Friday, September 4, 2026

ஆசிரியர் தினம் अध्यापक दिवस


अध्यापक दिवस — भावाभिव्यक्ति रचना

आज की चुनौती

अध्यापक दिवस

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

हिंदी प्रेमी प्रचारक एवं स्नातकोत्तर हिंदी अध्यापक

5-9-26

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स्वर्गीय राष्ट्रपति एवं उपराष्ट्रपति

डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन जी

के जन्मदिवस को

हम अध्यापक दिवस के रूप में

मनाते हैं।

उनके जीवन का प्रारंभिक काल

महाविद्यालय में

प्राध्यापक के रूप में बीता।

वे एक नामी और

आदर्श प्राध्यापक रहे।

अध्यापक की सेवा है—

छात्रों को ज्ञान देना,

उनके अज्ञान के अंधकार को मिटाना,

भावी देश के

सुनागरिक बनाना,

अच्छे आचरण की शिक्षा देना

और उच्च महत्वाकांक्षाओं के लिए

प्रेरित करना।

ऐसे अध्यापक

सीढ़ी के समान होते हैं,

जो अपने विद्यार्थियों को

एक-एक पायदान चढ़ाते हुए

जीवन के शिखर तक

पहुँचाने का आदर्श कार्य करते हैं।

उनका सम्मान करने,

उनके प्रति अपना आभार

प्रकट करने का

शुभ दिन,

शुभ अवसर है—

अध्यापक दिवस।

संत तिरुवल्लुवर ने कहा है—

जिस प्रकार निर्धन व्यक्ति

धनी के सामने

सिर झुकाकर विनय करता है,

उसी प्रकार

धनी और अज्ञानी व्यक्ति भी

शिक्षित गुरु के सामने

विनयशील होकर झुकते हैं।

अध्यापक ही

इस जगत का ज्ञान देने वाले,

जीवन जीने की कला सिखाने वाले

और समाज में

अभिवादन एवं व्यवहार की

प्रणालियाँ सिखाने वाले होते हैं।

कबीरदास जी के अनुसार

गुरु भगवान से भी बड़े हैं।

“शिक्षक पारस मानिये,

खुद को लोहा मान।

उसको छूते ही बनें,

सारे कनक समान॥”

अर्थात् सच्चा शिक्षक

पारस पत्थर के समान होता है।

उसके ज्ञान और संस्कार का स्पर्श

साधारण विद्यार्थी को भी

अनमोल बना देता है।

“कुमति कीच चेला भरा,

गुरु ज्ञान-जल होय।

जनम-जनम का मोरचा,

पल में डारे धोय॥”

गुरु के ज्ञानरूपी जल से

शिष्य के मन की

कुमति और अज्ञान का मैल

दूर हो जाता है।

शिक्षक और शिक्षा के बिना

इस जगत की प्रगति

असंभव है।

अतः भारत में

5 सितंबर को

अध्यापक दिवस मनाया जाता है।

इस अवसर पर

केंद्र और राज्य सरकारें

उत्कृष्ट अध्यापकों को

सम्मानित करती हैं।

विश्व शिक्षक दिवस

5 अक्टूबर को मनाया जाता है।

गुरु ज्ञान का दीप जलाएँ,

अज्ञान का अंधकार मिटाएँ,

विद्यार्थियों का भविष्य सँवारें।

जय गुरु!

गुरु महान!

राधाकृष्णन जी की भूमिका स्पष्ट करें

तिरुवल्लुवर कथन सरल बनाकर लिखें

दोहराई पंक्ति एक बार रखें

ஸ்ரீகிருஷ்ண ஜெயந்தி.श्री कृष्ण जन्माष्टमी

 தமிழ் ஹிந்தி சேவை.

तमिऴ हिंदी सेवा।

से.अनंतकृष्णन।

சே.அனந்தகிருஷ்ணன்.



