Thursday, October 1, 2026

मेरे ब्लॉग की समीक्षा।

 नमस्ते वणक्कम् आदरणीय। 🙏

मैंने आपके “Tamil - Hindi - Sampark” ब्लॉग को उसके वर्तमान पृष्ठ, हाल की रचनाओं और उपलब्ध दीर्घकालीन ब्लॉग-अभिलेख को देखकर समीक्षा की है। ब्लॉग का अभिलेख अगस्त 2012 से सितंबर 2026 तक दिखाई देता है; केवल संग्रह में दर्ज वर्षवार संख्याओं को जोड़ने पर लगभग 1,231 पोस्ट दिखाई देती हैं, इसलिए यह केवल एक-दो वर्षों का प्रयास नहीं, बल्कि लगभग डेढ़ दशक की निरंतर लेखन-साधना का दस्तावेज है। �

Anand Gomu

और आपने जो 1,25,000 दर्शकों का आँकड़ा बताया है, वह इस दीर्घकालीन प्रयास के साथ देखा जाए तो आपके लेखन-संपर्क की पहुँच का महत्वपूर्ण संकेत है।

🌿 मेरी समग्र साहित्यिक समीक्षा

1. आपके ब्लॉग की सबसे बड़ी पहचान — “तमिल और हिंदी के बीच साहित्यिक सेतु”

मेरी दृष्टि में आपके ब्लॉग का सबसे उपयुक्त परिचय केवल “एक हिंदी ब्लॉग” या “एक तमिल ब्लॉग” नहीं है; इसकी वास्तविक पहचान तमिल और हिंदी के बीच संवाद स्थापित करने वाला व्यक्तिगत साहित्यिक मंच है।

उदाहरण के लिए, आपने रामधारी सिंह दिनकर की रचनाओं को हिंदी के साथ तमिल में प्रस्तुत किया है, और “हिंदी तमिऴ सेवा / ஹிந்தி தமிழ் பணி” जैसी अभिव्यक्ति के माध्यम से अपने उद्देश्य को स्पष्ट भी किया है। �

Anand Gomu

इसी प्रकार नालडियार के पदों में आप तमिल मूल पाठ देते हैं, फिर हिंदी में भावार्थ प्रस्तुत करते हैं; यह केवल अनुवाद नहीं, बल्कि दो भाषाई पाठक-समुदायों को एक ही नैतिक विचार के सामने बैठाने का प्रयास है। �

Anand Gomu

यहीं आपके ब्लॉग का सबसे मजबूत साहित्यिक आधार है।

2. आपका ब्लॉग वास्तव में “ब्लॉग” से आगे बढ़कर व्यक्तिगत साहित्यिक अभिलेख बन गया है

अभिलेख में 2012 से लगातार अलग-अलग वर्षों में रचनाएँ दिखाई देती हैं; 2015 में 131, 2016 में 58, 2021 में 340, 2025 में 89 और 2026 में 70 पोस्ट दर्ज हैं। �

Anand Gomu

इससे एक महत्वपूर्ण बात सामने आती है—आपका लेखन किसी एक समय की आकस्मिक रुचि नहीं है; यह दीर्घकालीन साधना है।

साहित्य में यह बात बहुत मूल्यवान होती है, क्योंकि एक लेखक की पहचान केवल उसकी दस अच्छी रचनाओं से नहीं, बल्कि वर्षों तक वह किन विषयों पर सोचता रहा, क्या लिखता रहा और समाज के सामने क्या रखता रहा, उससे भी बनती है।

इस दृष्टि से आपका ब्लॉग आपके जीवन-लेखन का डिजिटल दस्तावेज है।

3. विषयों की आपकी सबसे बड़ी शक्ति — बहुत व्यापक संसार

आपके ब्लॉग में मुझे मुख्यतः ये धाराएँ दिखाई देती हैं:

तमिल साहित्य → हिंदी साहित्य → नीति → अध्यात्म → भक्ति → जीवन-दर्शन → सामाजिक चिंतन → शिक्षक-जीवन → संस्कृति → राष्ट्रभावना → व्यक्तिगत अनुभूति → मानवता।

सितंबर 2026 की कुछ ही रचनाएँ देखें तो अपनी धरती अपना जीवन, दिनकर, औवैयार/नालडियार, रामरस, दिलासा, भाग्यशाली, शैशव की किलकारियाँ आदि अलग-अलग दिशाओं में जाती हैं। �

Anand Gomu +1

इस विविधता को मैं कमजोरी नहीं मानता; बल्कि यही आपकी रचनात्मक दुनिया का विस्तार है।

हाँ, एक साहित्यिक संपादक के रूप में मैं आपको सलाह दूँगा कि आगे से इन विषयों को अलग-अलग श्रृंखलाओं में व्यवस्थित करें, ताकि नया पाठक आपके ब्लॉग में प्रवेश करते ही आपकी साहित्यिक दुनिया को आसानी से समझ सके।

4. “नालडियार” और तमिल ग्रंथों का कार्य — आपके नाम को अलग पहचान दे सकता है

यह आपके ब्लॉग का बहुत महत्वपूर्ण पक्ष है।

आपने नालडियार के अनेक पदों को तमिल मूल के साथ हिंदी में प्रस्तुत किया है; उदाहरण के लिए 101 से आगे के पदों में मूल तमिल, हिंदी भावार्थ और फिर विस्तृत तमिल व्याख्या दिखाई देती है। �

Anand Gomu

यह कार्य सामान्य दैनिक कविता से अलग प्रकार का साहित्यिक योगदान है।

मेरी विशेष सलाह है:

“तमिल नीति-साहित्य का हिंदी सेतु”

इसे आपकी दीर्घकालीन परियोजना बनाया जा सकता है।

इसके अंतर्गत:

नालडियार

तिरुक्कुरल

औवैयार

तिरुमंत्रम्

नीतिनेरि विलक्कम्

अन्य तमिल नीति-ग्रंथ

को क्रमबद्ध रूप से प्रस्तुत किया जा सकता है।

हर रचना का ढाँचा हो:

तमिल मूल → सरल हिंदी अर्थ → विस्तृत भावार्थ → जीवन में उपयोग → आपकी टिप्पणी।

इससे आपका व्यक्तिगत अनुभव भी ग्रंथ-साहित्य से जुड़ जाएगा।

5. आपकी मौलिक रचनाओं में एक दूसरी बड़ी शक्ति है — जीवन का प्रत्यक्ष अनुभव

“शैशव की किलकारियाँ” इसका बहुत अच्छा उदाहरण है।

वहाँ आप केवल “गरीबी बुरी है” जैसा सामान्य उपदेश नहीं देते; आप शराबी पिता, घर के तनाव, माँ की पीड़ा और बच्चों की बाहरी हँसी के पीछे छिपे दर्द को सामने लाते हैं। �

Anand Gomu

तमिल भाग में भी उसी अनुभूति को आगे ले जाया गया है। �

Anand Gomu

यहाँ आपकी कविता का मूल्य इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि विचार केवल पुस्तक से नहीं आया, जीवन की जमीन से आया है।

मेरी दृष्टि में आपकी आगे की रचनाओं में यह क्षेत्र बहुत विकसित किया जा सकता है।

6. “दिलासा” जैसी रचनाएँ आपके साहित्य में निजी संवेदना का नया अध्याय खोलती हैं

“दिलासा” में हिंदी और तमिल दोनों भाषाओं में निजी शोक, अकेलापन और जीवन-साथी की अनुपस्थिति की अनुभूति दिखाई देती है; विशेष रूप से “सब को दिलासा देनेवाला मैं / अपने को देने में असमर्थ हूँ” जैसी पंक्तियाँ आपकी निजी स्थिति को सीधे साहित्यिक अनुभूति में बदल देती हैं। �

Anand Gomu

यहाँ एक महत्वपूर्ण साहित्यिक संभावना है:

आपकी पत्नी की स्मृति पर संस्मरण-श्रृंखला।

नाम हो सकता है:

“गोमती — मेरी अर्धांगिनी, मेरी जीवन-संगिनी”

या अधिक साहित्यिक:

“गोमती की स्मृतियाँ — साथ से विरह तक”

इसमें केवल मृत्यु और दुःख न हो; बल्कि 51 वर्ष का दाम्पत्य, आरंभिक जीवन, परिवार, संघर्ष, बीमारी, सेवा, यात्राएँ, छोटी-छोटी घरेलू स्मृतियाँ, उनकी हँसी, उनका स्नेह और उनके जाने के बाद का जीवन—इन सबको लिखा जा सकता है।

ऐसी रचनाएँ केवल आपके लिए नहीं, आने वाली पीढ़ी के लिए भी मूल्यवान स्मृति-दस्तावेज बन सकती हैं।

7. “भाग्यशाली” आपकी चिंतनात्मक शैली का अच्छा उदाहरण है

आपने पूछा—

कौन भाग्यशाली?

