி எல்லை.

 सब को दिलासा

 देनेवाला मैं 

அனைவருக்கும்  ஆறுதல் அளிக்கும் நான்

अपने को देने में असमर्थ हूँ।

எனக்கு அளித்துக் கொள்ள சாமார்த்தியம் இல்லை.

भक्ति यात्रा   अहोबलमठ नव नरसिंह मंदिर दोनों मिलकर गये थे। 

இருவரும் ஷா சென்ற பக்தி உலா அஹோபலமணம்.

   भगवान को भी हमारा आनंद से ईर्ष्या हो गयी।

இறைவனுக்

கும் எங்கள் ஆனந்தத்தின் மீது பொறாமை.

 मुझसे मेरी प्यारी प्राण प्रिया के प्राण पखेरू लेकर चले गये।

என்னிடம் இருந்து  என் உயிர்ப் பறவையை எடுத்துச் சென்று விட்டார்.

 अकेला जीवन ,

தனிமையான வாழ்க்கை 


मेरी हर इच्छा वह स्वयं जानकर पूरी करती थी।

என் ஒவ்வொரு விருப்பத்தையும் அவளே அறிந்து கொண்டு பூர்த்தி செய்து வந்தாள்.

 ஏன் இந்த சோதனை.

 புரியாத புதிர்.


Saturday, September 12, 2026

भाग्यशाली பாக்யவான்.

 आज की चुनौती

भाग्यशाली

தமிழ் ஹிந்தி பணி 

तमिल हिंदी सेवा 

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु।


कोई भाग्यशाली है या नहीं,

क्या यह उसके जन्म से ही

पता चल जाता है?

 ஒருவன் அதிர்ஷ்டம் 

உள்ளவனா? இல்லையா ?

இது அவன் பிறப்பிலேயே தெரிந்து விடுகிறது.


राजमहल में जन्मे

सिद्धार्थ के जन्म लेते ही

ज्योतिषियों ने कहा—

“यह बालक संन्यासी बनेगा।”

 அரண்மனைனையில் பிறந்த 

சித்தார்த்தர் பிறந்தது மே

சோதிடர் அவன் துறவி ஆவார் என்று சொன்னார்.


किसी का जन्म फुटपाथ पर,

किसी का जन्म रंक के घर,

तो किसी का जन्म

रईस के घर होता है।

 சிலர் நடைபாதையில் 

சிலர் ஏழை வீட்டில்

சிலர் பணக்கார வீட்டில் 

பிறக்கின்றனர். 


कोई जन्म से अपाहिज,

कोई दीर्घ रोगी,

तो कोई जन्म से ही दरिद्र।

 சிலர் பிறவியிலேயே 

அங்கஹீனர்கள். 

 தீராத நோயாளிகள் 

தரித்திரர்கள்


फिर भी समय के साथ

सबका भाग्य बदलता है।

பிறகும் காலத்தால் 

எல்லோரின் பாக்கியம் மாறுகிறது.


बेवकूफ समझे गए

महाकवि कालिदास बने।

महारथी कर्ण

अनाथ होकर भी महान बने।

दासी-पुत्र विदुर

राजसभा के ज्ञानी बने।

முட்டாள் என்று அறியப்பட்டவர்

 மஹாகவி காளிதாசர் ஆனார்.


 பணிப்பெண் மகன் விதுரன்

அரண்மனை அறிஞன் ஆனான்.

सुदामा निर्धन थे,

पर श्रीकृष्ण के

सहपाठी और सखा थे।

சதாரா ஏழை ஆனால் ஸ்ரீ கிருஷ்ணனினுடன் படித்தவர் தோழர்.


चाय बेचने वाला व्यक्ति

अपने परिश्रम और संघर्ष से

भारत का प्रधानमंत्री बना।

 தேநீர் விற்கின்ற மனிதர்

தன் உழைப்பாலும் போராட்டத்தாலும்

பாரதப் பிரதமர் ஆனார்.


अचानक दुर्योधन की मित्रता ने

कर्ण को अंगदेश का राजा बना दिया,

तो पांडवों को वनवास भोगना पड़ा।

திடிரென்று துரியோதனின் நட்பால்

கர்ணன் அங்கதேச மன்னரானார்.


युद्ध में पांडव विजयी हुए,

फिर भी उनके जीवन में

उल्लास के स्थान पर

उदासी ही अधिक रही।

 போரில் பாண்டவர்கள் 

 வென்றாலும் 

அவர்களின் வாழ்க்கை 

உல்லாசத்திற்குப் பதிலாக 

வருத்தமே அதிகம்.


उर्मिला भाग्यशाली थीं

या अभाग्यशाली?

यशोधरा भाग्यशाली थीं

या अभाग्यशाली?

ஊர்மிளா அதிர்ஷ்டம் உள்ளவளா?

துரதிர்ஷ்டமானவளா?

அப்படி மே யசோதராவும்.


गली का कुत्ता

और अमीर का पालतू कुत्ता—

भाग्यशाली कौन?

தெரு நாய் 

 பணக்கார நாய்

யார் பாக்கியசாலி.

अभागा कौन?


नवग्रहों की दृष्टि से

भाग्य को मापें,

या जीवन के अनुभवों से?

 நவகிரஹப் பார்வையால்

அதிர்ஷ்டத்தை அளப்பதா? அல்லது 

வாழ்க்கை அனுபவத்தாலா?


बाढ़, सुनामी और कोरोना जैसी

अचानक आने वाली आपदाओं ने

भाग्यशाली समझे जाने वाले लोगों को भी

असहाय और अनाथ बना दिया।

 வெள்ளம், சுனாமி,கொரானா

பாக்யசாலி என்பவர்களையும்

உதவியற்றவர்களாக அநாதைகளாக

ஆக்கி விட்டன.


जीवन में भाग्य और दुर्भाग्य

कब, किस रूप में आएँगे—

कहा नहीं जा सकता।

 வாழ்க்கையில் பாக்கியம் துர்பாக்கியம் எந்த வடிவில் வரும் 

என்று சொல்ல முடியாது.



सीता के जीवन में

रावण भी आया

और धोबी भी।

சீதையின் வாழ்க்கையில் இராவணனும் வந்தான் வண்ணானும வந்தான்.


यही तो मानव-जीवन है—

कभी भाग्य का उदय,

कभी दुर्भाग्य की छाया।

இதுதான் மனித வாழ்வு

 ஒருசமயம் பாக்கியோதயம்

மறு சமயம் துர்பாக்கிய நிழல்.


वास्तव में भाग्यशाली वही है

जो परिश्रम करता है,

धैर्य रखता है

और भगवान के अनुग्रह को

जीवन का सहारा मानता है।

உண்மையில் உழைப்பவன் அதிர்ஷ்ட சாலி..

தைரியமாக இருப்பான்.

பகவானின் அனுக்ரகத்தால்

வாழ்க்கையின் உதவியாளன் ஆகிறான்.


फिर भी प्रश्न वही है—

कौन भाग्यशाली?

कौन अभागा?

பிறகும் கேள்வி எழுகிறது 

 யார் பாக்கியசாலி?

யார் துர்பாக்கிய சாலி.


इसका निश्चित उत्तर

शायद स्वयं भगवान के पास ही है।

 இதன் நிச்சயமான பதில்

கடவுளிடம் தான் உள்ளது.

 சே. அனந்த கிருஷ்ணன் சென்னை