वेद धर्म के अनुसार परोपकार।
अहंकार रहित
सार्वजनिक सेवा करना
परोपकार है।
परोपकार निस्वार्थ रूप में
कीर्ति की इच्छा रहित करना है।
पाप मैं ने किया कहने पर,
पाप मिट जाता है,
वैसे ही मैं ने परोपकार किया है
कहने पर पुण्य मिट जाएगा।
दाये हाथ का परोपकार,
बारे हाथ को मालूम न होना चाहिए।
प्राकृतिक पेड़,पौधे,नदी,मेघ सब
परोपकार के लिए हैं, वे अपने स्वार्थ के लिए
संचित नहीं रखते।
अतिथि देवो भव भारतीय सिद्धांत।
अतिथियों की सेवा भी परोपकार है।
भारतीय परोपकार में भेद भाव नहीं होते।
वसुधैव कुटुंबकम्।
सारे संसार को परिवार समझकर
भेदभाव रहित सब की सेवा करना परोपकार है।
मन से सुविचार सोचना ,
सांसारिक कल्याण के लिए प्रकट करना भी परैपकार ही है।
नीतिशास्त्र बचपन से ही परोपकार सिखाते हैं।
सांसारिक सेवा करने इस शरीर का धारण करते हैं।
परोपकार वर्मा इदम् शरीरम।
सज्जनों की सारी शक्तियाँ, संपत्तियाँ
परोपकार कै लिए हैं।
परोपकार सदाम् विभूतय:।
परोपकार काम फलौति वृक्ष:।
पेड़ों पर फल परोपकार के लिए।
परोपकरार्थम् वहंति नद्यः
परोपकार के लिए नदी बहती है।
परोपकार सामर्थ्य दुहंती कावः।
मनुष्य शरीर का धारण भी परोपकार के लिए।
सज्जनों की क्षमताएँ, धन संपत्ति आदि
परोपकार के लिए ही।
दान धर्म को तुरंत करना है, स्थगित करना सही नहीं।
काल कब आएगा पता नहीं।
अजरामवत् प्राज्ञः विद्याम् अर्थम् च साधयेत्।
गृही तो इन केशेषु धर्म आचरेत।।
[13/10, 6:31 am] sanantha.50@gmail.com: वेद धर्म के अनुसार परोपकार।
अहंकार रहित
सार्वजनिक सेवा करना
परोपकार है।
परोपकार निस्वार्थ रूप में
कीर्ति की इच्छा रहित करना है।
पाप मैं ने किया कहने पर,
पाप मिट जाता है,
वैसे ही मैं ने परोपकार किया है
कहने पर पुण्य मिट जाएगा।
दाये हाथ का परोपकार,
बारे हाथ को मालूम न होना चाहिए।
प्राकृतिक पेड़,पौधे,नदी,मेघ सब
परोपकार के लिए हैं, वे अपने स्वार्थ के लिए
संचित नहीं रखते।
अतिथि देवो भव भारतीय सिद्धांत।
अतिथियों की सेवा भी परोपकार है।
भारतीय परोपकार में भेद भाव नहीं होते।
वसुधैव कुटुंबकम्।
सारे संसार को परिवार समझकर
भेदभाव रहित सब की सेवा करना परोपकार है।
मन से सुविचार सोचना ,
सांसारिक कल्याण के लिए प्रकट करना भी परैपकार ही है।
नीतिशास्त्र बचपन से ही परोपकार सिखाते हैं।
सांसारिक सेवा करने इस शरीर का धारण करते हैं।
परोपकार वर्मा इदम् शरीरम।
सज्जनों की सारी शक्तियाँ, संपत्तियाँ
परोपकार कै लिए हैं।
परोपकार सदाम् विभूतय:।
परोपकार काम फलौति वृक्ष:।
पेड़ों पर फल परोपकार के लिए।
परोपकरार्थम् वहंति नद्यः
परोपकार के लिए नदी बहती है।
परोपकार सामर्थ्य दुहंती कावः।
मनुष्य शरीर का धारण भी परोपकार के लिए।
सज्जनों की क्षमताएँ, धन संपत्ति आदि
परोपकार के लिए ही।
दान धर्म को तुरंत करना है, स्थगित करना सही नहीं।
काल कब आएगा पता नहीं।
अजरामवत् प्राज्ञः विद्याम् अर्थम् च साधयेत्।
गृही तो इन केशेषु धर्म आचरेत।।
[13/10, 6:35 am] sanantha.50@gmail.com: परोपकार।
(वेदधर्म के अनुसार)
एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु
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परोपकार का वास्तविक स्वरूप
अहंकार रहित होकर
जनकल्याण के लिए
निःस्वार्थ भाव से सेवा करना
ही सच्चा परोपकार है।
परोपकार वह है,
जिसमें स्वार्थ न हो,
कीर्ति की कामना न हो,
प्रशंसा की अपेक्षा न हो,
केवल लोककल्याण की भावना हो।
पाप करने के बाद
पश्चात्तापपूर्वक अपनी भूल स्वीकार करना
सुधार की दिशा में पहला कदम है।
उसी प्रकार,
अपने परोपकार का स्वयं प्रचार करना
उसकी निःस्वार्थ भावना को कम कर सकता है।
दाएँ हाथ से किया गया दान
बाएँ हाथ को भी पता न चले।
यही निःस्वार्थ सेवा का आदर्श है।