कौन अभागा?

और फिर सिद्धार्थ, कर्ण, विदुर, सुदामा, पांडव, उर्मिला, यशोधरा तथा सामान्य जीवन के उदाहरणों से प्रश्न को आगे बढ़ाया है। �

Anand Gomu +1

अंत में आप निश्चित उत्तर देने के बजाय प्रश्न को भगवान के पास छोड़ते हैं। �

Anand Gomu

यह आपकी रचना-पद्धति की विशेषता है:

प्रश्न → उदाहरण → जीवन → दर्शन → खुला निष्कर्ष।

इसे बनाए रखिए।

8. आपकी भाषा की सबसे बड़ी विशेषता और सबसे बड़ा सुधार-क्षेत्र दोनों एक ही हैं

आपकी भाषा सरल और सीधे हृदय तक पहुँचने वाली है; आप कठिन साहित्यिक शब्दों से पाठक को प्रभावित करने की कोशिश नहीं करते।

लेकिन कई बार विचार पहले बहुत तेज़ी से निकलता है और भाषा पीछे रह जाती है; इसलिए वाक्य-विन्यास, शब्द-चयन, पुनरावृत्ति और विराम-चिह्नों में सुधार की आवश्यकता रहती है।

उदाहरण के लिए “अपनी धरती अपना जीवन” का मूल मसौदा अपेक्षाकृत टूटे हुए वाक्यों में था, जबकि उसी पृष्ठ पर उसका परिष्कृत रूप अधिक क्रमबद्ध दिखाई देता है—बचपन, मातृभूमि, सत्य, अहिंसा, आत्मज्ञान, परोपकार और अंततः भारत की पहचान तक विचार क्रमशः आगे बढ़ता है। �

Anand Gomu

यही संपादन आपकी रचनाओं को बहुत ऊपर उठा सकता है।

आपकी भावना को बदलना नहीं है; केवल उसे साहित्यिक आकार देना है।

9. आपकी रचनाओं में “अंतिम पंक्तियाँ” बहुत महत्वपूर्ण हैं

आपके लिए मैं एक विशेष नियम सुझाऊँगा:

आरंभ पाठक को बुलाए, मध्य उसे सोचने पर मजबूर करे और अंत उसके मन में ठहर जाए।

उदाहरण के लिए “अपनी धरती अपना जीवन” का अंतिम विचार—भारत को केवल जन्मभूमि नहीं बल्कि आत्मभूमि के रूप में देखना—रचना को व्यक्तिगत पहचान देता है। �

Anand Gomu

इसी तरह “भाग्यशाली” में प्रश्न खुला छोड़ना पाठक को स्वयं सोचने के लिए प्रेरित करता है। �

Anand Gomu

आपकी भविष्य की रचनाओं में अंतिम 3–5 पंक्तियों पर विशेष मेहनत करनी चाहिए।

10. आपके ब्लॉग का संभावित साहित्यिक नाम

आपने कहा कि आपको “प्रेरणा मिले और नाम भी”।

मेरी ओर से आपके लिए एक सम्मानजनक साहित्यिक परिचय हो सकता है:

“तमिल–हिंदी साहित्य सेतु साधक”

और विस्तृत रूप में:

“एस. अनंतकृष्णन — तमिल–हिंदी साहित्य एवं संस्कृति के सेतु साधक”

क्योंकि आपका कार्य केवल हिंदी सीखना या तमिल का हिंदी अनुवाद करना नहीं है; आप दोनों भाषाओं के साहित्य, नीति, भक्ति और जीवन-दर्शन को एक-दूसरे के सामने रख रहे हैं।

एक और उपाधि जो आपकी रचनात्मक शैली को दर्शाती है:

“अनुभव और अध्यात्म के द्विभाषी लेखक”

और ब्लॉग के लिए एक सुंदर परिचय-पंक्ति:

“तमिल की ज्ञान-परंपरा और हिंदी की अभिव्यक्ति के बीच एक आत्मीय साहित्यिक सेतु।”

इसे मैं आपके ब्लॉग के शीर्ष परिचय में रखने योग्य मानता हूँ।

11. यदि “नाम” को और मजबूत करना है तो एक महत्वपूर्ण परिवर्तन कीजिए

आपके ब्लॉग में बहुत-सी अच्छी सामग्री है, लेकिन एक नए पाठक को यह तुरंत समझना कठिन हो सकता है कि लेखक की मुख्य साहित्यिक पहचान क्या है।

इसलिए ब्लॉग के शीर्ष पर एक स्थायी परिचय होना चाहिए:

एस. अनंतकृष्णन

तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक

तमिल–हिंदी साहित्य सेतु साधक

तमिल साहित्य, हिंदी साहित्य, नीति, अध्यात्म और जीवन-दर्शन पर लेखन

इसके नीचे:

“2012 से निरंतर साहित्यिक सेवा”

और आपके बताए हुए 1,25,000+ दर्शकों का उल्लेख भी किया जा सकता है, यदि Blogger के वर्तमान आँकड़े यही संख्या दिखाते हैं।

इससे नया पाठक पहले ही क्षण में समझ जाएगा कि वह किस लेखक के मंच पर आया है।

12. आपकी रचनाओं को पाँच प्रमुख श्रृंखलाओं में बाँटने का मेरा सुझाव

① तमिल–हिंदी साहित्य सेतु

तिरुक्कुरल, नालडियार, औवैयार, तिरुमंत्रम् आदि।

② आज की चुनौती

आपकी समसामयिक जीवन-दर्शन वाली छोटी रचनाएँ।

③ जीवन की सीख

अनुभव, वृद्धावस्था, परिवार, समाज, शिक्षक-जीवन और मानवीय मूल्य।

④ भक्ति और आत्मचिंतन

राम, शिव, मुरुगन, कबीर, संत-साहित्य, आत्मा, कर्म, ईश्वर और शरणागति।

⑤ संस्मरण और जीवन-यात्रा

आपका बचपन, शिक्षा, अध्यापन, परिवार, दाम्पत्य जीवन, यात्राएँ और जीवन के महत्वपूर्ण अनुभव।

इन पाँच धाराओं में आपका विशाल लेखन व्यवस्थित हो जाए तो 1,200 से अधिक रचनाओं का संग्रह एक साहित्यिक धरोहर जैसा दिखाई देने लगेगा।

13. आपकी रचनाओं के लिए मेरी “संपादकीय कसौटी”

आगे से जब आप मुझे कोई रचना देंगे, मैं उसे केवल व्याकरण की दृष्टि से नहीं देखूँगा; मैं इन पाँच प्रश्नों से भी देख सकता हूँ:

भाव है?

विचार स्पष्ट है?

दोहराव कम है?

भाषा स्वाभाविक है?

अंत हृदय में ठहरता है?