आज की चुनौती

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई।

4-9-26


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यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।

अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥


श्रीकृष्ण स्वयं भगवद्गीता में कहते हैं—


जब-जब धर्म की हानि

और अधर्म की वृद्धि होती है,

तब-तब मैं स्वयंजं अवतार लेता हूँ

सज्जनों की रक्षा

और दुष्टों के विनाश के लिए।


நல்லவர்களை கள் காக்க

தீயவர்களை அழிக்க

எப்போதெல்லாம்

அறத்திற்கு தீங்கு ஏற்படுகிறதோ 

அதர்மம் வளர்ச்சி அடைகிறதோ அப்போதெல்லாம்  நான் அவதரிக்கிறேன்.

ऐसे लोकरक्षक और लोकरंजक

भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव

जन्माष्टमी के रूप में मनाया जाता है।

இப்படிப்பட்ட 

உலகக் காவலர்

உலகை மகிழ்விப்பவர்

பகவானின் கிருஷ்ணருடைய பிறந்த நாள் ஜன்மாஷ்டமியாகக் கொண்டாடப்படுகிறது.



हर वर्ष श्रद्धा और भक्ति के साथ

भगवान श्रीकृष्ण का जन्मदिन

देशभर में मनाया जाता है।

ஒவ்வொரு ஆண்டும் சிரத்தையுடனும் பக்தியுடனும் நாடுமுழுவதும் பகவான் கிருஷ்ணரின் பிறந்த நாள் கொண்டாடப்படுகிறது.



मामा कंस के कारागार में

वासुदेव और देवकी के

आठवें पुत्र के रूप में

आधी रात को श्रीकृष्ण का जन्म हुआ।

 மாமா கம்சனின் சிறைச்சா லையில் 

வாசுதேவன் தேவகியின் எட்டாவது மகனாக

நள்ளிரவில் 

ஸ்ரீகிருஷ்ணர் பிறந்தார்.


कंस को आकाशवाणी से

यह ज्ञात हो चुका था कि

देवकी का आठवाँ पुत्र

उसके विनाश का कारण बनेगा।

கம்சனுக்கு அசரீராக 

தேவகியின் எட்டாவது மகனால் அவனுக்கு அழிவு ஏற்படும் என்பதை

அறிந்தான்.


श्रीकृष्ण के जन्म के बाद

उनके पिता वसुदेव

उन्हें गोकुल ले गए

और नंद तथा यशोदा के संरक्षण में

उनका पालन-पोषण हुआ।

ஸ்ரீ கிருஷ்ணன பிறந்த பின் கோகுலத்திற்கு அழைத்துச் சென்று 

 அவருடைய அப்பா  அவரை

நந்தன் மசோதாவின் பாதுகாப்பில்

அவரை வளர்ப்பதற்காக  விட்டுச் சென்றார்.


यशोदा ने कृष्ण को

अत्यंत प्यार और वात्सल्य से पाला।

नंद बाबा ने भी

उन्हें अपने पुत्र के समान

स्नेह और देखभाल दी।

யசோதா கிருஷ்ணனின் மீது மிகவும் அன்பு செலுத்தினார்.

நந்தனும்  அவரை தன் மகனாகவே  ஏற்று  நேசித்து கண்கானித்தார்.



श्रीकृष्ण के जन्मदिन को

आसेतु हिमाचल

हिंदू समाज श्रद्धा और भक्ति से मनाता है।

ஸ்ரீ கிருஷ்ணனின் பிறந்த நாளை இமயம் முதல் குமரி வரை ஹிந்து சமுதாயம் சிரத்தை பக்தியுடன் கொண்டாடுகிறது.



घर में श्रीकृष्ण की मूर्ति को

सुंदर ढंग से सजाया जाता है।


வீட்டில் கிருஷ்ண விக்ரகம்

அழகான முறையில் அலங்கரிக்கப்படுகிறது.