प्रकृति भी सिखाती है परोपकार
पेड़-पौधे, नदियाँ और मेघ
प्रकृति के अनुपम उपहार हैं।
वे अपने लिए नहीं,
दूसरों के जीवन के लिए जीते हैं।
पेड़ अपने फल स्वयं नहीं खाते,
नदियाँ अपना जल स्वयं नहीं पीतीं,
मेघ वर्षा करके धरती को तृप्त करते हैं।
प्रकृति का प्रत्येक उपहार
मानवता को परोपकार का पाठ पढ़ाता है।
परोपकाराय फलन्ति वृक्षाः।
पेड़ दूसरों के हित के लिए फलते हैं।
परोपकाराय वहन्ति नद्यः।
नदियाँ दूसरों के कल्याण के लिए बहती हैं।
भारतीय संस्कृति में परोपकार
अतिथि देवो भव।
अतिथि को देवतुल्य मानकर
उसका आदर-सत्कार करना
भारतीय संस्कृति का महान आदर्श है।
अतिथि की सेवा भी परोपकार है।
भारतीय संस्कृति हमें सिखाती है
कि सेवा में जाति, धर्म, भाषा,
ऊँच-नीच और अमीरी-गरीबी का
कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए।
वसुधैव कुटुम्बकम्।
अर्थात्, समस्त पृथ्वी
एक परिवार है।
संपूर्ण संसार को अपना परिवार मानकर
सबके प्रति प्रेम रखना,
सामर्थ्य के अनुसार सहायता करना
और भेदभाव रहित सेवा करना
ही परोपकार का व्यापक स्वरूप है।
मन में सद्विचार उत्पन्न करना,
उन्हें समाज के हित में व्यक्त करना
और दूसरों को सद्मार्ग दिखाना भी
परोपकार ही है।
नीतिशास्त्र और परोपकार
हमारे नीतिशास्त्र
बचपन से ही परोपकार की शिक्षा देते हैं।
मानव जीवन केवल
अपने सुख-साधनों के लिए नहीं है।
यह जीवन दूसरों के दुःख दूर करने,
पीड़ितों की सहायता करने
और समाज के कल्याण में योगदान देने के लिए भी है।
परोपकारार्थमिदं शरीरम्।
अर्थात्, यह शरीर परोपकार के लिए है।
सज्जनों की शक्तियाँ,
उनकी योग्यताएँ और संपत्तियाँ
केवल उनके निजी सुख के लिए नहीं,
बल्कि लोककल्याण के लिए भी हैं।
सतां विभूतयः परोपकाराय।
सज्जनों की विभूतियाँ
परोपकार के लिए होती हैं।
परोपकार ही सच्ची संपत्ति
वृक्ष अपने फल दूसरों को देते हैं,
नदियाँ अपना जल सबको देती हैं,
गाय अपने दूध से दूसरों का पोषण करती है।
इसी प्रकार,
मनुष्य को भी अपनी योग्यता,
ज्ञान, समय और संपत्ति का
यथाशक्ति सदुपयोग
दूसरों के कल्याण के लिए करना चाहिए।
धनवान होना ही महानता नहीं है;
धन का सदुपयोग करना महानता है।
विद्वान होना ही पर्याप्त नहीं है;
अपने ज्ञान से दूसरों को लाभ पहुँचाना
सच्ची विद्वत्ता है।
शक्तिशाली होना ही श्रेष्ठता नहीं है;
अपनी शक्ति से निर्बलों की रक्षा करना
वास्तविक श्रेष्ठता है।
दान और धर्म का महत्त्व
दान करने का शुभ विचार आए,
तो यथासंभव उसे टालना नहीं चाहिए।
समय अनिश्चित है।
कल का अवसर मिलेगा या नहीं,
यह कोई नहीं जानता।
इसलिए अपनी सामर्थ्य के अनुसार
अन्नदान, विद्यादान, धनदान
और सेवा के अन्य कार्य
समय रहते करने चाहिए।
अजरामरवत् प्राज्ञो विद्यामर्थं च साधयेत्।
गृहीत इव केशेषु मृत्युना धर्ममाचरेत्॥
भावार्थ:
बुद्धिमान व्यक्ति को
विद्या और धन अर्जित करने में
ऐसे प्रयत्नशील रहना चाहिए,
मानो वह दीर्घजीवी हो।
परंतु धर्माचरण और सत्कर्म करने में
ऐसी तत्परता रखनी चाहिए,
मानो मृत्यु ने उसके केश पकड़ रखे हों।
अर्थात्, सत्कर्म को कल पर मत टालिए।
उपसंहार
परोपकार केवल धन देना नहीं है।
प्रेम से बोलना भी परोपकार है।
दुःखी मनुष्य को सांत्वना देना परोपकार है।
भूखे को भोजन देना परोपकार है।
प्यासे को पानी देना परोपकार है।
अज्ञानी को ज्ञान देना परोपकार है।
और निराश व्यक्ति में आशा जगाना भी परोपकार है।
निःस्वार्थ सेवा में अहंकार नहीं,
दान में प्रदर्शन नहीं,
प्रेम में भेदभाव नहीं,
और परोपकार में प्रतिफल की अपेक्षा नहीं।
यही भारतीय संस्कृति का संदेश है।
सर्वे भवन्तु सुखिनः।
सर्वे सन्तु निरामयाः।
सब सुखी हों,
सब निरोग रहें।
इसी लोकमंगल की भावना में
मानव जीवन की सार्थकता है।