और जहाँ आवश्यकता होगी, आपकी मूल भावना और आपकी अपनी आवाज़ को बचाकर रचना को साहित्यिक रूप दूँगा।

🌺 अंत में मेरी सबसे महत्वपूर्ण बात

आदरणीय, आपके ब्लॉग की सबसे बड़ी उपलब्धि 1,25,000 दर्शक नहीं हैं; उससे भी बड़ी उपलब्धि यह है कि आपने वर्षों तक लिखना नहीं छोड़ा।

2012 से लेकर 2026 तक का अभिलेख बताता है कि आपके भीतर लिखने की निरंतर इच्छा रही है; बीच में विषय बदले, जीवन बदला, परिस्थितियाँ बदलीं, लेकिन लेखन की धारा चलती रही। �

Anand Gomu

आपके लिए मैं एक वाक्य लिखना चाहूँगा—

“आप केवल लेख नहीं लिख रहे हैं; आप अपने समय, अपने अनुभव, तमिल की ज्ञान-परंपरा और हिंदी के प्रति अपने प्रेम का एक जीवित दस्तावेज तैयार कर रहे हैं।”

और इसलिए मेरी ओर से आपके साहित्यिक परिचय के लिए सबसे स्वाभाविक नाम है:

🌿 एस. अनंतकृष्णन — तमिल–हिंदी साहित्य सेतु साधक 🌿

आपके ब्लॉग “Tamil - Hindi - Sampark” के लिए भी यह नाम सार्थक है, क्योंकि आपके पूरे लेखन का मूल भाव ही संपर्क है—तमिल से हिंदी का संपर्क, साहित्य से जीवन का संपर्क, ज्ञान से अनुभव का संपर्क और अंततः मनुष्य से मनुष्य का संपर्क। �

Anand Gomu +1

आप लिखते रहिए; आपके पास विषयों की कमी नहीं है, बल्कि इतने वर्षों की सामग्री को व्यवस्थित करके उसकी साहित्यिक पहचान और मजबूत करने की आवश्यकता है।

और यदि आप अनुमति दें, तो अगला चरण मैं और उपयोगी ढंग से कर सकता हूँ: �⁠आपके ब्लॉग के लिए एक सुंदर “लेखक परिचय / About Me” और “Tamil–Hindi Sampark की साहित्यिक यात्रा” तैयार कर दूँ, जिसे आप सीधे अपने ब्लॉग पर लगा सकें।

Wednesday, September 23, 2026

अपनी धरती अपना जीवन

 [23/09, 7:58 pm] sanantha.50@gmail.com: अपनी धरती अपना जीवन।

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु 

24-9-26.


जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी" एक प्रसिद्ध संस्कृत सूक्ति है जिसका अर्थ है कि माता और मातृभूमि स्वर्ग से भी महान या श्रेष्ठ हैं

 हमारे बचपन यही पिता।

 हमारे खून के रिश्ते यहीं रहते हैं।

यहीं हमें शिक्षा मिली है।

यहीं हम अपने सहपाठियों के साथ खेले कूदे मौज उड़ाये।

 यह मातृभूमि ही विश्व गुरु ।

 जिसने विश्व को संदेश दिया,

सारा संसार एक परिवार है।

अपनी धरती अपना जीवन 

सत्य का मार्ग दिखाया।

 अहिंसा का मार्ग दिखाया।

 सिखाया नारा दिया 

 जय जगत।

 यहीं  से गूँज उठा नारा

 सर्वे जना सुखिनो भवन्तु।

त्याग का मार्ग दिखाया।

 जगत मिथ्या।

जग अनश्वर

 ब्रह्म सत्यं।

 सनातन धर्म सिखाया 

मानव के अंतिम समय

 कफ़न ही,वह भी श्मशान तक।।

 काली हाथ आये हैं,

खाली हाथ जाएँगे।

  सिकंदर को सिखाया 

 बर्फ प्रदेश में 

 एक साधु ने


 सोना चांदी नहीं चाहिए।

 मेरा अपना देश ने सिखाया 

आत्मा को पहचानो,

 आत्मज्ञान प्राप्त करो।

माया देवी छोड़ेगी नहीं,

 नारी सुख परिणाम 

 संतान प्रेम।

  मानव का शैशव मरता है,

बचपन मरता है

 जवानी मरती है

 प्रोढावस्था मरती है।

 इतनी बार बुढ़ापे में 

 मरता है।

 अतः अपनी धरती अपना जीवन 

 जीते जी सुकर्म करो।

 परोपकार करो।

वही मनुष्य है जो दूसरों केलिए जीता है मरता है।

ऐसे त्याग की भूमि,

 ज्ञान भूमि

 निर्गुण सगुण भक्ति की भूमि,

 मेरी धरती मेरा जीवन 

 शांति की भूमि, अहिंसा की भूमि

 संतोष की भूमि

 आध्यात्मिक भूमि 

 अपना जीवन ब्रह्मानंद से भरा।

 भारत भूमि विश्व में महान।

[23/09, 8:03 pm] sanantha.50@gmail.com: अपनी धरती, अपना जीवन

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

24-9-2026

“जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।”

यह प्रसिद्ध संस्कृत सूक्ति हमें सिखाती है कि माता और मातृभूमि स्वर्ग से भी महान हैं।

हमारा बचपन यहीं बीता,

हमारे पिता-पुर्खों की स्मृतियाँ यहीं जुड़ी हैं,

हमारे खून के रिश्ते यहीं रहते हैं।

यहीं हमें शिक्षा मिली,

यहीं सहपाठियों के साथ खेले-कूदे,

हँसे, मौज की और जीवन के सुंदर दिन बिताए।

अपनी धरती, अपना जीवन।

यह वही मातृभूमि है,

जिसने विश्व को ज्ञान का संदेश दिया।

“वसुधैव कुटुम्बकम्”—

सारा संसार एक परिवार है।

यहीं से सत्य का मार्ग दिखाया गया,

अहिंसा का मार्ग दिखाया गया,

“जय जगत्” का नारा गूँजा,

और प्रार्थना हुई—

“सर्वे भवन्तु सुखिनः,

सर्वे सन्तु निरामयाः।”

इस धरती ने त्याग का मार्ग दिखाया,

आत्मज्ञान का मार्ग दिखाया,

सिखाया कि बाहरी माया के पीछे भागना ही जीवन का उद्देश्य नहीं है।

“ब्रह्म सत्यं, जगन्मिथ्या”

का आध्यात्मिक संदेश

मनुष्य को अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानने की प्रेरणा देता है।

मानव जीवन की यात्रा भी कितनी अद्भुत है—

शैशव बीत जाता है,

बचपन बीत जाता है,

जवानी बीत जाती है,

प्रौढ़ावस्था भी बीत जाती है।

अंततः बुढ़ापे में मनुष्य समझता है कि

जीवन कितनी तेजी से हाथ से निकल गया।

मृत्यु के समय

न धन साथ जाता है,

न सोना-चाँदी,

न संपत्ति,

न पद-प्रतिष्ठा।

खाली हाथ आए हैं,

खाली हाथ ही जाएँगे।

सिकंदर जैसे महान विजेता को भी

भारत की धरती पर एक साधु ने

धन-संपत्ति की वास्तविकता का बोध कराया—

मनुष्य अंततः अपने साथ कुछ नहीं ले जा सकता।

मेरे अपने देश ने मुझे सिखाया—

अपने भीतर झाँको,

अपनी आत्मा को पहचानो,

आत्मज्ञान प्राप्त करो।

माया मनुष्य को बाँधती है—

नारी-सुख, संतान-प्रेम,

धन-दौलत और संसार के अनेक मोह

जीवन को अपनी ओर खींचते रहते हैं।

फिर भी इस धरती की महान शिक्षा है—

जीते-जी सुकर्म करो,

परोपकार करो,

दूसरों के जीवन में सुख और शांति बाँटो।

“वही मनुष्य है

जो दूसरों के लिए जीता है।”

ऐसी है मेरी धरती—

त्याग की भूमि,

ज्ञान की भूमि,

निर्गुण-सगुण भक्ति की भूमि,

शांति की भूमि,

अहिंसा की भूमि,

संतोष की भूमि,

आध्यात्मिक साधना की भूमि।

अपनी धरती, अपना जीवन—

यही मेरी पहचान,

यही मेरा गौरव,

यही मेरा भारत।

मेरी धरती मेरा जीवन,

मेरा जीवन ब्रह्मानंद से भरा।

यह भारत केवल मेरी जन्मभूमि नहीं, मेरी आत्मभूमि है—जिसकी मिट्टी में ऋषियों का तप, वीरों का बलिदान और संतों की करुणा आज भी धड़कती है। इसकी सेवा करना मेरे लिए पूजा है, इसके जन-जन में ईश्वर को देखना मेरी साधना है। जब तक मेरे हृदय में प्राण हैं, तब तक भारत की गरिमा, एकता और मानवता के लिए मेरा जीवन समर्पित रहेगा।

भारतभूमि विश्व में महान!

वंदे मातरम्!

