श्रीमंत्र --तिरुमंतिरम्(683)
तमिऴ हिंदी सेवा।
தமிழ் ஹிந்தி சேவை.
तमिऴ हिंदी सेवा
एस.अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक।
तिरुमूलर रचित तिरुमंत्र
भगवान के दर्शन कैसे?
तमिऴ मूल पद्य
वाय ऒन्ऱु चोल्ल, =வாய் ஒன்று சொல்ல
मानम् ऒन्ऱु चिंतिक्क, =மனம் ஒன்று சிந்திக்க
ती ऍन्रु उन्नै तेलिन्तेन् तेलिन्तपिन =தீ என்ற உன்னை நெளிந்தேன்.
पेय ऍन्रु इंगु ऍन्नै पिऱर् तेळियारे।।
பேய் என்று என்னை பிறர் தெளியாரே.
शब्दार्थ
वाय --मुख
ऒन्ऱु --एक
चोल्ल --कहता है।
मनम् --मन और चिंतन में
नी ऒन्रु चेय्य =तुम एक करते हो।
उऱुति ऍन्रू आका-- स्थाई रूप में कुछ न होगा।
कोई प्रयोजन नहीं है।
ती = आग
एन्ऱु =
तेलिन्तेन् = स्पष्ट रूप में जाना पहचाना।
तेलिंतपिन --जान पहचान के बाद
पेय --भूत मरनेवाला हूँ
इंगु =यहाँ
ऍन्नै =मुझे
पिऱर् --अन्य लोग
तेळियारे ==न सोचेंगे।
भावार्थ ==
मुख से एक बात,
मन से एक बात
कर्म से एक बात
तीनों एक दूसरे से संबंधित नहीं।
तभी मैंने जाना पहचाना कि
तू मेरे मन के अग्नि हो।
वैसे स्पष्ट रूप में जान पहचानने के बाद,
इस संसार के भगवान को समझ लिया।
अब मुझे कोई न समझेंगे कि मैं नश्वर हूँ।भूत हूँ।
अर्थात
मन,वचन और कर्म तीनों एक ही चिंतन तीनों एक हो तो वह हमें ज्ञानी आत्मज्ञानी बनाएगा।
हमें अपने मन में रहनेवाले ईश्वर को जानकर पहचानकर समझकर चलें तो आगे यह जन्म पुनर्जन्म न होगा।
अनुवादक =एस.अनंतकृष्णन् , चेन्नई।