घर के द्वार से पूजा-गृह तक

बालकृष्ण के चरणचिह्न बनाए जाते हैं।

வீட்டு வாசலில் இருந்து பூசை அறைவரை பாலகிருஷ்ண ரின் வருவது போன்ற பாதங்கள் வரையப்படுகின்றன.


घर के छोटे बच्चों को

बालकृष्ण के रूप में सजाया जाता है।

வீட்டில் சிறிய குழந்தைகளை

பாலகிருஷ்ணனாக அலங்கரிக்கப் படுகிறது.


नैवेद्य के रूप में

तमिलनाडु में सीडै बनाया जाता है—

गुड़ से मीठा सीडै

और नमक से नमकीन सीडै।

 நைவேத்தியம் பொருளாக இனிப்பு மற்றும் உப்பு சீடை செய்யப்படுகிறது.


उड़द दाल आदि से बनाए जाने वाले

छोटे-छोटे स्वादिष्ट पकवान

भगवान श्रीकृष्ण को अर्पित किए जाते हैं।

உளுந்தப்பருப்பால் ஆனா சின்ன சின்ன ருசிகரமான பலகாரங்கள்

பகவானின் கிருஷ்ணருக்கு சமர்ப்பிக்கப் படுகின்றன.


श्रीकृष्ण की प्रिय वस्तु

मक्खन भी नैवेद्य के रूप में

उन्हें अर्पित किया जाता है।

ஸ்ரீ கிருஷ்ணருக்கு மிகவும் பிரியமான வெண்ணெய்யும் அர்ப்பணம் செய்கின்றனர்.


श्रीकृष्ण की मूर्ति को सजाकर

भक्ति-गीत गाए जाते हैं

और उनका नाम स्मरण किया जाता है।

ஸ்ரீ கிருஷ்ணனின் விக்ரஹம் அலங்கரித்து பக்தி பாடல்கள் பாடப்படுகிறது.

அவருடைய பெயர் ஜபிக்கும் படுகிறது. 


जन्माष्टमी के अगले दिन

तमिलनाडु में उरियडी उत्सव मनाया जाता है,

जिसे हिंदी में प्रायः दही-हांडी उत्सव कहा जाता है।

ஜன்மாஷ்டமிக்கு அடுத்த நாள் உறியடி உத்சவம் நடைபெறுகிறது. அதை ஹிந்தியில் தஹி டாண்டி  உற்சவம் என்று சொல்லப் படுகிறது.


माखनचोर, गोपाल, गोविंद

और भक्तवत्सल श्रीकृष्ण

केवल एक देवता नहीं,

बल्कि धर्म, प्रेम, करुणा,

नीति और

 लोककल्याण के

प्रेरणास्रोत हैं।


வெண்ணெய் திருடன்,ஞ

கருணை,நீதி உலக நலம்  ஆகியவற்றின்

 தூண்டல் ஊற்று.



लोकरक्षक, लोकरंजक और भक्तवत्सल

भगवान श्रीकृष्ण को

जन्माष्टमी के पावन पर्व पर

शत-शत नमन!

உலக பாதுகாவலன் 

உலகை மகிழ்விப்பவன்

பகவான் ஸ்ரீ கிருஷ்ணனின் ஜன்மாஷ்டமி தினத்தில் 

 பல முறை (நுறுமுறை) வணக்கம்.

 


Wednesday, September 2, 2026

तिरु मंतिरम திருமந்திரம்.

 श्रीमंत्र --तिरुमंतिरम्(683)

तमिऴ हिंदी सेवा।

தமிழ் ஹிந்தி சேவை.

तमिऴ हिंदी सेवा

एस.अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक।



तिरुमूलर रचित तिरुमंत्र 

भगवान के दर्शन कैसे?

  तमिऴ मूल पद्य 

 वाय ऒन्ऱु चोल्ल, =வாய் ஒன்று சொல்ல

मानम् ऒन्ऱु चिंतिक्क, =மனம் ஒன்று சிந்திக்க 

ती ऍन्रु उन्नै तेलिन्तेन् तेलिन्तपिन =தீ என்ற உன்னை நெளிந்தேன்.