இராம தாரிசிங் தினகரன் रामधारी सिंह दिनकर।

 राष्ट्र कवि रामधारी सिंह दिनकर।

23-9-दिनकर  की जयंति।

हिंदी तमिऴ सेवा।

ஹிந்தி தமிழ் பணி.

     आज की मनोदशा मेरी,

     साहस देती है  रामधारी दिनकर की कविता।

 இன்றைய உள்ளத்தின் நிலையில் 

துணிச்சல் தரும் திரு 

ராமதாரி திலகரின் கவிதை.

 அவரின் கவிதை மிகவும் 

 வையக அன்பைப் பெற்றவை.

कवि का योगदान चिरस्मरणीय और चिर अनुकरणीय हैं।

கவியின் பங்களிப்பு 

நீடூழி நினைவில் நிற்பவை.

நீடூழி பின் பற்றப் படுபவை.



 उनकी कविताएँ अति लोकप्रिय।

 அவருடைய மிகவும் புகழ்பெற்ற இரண்டு கவிதைகள்

.

  उनकी दो कविताएँ 

१.राम,तुम्हारा नाम।

 राम ! तुम्हारा नाम कंठ में रहे,

ह्रदय, जो कुछ भेजो,वह सहे

दुख से त्राण न माँगूँ।

 माँगूँ केवल दुख सहने की,

दुर्दिन को भी मान तुम्हारी दया,

अकारण ध्यान मग्न रहने की।

देख तुम्हारे मृत्यु दूत को डरूँ नहीं।

न्योछावर होने में दुविधा करूँ नहीं।

तुम चाहो,दूँ वही 

कृपण हो प्राण नहीं माँगूँ।

1. ராமா, உன் பெயர்.

  இராம நாமம்  என் நினைவில் என் உள்ளத்தில் இருக்கட்டும்.

நீ எதை அளித்தாலும்  

அதைப் பொறுத்துக் கொள்வேன்.

 இன்னலைக்  கண்டு   

பாதுகாப்பு  கேட்க மாட்டேன்.


துன்பத்தைசகிக்கும்  

சக்தி மட்டுமே கேட்பேன்.

துன்ப நாட்களையும் உன்

 தயை எனக் கருதும்  ஆற்றல் வேண்டும்.

அச்சமின்றி உன் தியானத்தில் 

மூழ்கும் ஆற்றல் வேண்டும்.


உன் மரணதூதனைக்கண்டு 

 அஞ்சாத தன்மை வேண்டும்.

உயிர்த் தியாகம் செய்வதற்கு 

 தடுமாற்றம் கூடாது.

நீ விரும்புவதை ஏற்பேன்.

கருமியாகி உயிர் கேட்க மாட்டேன்.


2.உணவும் விடுதலையும்.

 விடுதலை கிடைத்தது விட்டது.

आज़ादी तो मिल गई 

இந்த கௌரவம் பாதுகாக்கப் படுமா?

यह गौरव कहाँ जुगाएगा?

मर भुखे!   इस घबराहट में तू बेच तो न खा जाएगा।

 பசி மரணம்! இந்த படத்தில்

இதை விற்று 

சாப்பிடமாட்டாயல்லவா?


आज़ादी रोटी नहीं, दोनों में कोई वैर नहीं।

விடுதலை உணவல்ல. 

இரண்டிற்கும் பகை இல்லை.

पर भूख बेताब हुई तो दोनों में कोई वैर नहीं।

ஆனால்   பசி அதிகமாகி அமைதியற்ற   நிலையானால்

சுதந்திரம்  நல்ல தல்ல.

हो रहे आज़ादी को हर ओर लगा देनेवाले 

पशुओं को रोटी दिखा फिर उन्हें साथ लगा लेनेवाले

इनके  जादू का जोर भला कब तक बुभुक्ष सह सकता है

சுதந்திரத்தைப் பறிப்பவர்களும், ஆசை காட்டி பிறரைத் தங்கள் பக்கம் இழுப்பவர்களும் செய்யும் தந்திரம் எவ்வளவு காலம் பசியால் வாடுபவர்களை அடக்கி வைத்திருக்க முடியும்?

हैं कौन पेट की ज्वाला में पड़कर मनुष्य रह सकता है।

झेलेगा यह बलिदान? भूख की घनी चोट सह पाएगा?

आ पड़ी विपद तो क्या प्रताप -सा घास चबा रहा पाएगा।

हे बड़ी बात आज़ादी का पाना ही नहीं जुड़ाना भी

बलि एक बार ही नहीं, उसे पड़ता फिर फिर दुहराना भी।


பசியின் கொடுமை

பசியின் நெருப்பில் சிக்கி,
மனிதன் எப்படி மனிதனாக இருக்க முடியும்?

இந்தத் தியாகத்தைத் தாங்குவானா?
பசியின் கடுமையான தாக்குதலை
அவனால் பொறுத்துக்கொள்ள முடியுமா?

வந்துவிட்டால் பெரும் துன்பம்,
மகாராணா பிரதாப் போல்
புல்லைக்கூட மென்று உண்ணத் தயாராக இருப்பானா?

சுதந்திரத்தைப் பெறுவது மட்டுமல்ல,
அதைப் பாதுகாத்துப் பேணுவதும் பெரிய செயல்.

தியாகம் ஒருமுறை செய்வதோடு முடிவதில்லை;
அதை மீண்டும் மீண்டும்
செய்ய வேண்டிய நிலை ஏற்படும்.







 

















 







Saturday, September 19, 2026

औवैयार के गीत

 वरिष्ठ हूँ, बेकार नहीं।

 कुछ लिखता हूँ, 

 आशा है वह व्यर्थ नहीं।

 

नालडियार तमिल जैन ग्रंथ।

मेरा ब्लॉग तमिल हिंदी संपर्क देखिए पूरा ग्रन्थ।


 பாடல்-101


 गायों  के दल  से भले ही  बछड़ा छूट  जाएँ,


वह बछड़ा  अपनी माँ  के पास पहुँचने में अति चतुर.


वैसे ही पूर्व-जन्म की विधि की विडम्बना ,


कर्ता तक पहुँचने में है ही  चतुर.


பல்லாவுள் உய்த்து விடினும் குழக்கன்று


வல்லதாம் தாய்நாடிக் கோடலைத் - தொல்லைப்


பழவினையும் அன்ன தகைத்தேதற் செய்த


கிழவனை நாடிக் கொளற்கு


பல பசுக்களின் கூட்டத்தில் கொண்டு போய் விட்டாலும் இளைய பசுங்கன்று தன் தாயைத் தேடி அடைதலில் வல்லதாகும். அது போல முற்பிறப்பிற் செய்த பழவினையும், அவ்வினை செய்தவனைத் தேடி அடைதலில் வல்லமை யுடையதாகும்.


பாடல் 102


खूबसूरती  ,जवानी,श्रेष्ठ संपत्ति,भय दिखानेवाले पद आदि हैं अस्थिर.


यह देख -समझकर  भी एक भी सद्कर्म न करें तो


 जन्म लेकर भी उसका जन्म 


अर्थहीन बेकार  ही अंत होनेवाला है.


உருவும் இளமையும் ஒண்பொருளும் உட்கும்


ஒருவழி நில்லாமை கண்டும் - ஒருவழி


ஒன்றேயும் இல்லாதான் வாழ்க்கை உடம்பிட்டு


நின்றுவீழ்ந் தக்க துடைத்து


அழகும், வாலிபமும், மேன்மையான பொருளும், பலர் அஞ்சத்தக்க மதிப்பும் ஓரிடத்தில் நிலைத்திராமையைப் பார்த்தும், யாதேனும் ஒரு வகையில் ஒரு நற்செயலும் செய்யாதவனுடைய வாழ்க்கை, உடலெடுத்துச் சில காலம் நின்று பயனில்லாது பின் அழிந்து போகும் தன்மையுடையது.


பாடல்-103


 कोई भी ऐसा नहीं,जो समृद्ध जीवन  न चाहता हो;


जैसे फलों का रूप -रंग -स्वाद  प्राकृतिक देन  है,


वैसे ही सुख-दुःख अपने-आप मिलनेवाला है,इसीलिए 


जो चाहते हैं सुख-संपत्ति ,उनको चाहिए सद्कर्म करना.


