Tuesday, August 18, 2026

திருவருட்பா श्री अनुग्रह गीत।


तमिऴ हिंदी सेवा नागरी लिपि सेवा।

தமிழ் ஹிந்தி பணி.

 நாகரி எழுத்துப் பணி.

श्री रामलिंग अडिकळार  तमिल भक्ति साहित्य में 

 समरस सन्मार्ग नीति रीति के मार्गदर्शक हैं।

 उनके ग्रंथ तिरु अरुट्पा अर्थात श्रीअनुग्रह गीत।

 उनमें एक गीत में उनका कहना है कि भगवान का आवास कहाँ है।

उस गीत का भावार्थ और मूल तमिऴ् गीत का नागरी लिपी रूप।

  

ऍत्तुणैयुम्  भेदमुऱातु ---तनिक भी भेद भाव न करके

ऍव्वुयिरुम तन् उयिर पोल् ऍण्णि--   सभी जीवराशियों को अपने प्राण -सा सोचकर

 उळ्ळे --मन में 

ऒत्तुरिमै  उडैयवराय---समान समझकर 

उवक्किन्ऱार यावर---आनंद माननेवाले 

अवर उळंतान्  --के मन ही

शुत्त चित्तुरुवाय --शुद्ध  मनवाले  का हृदय ही 

एम्पेरुमान् नडम्पुरियुम् --मेरे भगवान नाचनेवाले
स्थान है।-- 
इडम्
एन नान तॆरिंतेन् = मैं जान लिया। 

अंत वित्तकरतम् = उन आत्मज्ञानियों के

अडिक्केवल  पुरिंदिड =चरणों की  सेवा करने

ऍनचिंतै मिक विळैंततालो।--मेरा मन चाहता है। 

भावार्थ===
   ज़रा भी भेद भावना रहित सभी जीवराशियों को अपने  प्राण के बराबर  मन  में मानकर  आनंद मनानेवाले शुद्ध हृदयवाले का हृदय ही मेरे ईश्वर  बसा हुआ स्थान है। वैसे  हृदय के आत्मज्ञानीयों  के चरणों की सेवा करने को ही मेरा  मन चाहता है। 





 எத்துணையும் பேதமுறாது எவ்வுயிரும் தம்உயிர் போல்

எண்ணி உள்ளே
ஒத்துரிமை உடையவராய் உவக்கின்றார் யாவர்,
அவர் உளந்தான்
சுத்த சித்துருவாய் எம்பெருமான் நடம்புரியும்
இடம் என நான்
தெரிந்தேன், அந்த வித்தகர்தம் அடிக்கேவல்
புரிந்திட என்சிந்தை மிகவிழைந்த தாலோ!" [1]







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