पेय ऍन्रु इंगु ऍन्नै पिऱर् तेळियारे।।

பேய் என்று என்னை பிறர் தெளியாரே.

शब्दार्थ 

 वाय --मुख

ऒन्ऱु --एक

चोल्ल --कहता है।

मनम्  --मन  और चिंतन में 

नी ऒन्रु चेय्य =तुम एक करते हो।

उऱुति ऍन्रू आका-- स्थाई रूप में कुछ न होगा।

कोई प्रयोजन नहीं है।

ती = आग

एन्ऱु = 

तेलिन्तेन् = स्पष्ट रूप में जाना पहचाना।

तेलिंतपिन --जान पहचान के बाद 

पेय  --भूत  मरनेवाला हूँ

इंगु =यहाँ

ऍन्नै =मुझे

पिऱर् --अन्य लोग

तेळियारे ==न सोचेंगे।

भावार्थ ==

 मुख से एक बात,

 मन से एक बात 

कर्म से एक बात 

 तीनों एक दूसरे से संबंधित नहीं।

तभी मैंने  जाना पहचाना कि

तू मेरे मन के अग्नि हो।

वैसे स्पष्ट रूप में जान पहचानने के बाद,

इस संसार के भगवान को समझ लिया।

अब मुझे कोई न समझेंगे कि मैं नश्वर हूँ।भूत हूँ।

 अर्थात 

मन,वचन और कर्म तीनों एक ही चिंतन  तीनों एक हो तो वह हमें ज्ञानी आत्मज्ञानी बनाएगा।

हमें अपने मन में रहनेवाले ईश्वर को जानकर पहचानकर समझकर चलें तो आगे यह जन्म पुनर्जन्म न होगा।

 अनुवादक =एस.अनंतकृष्णन् , चेन्नई।

















Sunday, August 30, 2026

தமிழ் ஹிந்தி பணி

 



தமிழ் ஹிந்தி சேவை.

तमिळ हिंदी सेवा।

एस.अनंतकृष्णन, चेन्नई 


मानवता रहित मनुष्य पशु ही है।

 மனித நேயம் இல்லா மனிதன் மிருகம் தான்.

 मनितनेयम् इल्ला मनियन मिरुगम तान।


भक्ति स्वार्थ के लिए नहीं,जगत कल्याण केलिए होनी चाहिए।

 பக்தி சுயநலத்திற்காக  கிடையாது.

உலக நன்மைக்காக இருக்கவேண்டும்.


 भक्ति व्यापार नहीं है,

 आत्मज्ञान के लिए।

 பக்தி வணிகம் அல்ல.

 ஆன்ம ஞானத்திற்காக .

भक्ति वणिखम् अल्ल।


अन्य ज्ञानत।तिर्काक।

 मनुष्य मनुष्य में 

 परस्पर प्रेम के लिए।

 மனிதற்களுக்குள் பரஸ்பர




मनितर्कल्टळुक्कुत्वत्व परस्पर 

 अन्बुक्काक।


 जाति संप्रदाय मजहब 

 मनुष्य मनुष्य में 

 राग द्वेष, भैद भाव बढ़ाते हैं।

சாதி சம்பிரதாயங்கள் அன்பு வெறுப்பு  வேற்றுமை உணர்வுகளை அதிகரிக்கச் செய்கின்றன.जाति संप्रदायंकळ्  अन्बु वेरुप्पु वेट्रुमैकळै 

अतिकरिक्कच्चेय्किनऱन।

 




Tuesday, August 25, 2026

अदृश्य धागा

 

अदृश्य धागा

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई

अदृश्य धागा
जादूगर के हाथों में,
मकड़ी के जाल में
अदृश्य धागा।

मैंने सुना है—
चंद्रमुखी का मंगलसूत्र
केवल हरिश्चंद्र ही देख सकते थे।

विवाह का बंधन भी
एक अदृश्य धागा है।

मित्रता का बंधन भी
एक अदृश्य धागा है।

मेरे और हिंदी के बीच का
प्रेम-बंधन भी
एक अदृश्य धागा है।

दिखाई नहीं देता,
फिर भी बाँधे रखता है—
यही तो है
अदृश्य धागा!