வளம்பட வேண்டாதார் யார்யாரு மில்லை;


அளந்தன போகம் அவரவர் ஆற்றான்


விளங்காய் திரட்டினார் இல்லை களங் கனியைக்


காரெனச் செய்தாரும் இல்


செல்வம் முதலியவற்றால் வளமுடன் வாழ்தலை விரும்பாதவர் யாரும் உலகில் இல்லை. ஆனால் அவரவர் செய்த புண்ணியங்களுக்கு ஏற்ப அவரவர்களுடைய இன்ப நுகர்வுகள் (சுகபோகங்கள்) வரையறை செய்யப்பட்டுள்ளன. விளாங்காயை உருண்டை வடிவமாகச் செய்தவரும் இல்லை களாப்பழத்தைக் கருமையுடையதாகச் செய்தவரும் இல்லை! (விளாங்காய் ஒருவரால் திரட்டப்படாமல் இயற்கையாகத் திரண்டிருப்பது போலவும், களாப்பழம் ஒருவரால் கறுப்பாக்கப்படாமல் தானே கறுப்பாய் இருப்பது போலவும், அவரவர் இன்பமும் அவரவர் புண்ணிய இயற்கையால் அமைந்துள்ளது. ஆகவே இன்பம் விரும்புவோர் நல்வினையே செய்தல் வேண்டும்).


பாடல்-104


जो बुराई आती हैं ,उनको ऋषि-मुनि भी रोक नहीं सकते .वैसे ही 


आनेवाली भलाइयों को  कोई भी रोक नहीं  सकते.


वर्षा  न हुयी ,तो कोई भी बरसा नहीं सकते;


जोर की वर्षा हो तो कोई भी रोक नहीं  सकते.


உறற்பால நீக்கல் உறுவர்க்கும் ஆகா,


பெறற்பால அனையவும் அன்னவாம் மாரி


வறப்பின் தருவாரும் இல்லை அதனைச்


சிறப்பின் தணிப்பாரும் இல்.


வந்து சேரும் தீமைகளை முனிவர்களாலும் தடுக்க முடியாது! அவ்வாறே பெறக் கூடிய நன்மைகளையும் யாராலும் தடுக்க முடியாது! மழை பெய்யாது ஒழிந்தால் அதனைப் பெய்விப்பாரும் இல்லை! அதிகமாகப் பெய்தால் அதனைத் தடுத்து நிறுத்துவாரும் இல்லை!


பாடல்-105


ताड के पेड़ समान,जो सम्मान  के शिखर पर है ,


वे भी तिनके समान  सम्मान खो बैठेंगे.


इसके  कारण  पूर्व जन्म के बद्कर्म के फल ही है.


और कोई कारण है नहीं.


தினைத்துணைய ராகித்தந் தேசுள் அடக்கிப்


பனைத்துணையார் வைகலும் பாடழிந்து வாழ்வர்;


நினைப்பக் கிடந்தது எவனுண்டாம் மேலை


வினைப்பயன் அல்லால் பிற.


பனை அளவாக உயர்ந்த பெருமை மிக்கவரும் தினையளவாகச் சிறுத்துச் சிறுமையுற்று வருந்தி வாழ்வர்! இதற்குக் காரணம் முற்பிறப்பில் செய்த தீவினையின் பயனேயன்றி வேறில்லை. (உயர்ந்தோர் தாழ்ந்தோர் ஆவதற்குக் காரணம் முன் செய்வினையே).


பாடல்-106


 आप  जानते हैं ,कई चतुर होशियार अल्प आयु में मर जाते हैं,


अशिक्षित लोग दीर्घ  जीवन बिताते हैं,


इसका कारण सार हीन होना ही है,


रस  हीनों को यम जीने देते हैं.


பல்லான்ற கேள்விப் பயனுணர்வார் வீயவும்


கல்லாதார் வாழ்வதும் அறிதிரேல் - கல்லாதார்


சேதனம் என்னுமச் சாறகத் தின்மையால்


கோதென்று கொள்ளாதாம் கூற்று.


பல மேன்மைப்பட்ட நூற்கேள்விகளின் பயனை அறிந்தவர்கள் இறப்பதையும், அறிவீனர்கள் நீடு வாழ்வதையும் அறிந்திருக்கிறீர்கள்! இதற்குக் காரணம், அறிவு என்னும் 'சாறு' கல்லாதார் உள்ளத்தில் இல்லாமையால் அவர்களை வெறும் 'சக்கை' என்று நினைத்து எமன் கொள்வதில்லை.


பாடல்-107


अदम्ब  नामक लताओं को हंस तोड़ते हैं,


लहरों वाले सागर के किनारे पर रहनेवाले नृप!जान  लो.


बड़े महल में रहनेवाले , और उसके सामने खड़े होकर भीख माँगनेवाले ,


ये सब पूर्व जन्म के पाप -पुण्य  के फल ही है.


இடும்பைகூர் நெஞ்சத்தார் எல்லாரும் காண


நெடுங்கடை நின்றுழல்வ தெல்லாம் - அடம்பப்பூ


அன்னங் கிழிக்கும் அலைகடல் தண்சேர்ப்ப


முன்னை வினையாய் விடும்.


அடம்பங் கொடியின் மலர்களை அன்னங்கள் கோதிக் கிழிக்கும் அலைகடலினது குளிர்ச்சியாகிய கரையையுடைய மன்னனே! சிலர் துன்பம் மிகுந்த மனமுடையவராகி யாவரும் காண, பெரிய வீடுகளின் தலைவாயிலில் நின்று பிச்சை கேட்டு வருந்தும் செயல் எல்லாம் முற்பிறப்பிற் செய்த தீவினையின் பயனே ஆகும். (வறுமைக்குக் காரணம் தீவினையே).


பாடல்-108


शहद और लम्बे समुद्रके किनारे पर शासन करनेवाले नृप!


जान-समझ  लो,


बुद्धिमान चतुर होशियार भी अपयश के कर्म करते हैं,


इसके कारण भी पूर्व-जन्म के कर्म-फल ही हैं.


அறியாரும் அல்லர் அறிவ தறிந்தும்


பழியோடும் பட்டவை செய்தல் - வளியோடி


நெய்தல் நறவுயிர்க்கும் நீள்கடல் தண்சேர்ப்ப!


செய்த வினையான் வரும்.


காற்று வீசி நெய்தல் நிலங்களிலே தேனைச் சிந்தும் நீண்ட கடலினது குளிர்ச்சி பொருந்திய கரையையுடைய வேந்தனே! அறிவீனராக இன்றி அறிவுடையவராகத் திகழ்ந்தாலும் சிலர், பழியுடன் கூடிய செயல்களைச் செய்தல், முற்பிறப்பிற் செய்த தீவினையின் விளைவாகும். (நல்லறிவு கெடுதற்கும் காரணம் தீவினையே).


பாடல்-109


समुद्र से घेरे  अग जग में जीनेवाले सब,


ज़रा भी हानि  न चाहेंगे;


भला ही चाहेंगे; फिर भी 


पूर्व-जन्म के कर्म-फल  के अनुसार 


जो आना है,आजायेगा.


ஈண்டுநீர் வையத்துள் எல்லாரும எத்துணையும்


வேண்டார்மன் தீய; விழைபயன் நல்லவை;


வேண்டினும் வேண்டா விடினும் உறற்பால


தீண்டா விடுதல் அரிது.


மிகுதியான நீரையுடைய கடலால் சூழப்பட்ட இவ்வுலகில் வாழும் எல்லாரும் சிறிய தீமையையும் விரும்பமாட்டார்கள். நல்லதையே விரும்புவார்கள். ஆனால் அவர்கள் விரும்பினாலும் விரும்பாவிட்டாலும் முன்வினைப் பயனால் வரத்தக்கவை வராமற் போவதில்லை.


பாடல்-110


गर्भ में उत्पन्न  विधि शिरोरेखा  कर्म फल  न होगा  कभी कम.


