तरंगों में शांति
नमस्ते वणक्कम्।
समय बीतता जा रहा हैं।
यादों की तरंगें उठती रहती हैं।
भूलना ?
भूलने की जिंदगी नहीं।
सहने की जिंदगी।
सहन शक्ति चाहिए।
तरंगें उठती रहें,
तरंगें तुमने की प्राकृतिक लीला नहीं।
किनारे पर उठती ही रहेंगी।
बीच समुद्र ख़ामोश।
वही आत्मा में मन का विलीन होना।
वह तौ दिव्य पुरुषों के लिए।
फिर भी ईश्वरीय लीला
सब हीं नचावत राम गोसाईं
यही शांति का संदेश मार्ग।
ईश्वरीय सृष्टि
सर्वेश्वर की सूक्ष्म लीला
सुखप्रद और दुखप्रद।
धरती में अवतरित सभी जीवराशियाँ
ईश्वरीय शाश्वत नियम
कर्मफल भोगने से छूट नहीं।
धन्य है ईश्वर हमें इतनी शक्ति दी है,
हम जी रहे हैं अपने दायरे में सम्मान सहित।
ॐॐ ॐॐॐ ॐॐॐ ॐॐॐ ॐॐॐ
शान्ति ।
समय, स्मृतियाँ और सशक्तता
एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु।
समय बीतता जा रहा है,
यादों की तरंगें उठती रहती हैं।
भूलना?
भूलने के लिए नहीं,
यह जीवन तो सहने के लिए है।
स्मृतियों को सहने के लिए
सशक्तता चाहिए।
मन की तरंगें उठती रहेंगी,
यह प्रकृति की सहज लीला है।
समुद्र के किनारे
लहरें उठती ही रहेंगी,
परंतु समुद्र के मध्य
गहरा मौन व्याप्त रहता है।
वही तो है—
मन का आत्मा में विलीन होना!
वह अवस्था तो
दिव्य पुरुषों की साधना है।
फिर भी, यह ईश्वरीय लीला है।
“सब ही नचावत राम गोसाईं।”
यही है शांति का संदेश,
यही है समर्पण का मार्ग।
ईश्वरीय सृष्टि,
सर्वेश्वर की सूक्ष्म लीला—
कहीं सुखप्रद,
तो कहीं दुःखप्रद।
धरती पर अवतरित
समस्त जीव-राशियाँ
ईश्वरीय शाश्वत नियमों के अधीन हैं।
कर्मफल के भोग से
किसी को मुक्ति नहीं।
फिर भी धन्य हैं हम,
कि ईश्वर ने हमें
इतनी सशक्तता प्रदान की है।
स्मृतियों के बीच,
सुख-दुःख के बीच,
हम आज भी जी रहे हैं—
अपने सीमित दायरे में,
आत्मसम्मान के साथ,
ईश्वर के प्रति कृतज्ञता लिए।
ॐ शान्तिः! शान्तिः!! शान्तिः!!!
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