तिरुक्कुरळ--तिरुवळ्ळुवर् राजनीति ==अरसियल அரசியல்.

  अर्थ भाग।

 राजनीति । 

1.

 .इयट्रलुम ईट्टलुम कात्तलुम् कार्य

वकुत्तलुम  वल्लतरसु।


इयट्रलुम==आर्थिक तरक्की के नये नये मार्गों को बनाना।

ईट्टल् == आय को एकत्रित करके जमा करना

कात्तल् --बचत पैसे को सुरक्षित रखना

वकुत्तलुम्--जमा किये धन को धर्म,अर्थ,काम और देश के कल्याण कार्य के लिए बाँटकर  खर्च करना।

वल्लतरसु == ऐसे करना ही सरकार का काम है।


2.  उऱुपसियुम् ओवाप्पिणियुम् चेऱुपकैयुम घेरातियल्वतु नाडु।

उरु पसियुम ==असाध्य भूख

ओवाप्पिणियुम् == लगातार संक्रामक रोग

चेऱुपकै =नाशकारक दुश्मनी 

चेरातु इयल्वतु ==में सब रहित संचालन करना ही

नाडु --  देश है।






 


मुक्ति

 मुक्ति का मार्ग।

एस. अनंत कृष्णन चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

25-8-26

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मुक्ति है का मार्ग है

 लौकिकता तज अलौकिकता अपनाना।

 नश्वर जगत,

 मृत्यु निश्चित।

 प्रिया अर्द्धांगिनी की मृत्यु,

 दुखी मन,

मुक्ति के चिंतन में।

 ऐतिहासिक विचार।


राम और कृष्ण  के कारण मन को सांत्वना।

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मेरी प्राण प्रिया धर्मपत्नी मेरे एक मात्र शुभचिंतिका 

 इक्कावन  साल 

के दुखी जिंदगी,

 सुखी जिंदगी जीकर,

 पोती पोते को दुलार कर  मुझे असीम दुख सागर में धकेलकर चल बसी।

 मैं अत्यंत दुखी था।

 उसकी मृत्यु के कारण 

 क्या मैं हूँ।

 क्या मैं ने उसको 

‌बेगार रखा?

 सही इलाज न करवाया?

 सही डाक्टर के यहाँ सलाह न ली?