न बढेगा;न घटेगा; नियम न बदलेगा;


जो भोगना है ,वे उचित समय पर आ ही जाएगा;


फिर भी मनुष्य क्यों होता हैं दुखी अपने अंतिम समय पर;


சிறுகா பெருகா முறைபிறழ்ந்து வாரா


உறுகாலத் தூற்றாகா ஆமிடத்தே யாகும்


சிறுகாலைப் பட்ட பொறியும் அதனால்


இறுகாலத் தென்னை பரிவு.


கரு அமைந்த காலத்திலேயே உண்டான ஊழ் வினைகள் குறையமாட்டா வளரமாட்டா முறைமாறி வரமாட்டா துன்பம் வந்த காலத்தே ஊன்றுகோலாக மாட்டா எவையும் வரவேண்டிய காலத்தே வந்து சேரும். அப்படியிருக்க மரண காலத்தில் ஒருவன் வருந்துவது ஏன்?

Thursday, September 17, 2026

பிபரே ராமரசம்

कबीर।

तमिल हिंदी सेवा। தமிழ் ஹிந்தி பணி 

 கற்றது கை மண் அளவு கல்லாதது உலகளவு.


 "रामरस" (बिबरे रामरस / राम रस मीठो घणो)यह कबीर जी का एक दूसरा बेहद लोकप्रिय भजन है, जिसे लोक संगीत में "बिबरे रामरस", "राम रस मीठो घणो" या "रामरस ऐसो है मेरे भाई" के नाम से गाया जाता है। यहाँ 'रामरस' का अर्थ ईश्वर की भक्ति या आत्मज्ञान के अमृत (रस) से है।इस भजन की प्रसिद्ध पंक्तियाँ इस प्रकार हैं:राम रस मीठो घणो रे जोगिया, पीवे सो अमर हो जाए।ध्रुव पियो, प्रहलाद पियो रे जोगिया, पीयो वो रैदास।भगत कबीरा भर-भर पीयो, फिर भी पीवण री आस॥

 பகவானின் இராமனுடைய பெயர் உண்மையான இரசாயனம். அதாவது மருந்து.அது அன்பு ரசத்திற்கு சமமானது.

இந்த இராசயன மருந்து மிகவும் இனிப்பானது.

ஆனந்தம் அளிக்கக் கூடியது.

ஆனால் இந்த அன்பு ரசத்தைப் பெறுவது மிகவும் அரிதானது.

இதைப் பெற சாதகன் தனது ஆணவத்தை விட்டு விட வேண்டும். 

அது எப்படி என்றால் மது விற்பவன்  குடிப்பவனிடம் இருந்து  அனைத்தையும்  கேட்பான்.

பகவானின் பக்தியில் அனைத்தையும் அர்ப்பணிக்க வேண்டும்.

 சுயநலம் கூடாது.

Wednesday, September 16, 2026

दिलासा

 मैं सकुशल हूँ।

நான் நலம்.


पर मेरी प्रिय

ஆனால் என் அன்பு 

 अर्द्धांगिनी ईश्वर के

மனைவி கடவளிடம் 

 यहाँ चल बसी। 

சென்றுவிட்டாள்.

तीन महीने हो गये।‌

மூன்று மாதங்கள் ஆகிவிட்டன.

 विधि की विडंबना।

விதியின் விளையாட்டு.

 वेदना की चरम सीमा।

வேதனையின் இறுதி எல்லை.

 सब को दिलासा

 देनेवाला मैं 

அனைவருக்கும்  ஆறுதல் அளிக்கும் நான்

अपने को देने में असमर्थ हूँ।

எனக்கு அளித்துக் கொள்ள சாமார்த்தியம் இல்லை.

भक्ति यात्रा   अहोबलमठ नव नरसिंह मंदिर दोनों मिलकर गये थे। 

இருவரும் ஷா சென்ற பக்தி உலா அஹோபலமணம்.

   भगवान को भी हमारा आनंद से ईर्ष्या हो गयी।

இறைவனுக்

கும் எங்கள் ஆனந்தத்தின் மீது பொறாமை.

 मुझसे मेरी प्यारी प्राण प्रिया के प्राण पखेरू लेकर चले गये।

என்னிடம் இருந்து  என் உயிர்ப் பறவையை எடுத்துச் சென்று விட்டார்.

 अकेला जीवन ,

தனிமையான வாழ்க்கை 


मेरी हर इच्छा वह स्वयं जानकर पूरी करती थी।

என் ஒவ்வொரு விருப்பத்தையும் அவளே அறிந்து கொண்டு பூர்த்தி செய்து வந்தாள்.

 ஏன் இந்த சோதனை.

 புரியாத புதிர்.


Saturday, September 12, 2026

भाग्यशाली பாக்யவான்.

 आज की चुनौती

भाग्यशाली

தமிழ் ஹிந்தி பணி 

तमिल हिंदी सेवा 

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु।


कोई भाग्यशाली है या नहीं,

क्या यह उसके जन्म से ही

पता चल जाता है?

 ஒருவன் அதிர்ஷ்டம் 

உள்ளவனா? இல்லையா ?

இது அவன் பிறப்பிலேயே தெரிந்து விடுகிறது.


राजमहल में जन्मे

सिद्धार्थ के जन्म लेते ही

ज्योतिषियों ने कहा—

“यह बालक संन्यासी बनेगा।”

 அரண்மனைனையில் பிறந்த 

சித்தார்த்தர் பிறந்தது மே

சோதிடர் அவன் துறவி ஆவார் என்று சொன்னார்.


किसी का जन्म फुटपाथ पर,

किसी का जन्म रंक के घर,

तो किसी का जन्म

रईस के घर होता है।

 சிலர் நடைபாதையில் 

சிலர் ஏழை வீட்டில்

சிலர் பணக்கார வீட்டில் 

பிறக்கின்றனர். 


कोई जन्म से अपाहिज,

कोई दीर्घ रोगी,

तो कोई जन्म से ही दरिद्र।

 சிலர் பிறவியிலேயே 

அங்கஹீனர்கள். 

 தீராத நோயாளிகள் 

தரித்திரர்கள்


फिर भी समय के साथ

सबका भाग्य बदलता है।

பிறகும் காலத்தால் 

எல்லோரின் பாக்கியம் மாறுகிறது.


बेवकूफ समझे गए

महाकवि कालिदास बने।

महारथी कर्ण

अनाथ होकर भी महान बने।

दासी-पुत्र विदुर

राजसभा के ज्ञानी बने।

முட்டாள் என்று அறியப்பட்டவர்

 மஹாகவி காளிதாசர் ஆனார்.


 பணிப்பெண் மகன் விதுரன்

அரண்மனை அறிஞன் ஆனான்.

सुदामा निर्धन थे,

पर श्रीकृष्ण के

सहपाठी और सखा थे।

சதாரா ஏழை ஆனால் ஸ்ரீ கிருஷ்ணனினுடன் படித்தவர் தோழர்.


चाय बेचने वाला व्यक्ति

अपने परिश्रम और संघर्ष से

भारत का प्रधानमंत्री बना।

 தேநீர் விற்கின்ற மனிதர்

தன் உழைப்பாலும் போராட்டத்தாலும்

பாரதப் பிரதமர் ஆனார்.


अचानक दुर्योधन की मित्रता ने

कर्ण को अंगदेश का राजा बना दिया,

तो पांडवों को वनवास भोगना पड़ा।

திடிரென்று துரியோதனின் நட்பால்

கர்ணன் அங்கதேச மன்னரானார்.


युद्ध में पांडव विजयी हुए,

फिर भी उनके जीवन में

उल्लास के स्थान पर

उदासी ही अधिक रही।

 போரில் பாண்டவர்கள் 

 வென்றாலும் 

அவர்களின் வாழ்க்கை 

உல்லாசத்திற்குப் பதிலாக 

வருத்தமே அதிகம்.


उर्मिला भाग्यशाली थीं

या अभाग्यशाली?

यशोधरा भाग्यशाली थीं

या अभाग्यशाली?

ஊர்மிளா அதிர்ஷ்டம் உள்ளவளா?

துரதிர்ஷ்டமானவளா?

அப்படி மே யசோதராவும்.


गली का कुत्ता

और अमीर का पालतू कुत्ता—

भाग्यशाली कौन?

தெரு நாய் 

 பணக்கார நாய்

யார் பாக்கியசாலி.

अभागा कौन?


नवग्रहों की दृष्टि से

भाग्य को मापें,

या जीवन के अनुभवों से?

