तमिऴ भाषा में भक्ति और आध्यात्मिक साहित्य
का अनंत सागर हैं। मानव जीवन अस्थाई है।
आध्यात्मिक दिव्य चिंतन ही ब्रह्मानंद है।
मन की चंचलता मिटानेवाली है। सांसारिक माया से
मानव को बचाने ईश्वर का ध्यान प्रधान है।
ऐसे भक्त कवियों में भगवान कार्तिकेय की कृपा से
कवि बने । पाँच साल तक कुमरगुरुपरर् गूँगे थे।
तिरुच्चेंदूर भगवान कार्तिकेय का पुण्य क्षेत्र है।
उनके माता-पिता शिवकाम सुंदरी और षण्मुख शिखामणि कविरायर
उनको तिरुच्चेंदूर ले गये। वहाँ सुब्रह्मण्य की कृपा से गूंगा बच्चा बोलने लगा।
वर कवि बनकर कंदर कलिवेण्बा की रचना की।भगवान मुरुगन (कार्तिकेय) उनके स्वप्न में बालक के रूप में आकर काव्य रचने का ज्ञान दिया। उनका 1625 ई. में उनका जन्म हुआ। 18 मई महीनेमें 1688 में वारणासी में स्वर्ग सिधार गये। उनके गुरु मासिलामणि देसिकर थे।गुरु की आज्ञा से मुगल काल में सनातन धर्म की रक्षा के लिए काशी पहुँचे।
तब काशी विश्वनाथ मंदिर मुगल बादशाह के अधीन था। कुमरगुरुपरर. काशी मंदिर को सौंपने की आज्ञा दी। तब बादशाह ने अरबी भाषा में बोलने की आज्ञा दी। कुमरगुरुपर् ने
सकल कला वल्ली माला लिखकर बादशाह को तर्क में हराकर काशी को मुगल चंगुल से छुडाया।
तमिलनाडु के ताम्रभरनी नदी तट पर जन्म लेकर गंगा नदी के तट पर स्वर्ग सिधारे।
उनके द्वारा रचित ग्रंथ हैं---मदुरै कलंबकम्, नीति नेरि विलक्कम्, तिरुवारूर नान्मणिमालै,
मुत्तुक्कुमारसामी पिल्लैत तमिल् ,काशी कलंबकम् चितंबरम् मुम्मणिक्कोवै,सकलकला वल्लि मालै आदि।
अब नीति नेरि विलक्कम नीति गीत १०२ के सार हिंदी मेंअनुवाद कर रहा हूँ।
भगवान के अनुग्रह से वह ग्रंथ हिंदी भाषियों को पसंद आएगा।
1. जवानी पानी के बुलबुले के समान है।अति संपत्ति भी हवासे बनी पीनी के बुलबुले के समान है। यह शरीर भी पानी में लिखे अक्षर समान है। जवानी,संपत्तियाँ और शरीर अस्थिर और मिटने वाले हैं। अतः ये सब के रहते ईश्वर की प्रार्थना करनी चाहिए।
शिक्षा की विशेषता
2.
| அறம் பொருள் இன்பமும் வீடும் பயக்கும் புறங்கடை நல் இசையும் நாட்டும் - உறும் கவல் ஒன்று உற்றுழியும் கைகொடுக்கும் கல்வியின் ஊங்கு இல்லை சிற்றுயிர்க்கு உற்ற துணை. अऱम् = धर्म पोरुल = अर्थ, धन इन्बमुम्= सुख भी वीडुम् = मोक्ष भी पुरंगकडै =अपने शहर के बाहर भी नल इसैयुम नाट्टुम् = सुयश देगा। उट्रुलियुम् कैकोडुक्कुम् = होनेवाले दुख के वक्त साथ देगा। कल्वियिन ऊँगु इल्लै = शिक्षा के समान और कोई नहीं चिट्रुयिऱक्कु उट्र तुणै= लघु काल जीनेवाले अल्प ज्ञानी मनुष्य के लिए उपयुक्त साथी । 17वीं शताब्दी के भक्त तमिल कवि काशीवासी मुगलों की आधीनता से काशी मंदिर को छुडाये कुमरगुरुपरर् का कहना है कि मनुष्य धर्म,अर्थ,काम,मोक्ष देनेवाले, होनेवाले दुख के समय साथ देनेवाले ,अपने शहर के बाहर भी सुयश देनेवाले , लघु लघु काल जीनेवाले अल्प ज्ञानी मनुष्य के लिए उपयुक्त साथी विद्या के समान और कोई नहीं है।
शिक्षा का सुख तोडंगुम काल-अध्ययन के प्रारंभिक काल में तुन्बमाय = दुख मय इन्बम् पयक्कुम =बाद में सुख देगा। मडम कोन्ऱु =मूर्खता मारकर अऱिवु = ज्ञान देकर अकट्रुम= अज्ञानता दूर करेगी। नेडुंकामम् -- अधिक कामेच्छा सिल नेर इन्बम् = कम समय का सुख मुट्रिलाय = सुंदर आभूषण की सुंदरी पिन पयक्कुम पीलै पेरितु = कामांधता में आनेवाले संताप अधिक है। 17वीं शताब्दी के भक्त तमिल कवि काशीवासी मुगलों की आधीनता से काशी मंदिर को छुडाये कुमरगुरुपरर् का कहना है कि हे सुंदर आभूषण की सुंदरी! विद्या अध्ययन का आरंभकाल दुखमय होने पर भी वह ज्ञान देकर अज्ञानता मिटाकर स्थायी सुख देगा। अधिक कामेच्छा कम समय का अस्थाई दुख देगा। कामांधता में आनेवाले संताप स्थाई होगा। |
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