 तब रामायण के पात्र याद आयीं।

 राम को पति के जिंदा रहते दुख सहना पड़ा।

सुंदरी सीता को रावण ले गया।

 पत्नी की तलाश में भटकना पड़ा। 

युद्ध में रावण का वध करके,  पतिव्रता सीता की जाँच करके  

राजमहल ले आया।

 एक धोबी के अपवाह सह न सके।

 भाई के द्वारा निर्दयता से पत्नी को  घने जंगल में छोड़ दिया।

ऐसा अपराध तो मैं ने 

पत्नी के साथ नहीं किया।

 पांडव जो धर्म के रक्षक माने जाते हैं,

 उन्होंने पत्नी रखकर जुए में हारा। भरी सभा में पत्नी के अपमान सहते रहे।

 ऐसा व्यवहार पत्नी से नहीं किया।

 उसकी हर माँग पूरी करता रहा।

गौतम ऋषि  ने इन्द्रको कठोर शाप न देकर 

अहिल्या को पत्थर बनाया।

 ऐसा  व्यवहार पत्नी से न किया।

पत्नी के आज्ञाकारी  पति रहा।

 नल महाराज आधी रात अंधेरे में पत्नी को जंगल में छोड़कर गया।

 सिद्धार्थ ज्ञान की खोज में,

अपनी प्यारी पत्नी और बच्ची को छोड़कर  गया।

  लक्ष्मण ने उर्मिला को छोड़कर  भाई के साथ वनवास किया।

 मैं तो इक्कावन साल तक उसके साथ रहा।

 पत्नी का बेगार रहा।

 अतः मेरा दुखी होना अपने को पापी समझना,

 इलाज कराने में कमी,

 प्यार भरे व्यवहार में कमी,

 उनकी माँगें पूरी करने में कमी,

नहीं कह सकता।

 ‌विधि की विडंबना।

 वह चल बसी।

मेरे जिंदा रहने के लिए 

 भगवान  की सूक्ष्म लीला मैं समझ न सका।

अब  भगवान के स्मरण करके 

अंत तक जीना है।

 निद्रा में ही मेरे प्राण पखेरू उड़जाना चाहिए।

 भारतीय  ऐतिहासिक घटनाएँ अधिक सांत्वना देती है।

 मीरा की  भक्ति,

 रानी लक्ष्मीबाई का जीवन।

 सबहीं नचावत राम गोसाईं।

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना।

[25/08, 12:42 am] sanantha.50@gmail.com: ல் மொழிபெயர்த்துள்ளேன்.

விடுதலையின் பாதை

எஸ். அனந்த கிருஷ்ணன், சென்னை, தமிழ்நாடு

இந்திப் பற்றாளர், பிரச்சாரகர்

சுயமாக இயற்றிய உணர்வுப் படைப்பு

25-8-2026

விடுதலைக்கான வழி என்பது

உலகியல் பற்றுகளைத் துறந்து,

அலௌகிகமான ஆன்மிக வாழ்வை ஏற்றுக்கொள்வதாகும்.

இந்த உலகம் நிலையற்றது.

மரணம் நிச்சயமானது.

அன்புக்குரிய வாழ்க்கைத் துணைவியின் மரணம்,

துயரத்தில் ஆழ்ந்த மனம்,

விடுதலை பற்றிய சிந்தனையில் மூழ்குகிறது.

ராமரும் கிருஷ்ணரும் நினைவுக்கு வரும்போது

மனதிற்கு ஆறுதல் கிடைக்கிறது.

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என் உயிருக்கு உயிரான

என் தர்மபத்தினி,

என் ஒரே நலம் விரும்பி,

ஐம்பத்தொரு ஆண்டுகள்

துன்பமும் இன்பமும் கலந்த வாழ்க்கையை வாழ்ந்து,

பேரன், பேத்திகளைக் கொஞ்சி மகிழ்ந்து,

என்னை அளவற்ற துயரக் கடலில் தள்ளிவிட்டு

சென்றுவிட்டாள்.

நான் மிகவும் துயருற்றேன்.

அவளுடைய மரணத்திற்கு

நான்தான் காரணமா?

அவளை வேலைக்காரியைப் போல நடத்தினேனா?

சரியான சிகிச்சை அளிக்கவில்லையா?

சரியான மருத்துவரிடம் ஆலோசனை பெறவில்லையா?

அப்போது இராமாயணத்தின் கதாபாத்திரங்கள்

என் நினைவுக்கு வந்தன.

ராமர், தம் மனைவி உயிருடன் இருந்தபோதும்

பல துயரங்களை அனுபவிக்க வேண்டியிருந்தது.

அழகிய சீதையை ராவணன் கடத்திச் சென்றான்.

அவளைத் தேடி ராமர் அலைந்தார்.

போரில் ராவணனை வென்று,

கற்புக்கரசியான சீதையை மீட்டுக்கொண்டு

அயோத்தி அரண்மனைக்கு அழைத்து வந்தார்.

ஆனால் ஒரு வண்ணானின் அவதூறான பேச்சைக்கூட

அவரால் பொறுத்துக்கொள்ள முடியவில்லை.