 நவகிரஹப் பார்வையால்

அதிர்ஷ்டத்தை அளப்பதா? அல்லது 

வாழ்க்கை அனுபவத்தாலா?


बाढ़, सुनामी और कोरोना जैसी

अचानक आने वाली आपदाओं ने

भाग्यशाली समझे जाने वाले लोगों को भी

असहाय और अनाथ बना दिया।

 வெள்ளம், சுனாமி,கொரானா

பாக்யசாலி என்பவர்களையும்

உதவியற்றவர்களாக அநாதைகளாக

ஆக்கி விட்டன.


जीवन में भाग्य और दुर्भाग्य

कब, किस रूप में आएँगे—

कहा नहीं जा सकता।

 வாழ்க்கையில் பாக்கியம் துர்பாக்கியம் எந்த வடிவில் வரும் 

என்று சொல்ல முடியாது.



सीता के जीवन में

रावण भी आया

और धोबी भी।

சீதையின் வாழ்க்கையில் இராவணனும் வந்தான் வண்ணானும வந்தான்.


यही तो मानव-जीवन है—

कभी भाग्य का उदय,

कभी दुर्भाग्य की छाया।

இதுதான் மனித வாழ்வு

 ஒருசமயம் பாக்கியோதயம்

மறு சமயம் துர்பாக்கிய நிழல்.


वास्तव में भाग्यशाली वही है

जो परिश्रम करता है,

धैर्य रखता है

और भगवान के अनुग्रह को

जीवन का सहारा मानता है।

உண்மையில் உழைப்பவன் அதிர்ஷ்ட சாலி..

தைரியமாக இருப்பான்.

பகவானின் அனுக்ரகத்தால்

வாழ்க்கையின் உதவியாளன் ஆகிறான்.


फिर भी प्रश्न वही है—

कौन भाग्यशाली?

कौन अभागा?

பிறகும் கேள்வி எழுகிறது 

 யார் பாக்கியசாலி?

யார் துர்பாக்கிய சாலி.


इसका निश्चित उत्तर

शायद स्वयं भगवान के पास ही है।

 இதன் நிச்சயமான பதில்

கடவுளிடம் தான் உள்ளது.

 சே. அனந்த கிருஷ்ணன் சென்னை 

Wednesday, September 9, 2026

शैशव की किलकारियाँ

 शैशव की किलकारियाँ

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई।

शैशव में किलकारियाँ,

 कितनों में है,

पता नहीं,

  जीवन में 

 किलकारियाँ,

मेरे अनुभव में 

अनेकों कौ

 अपने दिल से नहीं,

 अड़ोस पड़ोस को 

देखकर  किलकारियाँ।

 पटाखे अपने नहीं 

 पड़ोस के पटाखे फटते देख।

अन्य बच्चों की किलकारियाँ देख।।

पिता पियक्कड़,

 रोज़ घर एक युद्ध क्षेत्र।

चूल्हा नहीं जलता

पर दिल जलता है

 माँ की अवस्था देख।

 मंगल सूत्र तक 

 शराबखाने के लिए।

 पिता को न होली की चिंता,

 न दीपावली की चिंता।

 अतः मेरी शैशवावस्था में 

 अपनी किलकारियाँ,

 दिखावे के लिए।

 अपने मन से नहीं,

 अन्य शिशुओं का लाभ प्यार देखकर।

[08/09, 11:23 pm] sanantha.50@gmail.com: குழந்தைப் பருவ மகிழ்ச்சி ஆரவாரம்.

சே. அனந்த கிருஷ்ணன் சென்னை.


குழந்தைப் பருவத்தில் 

மகிழ்ச்சி ஆரவாரம்.

 எத்தனை பேருக்கு.

என் அனுபவத்தில் 

அனேகம் பேருக்கு 

 தன் மனதில் இருந்தல்ல.

அக்கம் பக்கத்தி

னரைப்பார்த்து.

தன் பட்டாசுகளால் அல்ல.

 அண்டை வீடுகளில் 

பட்டாசு வெடிப்பதைப் பார்த்து.

மற்ற குழந்தைகளின் மகிழ்ச்சி ஆரவாரம் பார்த்து.

குடிகாரத் தந்தை.

தினந்தோறும் வீட்டில் போர்க்களம்.

 அடுப்பு எரியாது ஆனால் மனம் எரியும் அம்மாவின் நிலை கண்டு.

தாலி கூட மதுக்கடைக்காக.

அம்மாவிற்கு 

ஹோலி தீபாவளி கவலை கிடையாது ‌.

 அதனால் எனது குழந்தைப் பருவத்தில் 

 என் மன மகிழ்ச்சி ஆரவாரம் கிடையாது.

 வெளிக்காட்ட 

மகிழ்ச்சி ஆரவாரம்.

 என் மனதில் இருந்து கிடையாது.

மற்ற குழந்தைகளின் கொஞ்சல்

அன்பைப் பார்த்து.

மகிழ்ச்சி ஆரவாரம்.

Tuesday, September 8, 2026

ख़ामोश चेहरे

 नमस्ते वणक्कम्।

आज की चुनौती

ख़ामोश चेहरे

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई

9-9-26

++++++++++++

ख़ामोश चेहरे

आत्मज्ञानियों में,

आदर्श भक्तों में,

युगावतार पुरुषों में।

ख़ामोश रहकर,

चुपचाप रहने से

चिंतन-शक्ति बढ़ती है,

मानसिक शांति मिलती है,

नए-नए विचार जन्म लेते हैं

सामाजिक कल्याण के लिए।

शांत चेहरा,

शांत मुद्रा—

दूसरों को प्रभावित करने के लिए,

दूसरों का प्रेम पाने के लिए।

शांत चेहरे पर

एक मधुर मुस्कान,

मन में बड़ी-बड़ी योजनाएँ,

और जीवन में

मौन तपस्या।

मौन तपस्या में लगे

गौतम बुद्ध के धर्म ने

विश्व में अनेकों लोगों को

लोककल्याण के मार्ग पर लगाया।

मौन तपस्या में

रत्नाकर डाकू

महर्षि वाल्मीकि बने।

पत्नी-प्रेम में आसक्त

तुलसीदास

महान कवि बने।

मौन के राग में

मनुष्य स्वयं से जुड़ता है,

और इसी मौन के माध्यम से

विश्वबंधुत्व का भाव जागता है।


सरकार /அரசு

 தமிழ் ஹிந்தி இலக்கியப் பணி.

  तमिऴ हिंदी साहित्य सेवा।

सरकार संबंधित संघ साहित्य 

அரசு பற்றி புறநானூறுப் பாடல்.

நெல்லும் உயிர் அன்றே;

நீரும் உயிர் அன்றே;

அதனால், யான் உயிர் என்பது அறிக்கை;

வேல் மிகு தானை வேந்தன் குக் கடனே.

 नागरी लिपि में:-

नेल्लुम् उयिर अन्ऱे;

नीरुम् उयिर अन्ऱे;

अतनाल,यान उयिर ऍन्पतु अऱिक्कै;

वॆल मिकु तानै वेंदनुक्कुक् कड़ने ।।

नेल्लुम --धान भी 

उयिर =जान

अन्ऱे =नहीं।

नीरुम==जल भी

उयिर --प्राण नहीं।

अतनाल् = इसलिए 

यान उयिर ऍन्पतु -- राजा ही जनता के प्राण, 

वेलमिकु तानै वेंदनुक्कुक् कड़े==

वही निर्भयता से , उचित ढंग से, चैन और संतोष से 

सुरक्षा कर सकते हैं। अपने शूलायुध से जनता की रक्षा करना राजा का प्रधान कर्तव्य है।

जनता के जीवन के लिए दान और जल उतना प्रधान नहीं, जितना शासक होते हैं।

इस विस्तृत संसार में शासक और सरकार ही वास्तविक प्राण होते हैं।  जनता शासक पर भरोसा रखती है।

अपने शूल शस्त्र सेना के द्वारा लोगों की रक्षा करना 

प्रधान कर्तव्य होता है।

















Saturday, September 5, 2026

केशवदासजी के दोहे।

 

ஹிந்தி இலக்கியம்  हिंदी साहित्य 

ரீதிகாலம்.. रीतिकाल 

 கேசவதாஸ்.  केशवदासजी 

பிரதான  கவி -प्रधान कवि 

அவர் ஈரடிகளின் தமிழ் . उनके दोहों का तमिऴ।

++++++++++++++++++++++++

जदपि सुजाति सुलक्षणी, सुबरन सरस सुवृत्त।

भूषण बिनु न विराजई  कविता वनिता मित्त।।

शब्दार्थ तमिल और नागरी लिपि में।

जदपि --इरुन्तपोतिलुम् = இருந்தபோதிலும் 

सुजाति --उयर्न्त जाति  உயர்ந்த ஜாதி.1

सुरक्षणी =नल्ल लक्षणमुळ्ळ  நல்ல லக்ஷணமுள்ள.2.