தம் சகோதரன் மூலம்

தம் மனைவியை இரக்கமின்றி

அடர்ந்த காட்டில் விட்டுவிடச் செய்தார்.

அத்தகைய குற்றத்தை

நான் என் மனைவியிடம் செய்யவில்லை.

தர்மத்தைப் காப்பவர்களாகக் கருதப்படும்

பாண்டவர்கள்,

தங்கள் மனைவியையே பணயம் வைத்து

சூதாட்டத்தில் இழந்தார்கள்.

நிறைந்த சபையில்

தங்கள் மனைவி அவமதிக்கப்படுவதையும்

பொறுத்துக்கொண்டார்கள்.

அத்தகைய நடத்தையை

நான் என் மனைவியிடம் காட்டவில்லை.

அவள் கேட்ட ஒவ்வொரு தேவையையும்

என்னால் முடிந்தவரை நிறைவேற்றினேன்.

கௌதம முனிவர்,

இந்திரனுக்கு கடுமையான சாபம் அளித்ததோடு,

அகலிகையை கல்லாகும்படி சபித்தார்.

அத்தகைய நடத்தையை

நான் என் மனைவியிடம் காட்டவில்லை.

நான் அவளுக்கு

கீழ்ப்படிந்து வாழ்ந்த கணவனாக இருந்தேன்.

நள மகாராஜா,

நள்ளிரவில் இருளில்

தம் மனைவியை காட்டில் விட்டுச் சென்றார்.

சித்தார்த்தர்,

ஞானத்தைத் தேடி

தம் அன்பு மனைவியையும் குழந்தையையும் விட்டுச் சென்றார்.

இலட்சுமணன்,

உர்மிளையை விட்டுவிட்டு

தம் அண்ணன் ராமருடன் வனவாசம் சென்றார்.

ஆனால் நான்

என் மனைவியுடன் ஐம்பத்தொரு ஆண்டுகள் வாழ்ந்தேன்.

அவளுக்காக உழைத்தேன்;

அவளுடைய வாழ்க்கைத் துணையாக இருந்தேன்.

ஆகையால்,

என் மனைவியின் மரணத்திற்காக

என்னைப் பாவியாகக் கருதுவதையும்,

சிகிச்சை அளிப்பதில் குறை இருந்தது என்றும்,

அன்பான நடத்தையில் குறை இருந்தது என்றும்,

அவளுடைய தேவைகளை நிறைவேற்றுவதில் குறை இருந்தது என்றும்

என்னால் கூற முடியாது.

இது விதியின் விந்தை.

அவள் என்னை விட்டுப் பிரிந்துவிட்டாள்.

நான் இன்னும் உயிருடன் இருப்பதற்குப் பின்னால்

இறைவனின் நுட்பமான திருவிளையாடல் என்ன என்பதை

என்னால் புரிந்துகொள்ள முடியவில்லை.

இனி இறைவனை நினைத்துக்கொண்டு

என் வாழ்நாளின் இறுதிவரை வாழ வேண்டும்.

ஒருநாள்

தூக்கத்திலேயே

என் உயிர்ப்பறவை பறந்து செல்ல வேண்டும்.

இந்திய வரலாற்றில் நிகழ்ந்த நிகழ்வுகள்

எனக்கு மிகுந்த ஆறுதலை அளிக்கின்றன.

மீராவின் பக்தி,

ராணி இலட்சுமிபாயின் வாழ்க்கை—

இவை அனைத்தும் எனக்கு வழிகாட்டுகின்றன.

“எல்லோரையும் ஆட்டுவிப்பவன்

ராம கோசாயி.”

எஸ். அனந்த கிருஷ்ணன், சென்னை, தமிழ்நாடு

இந்திப் பற்றாளர், பிரச்சாரகர்

சுயமாக இயற்றிய உணர்வுப் படைப்பு.