सुवरण = अऴकान निऱमुळ्ळ  அழகான நிறமுள்ள 3

भूषण =नकैकऴ நகைகள்4

वनिता ==पॆणபெண்  5

मित्त =नण्बनநண்பன்.6

  மேலுள்ள சொற்களில் சிலேடை 

उपरोक्त शब्दों में श्लेष।

1.உயர்ந்த பொருள் (விடயம்)

उयर्न्त  पोरुळ् (विडयम्)विषयम्

2.नल्ल लक्षणंकळ्

3.अऴकान ऍऴुत्तु , कवितै

4.अणिकळ्  

केशवदासजी इतिल्  इरंडु  पोरुळ् पडुम्‌ सिलेडै अणियैप् पयन पडुत्तिय  ईरडि।

கேசவதாஸ் அவர்கள் இதில் இரண்டு பொருள் படும் சிலேடை அணியைப் பயன் படுத்திய  ஈரடி.

केशवदास अवर्कळ् इतिल   इरंडु पोरुळ् पडुम् शिलैडै (श्लेष) अणियैप्पयन् पडुत्तिय  ईरडी।।

 ஒரு பெண் உயர்ந்த ஜாதியைச் சேர்ந்தவராக இருந்தாலும் நல்ல 

சாமுத்ரிகா லக்ஷ்ணங்கள் பெற்றிருந்தாலும் நல்ல நிறமாக இருந்தாலும் மென்மையான குணங்கள் பெற்றிருந்தாலும் அவள் அழகிய நகைகள் இன்றி அழகாகத்

தோன்ற மாட்டாள். 

ऒरु पॆण् उयर्न्त जातियैच् चेर्न्तवराक इरुंतालुम् 

नल्ल सामुहिका लक्षणंकळैप् पॆट्रिरुंतालुम् 

नल्ल निऱमाक इरुंतालुम्  मॆन्मैयान गुणंकळ् 

पेट्रिरुंतालुम्  अवळ् अऴकिय नकैकळ् इन्ऱि अऴकाकत् तोन्रमाट्टाळ्।

அவ்வாறே  अव्वऱे

ஒரு கவிதை அழகிய மொழி நடை

பொருளுள்ளதாக இருந்தாலும்

அதில் அணிகள் இல்லை என்றால் அழகாக இருக்காது

अव्वाऱे अणिकळ इल्लै ऍन्ऱाल् कवितै नडै, पोरुळुळ्ळताक इरुंतालुम् अंतिल अणिकळ् इललै ऍन्राल्  अऴकाक इरुक्कातु।



அணி மற்றும் அழகின் மஹத்துவம்

+++++++++++

अमीर ग़रीबी பணக்காரத்துவமும் ஏழ்மையும்.

 [05/09, 1:40 am] sanantha.50@gmail.com: இறைவனுக்கு நன்றி


பணம் இல்லை என்று

வேதனைப்படும் முதியோர் பலர்.


ஆனால்,

அந்த நிலைக்கு

இறைவன் என்னை ஆளாக்கவில்லை.


வாழ்க்கைக்குத் தேவையான

வசதிகளையும்,

பிள்ளைகளையும்,

பேரன் பேத்திகளையும்,

மரியாதையையும்

ஆண்டவன் எனக்கு அளித்திருக்கிறான்.


உறவினர்களிடம்

சில வேதனைகள் இருந்தாலும்,

எனக்கென்று ஒரு மரியாதை இருக்கிறது.

அதற்காக இறைவனுக்கு நன்றி.


ஆனால்,

எல்லாம் இருந்தும்

மனத்தில் ஏதோ ஒரு வேதனை…


என் வாழ்க்கைத் துணையை

இழந்த வெற்றிடத்தை

எந்த வசதியாலும்

நிரப்ப முடியவில்லை.


இறைவனை ஜபிக்கிறேன்.


“ஆண்டவா,

நீ விட்ட வழியே என் வழி.

நீ காட்டும் பாதையில்

நான் நடக்கிறேன்.”


என்று மனதைத் தேற்றிக் கொள்கிறேன்.


என்னிடம் இல்லாதவற்றை எண்ணாமல்,

எனக்குக் கிடைத்தவற்றை எண்ணி

நன்றி கூறக் கற்றுக்கொள்கிறேன்.


எல்லாம் தந்த இறைவனே,

என் மனத்திற்கு மட்டும்

அமைதியையும் தா.

 आज की चुनौती


अमीरी–गरीबी


एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई।

6-9-26


अमीरी में आनंद =பணக்கார ஆனந்தம் 

केवल बाह्य आडंबरों का। வெளி ஆடம்பர கண்களில் மட்டுமே.


अमीरी का आनंद பணக்கார ஆனந்தம் 

गरीबी की मेहनत में! ஏழ்மையின் உழைப்பிலே.


वह शिक्षित अभियंता है, அவன் படித்த பொறியாளர்.

एक सुंदर घर बनवाना चाहता है।

ஒரு அழகான வீடு கட்ட விரும்புகிறான்.

लेकिन वह स्वयं ஆனால் அவன் தானே

बुनियाद का गड्ढा  அஸ்திவாரப் பள்ளம்

नहीं खोद सकता। தோண்டமுடியாது.


वहाँ चाहिए. அங்கே தேவை

गरीबी में जीने वाला ஏழ்மையில் வாழ்கின்ற

हट्टा-कट्टा मजदूर! பலமுள்ள தொழிலாளி.


पुण्य कमाना है तो புண்ணியம் சம்பாதிக்க 

गरीब भिखारी की आवश्यकता है। ஏழ்மை யுள்ள பிச்சைக்காரர் தேவை.


खेती करनी हो, விவசாயம் செய்ய 

फसल काटनी हो, அறுவடைசெய்ய

अपने घर को. தன் வீட்டை சுத்தமாக வைக்க 

साफ-सुथरा रखना हो,

होटल चलाना हो— உணவு விடுதி நடத்த வேண்டும் என்றால் 

हर काम में ஒவ்வொரு வேலைக்கும் 

गरीब की मेहनत आवश्यक है। ஏழையின் உழைப்பு அவசியம்.


फिर पूछता हूँ— கேட்கிறேன்


गरीबी की अमीरी कैसी? ஏழ்மையில் பணக்காரத்துவம் எப்படி?

अमीरी का आधार-स्तंभ. பணக்காரத்துவத்தின் அடிப்படைத்தூண்

गरीबी की मेहनत ही तो है! ஏழ்மையின் உழைப்பில் தானே 


ज्ञान की गरीबी,  ஞானத்தில் ஏழ்மை

नौकरी की गरीबी, வேலையில் ஏழ்மை 

तन-बल की गरीबी, உடல் பல ஏழ்மை 

मन-बल की गरीबी— மனநல ஏழ்மை 

यदि ये सब न हों, இவை அனைத்தும் இல்லை என்றால் 

तो अमीरी का बल कहाँ से आए? பணக்காரத்துவம் பலம் எங்கே?


अमीरी चमकती है, பணக்காயத்துவம் 

ஒளிர்கிறது 

पर गरीबी की मेहनत ஆனால் ஏழ்மையின் உழைப்பு 

उस चमक को आधार देती है। அந்த ஒளிக்கு ஆதாரம் அளிக்கிறது.


Friday, September 4, 2026

ஆசிரியர் தினம் अध्यापक दिवस


अध्यापक दिवस — भावाभिव्यक्ति रचना

आज की चुनौती

अध्यापक दिवस

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई, तमिलनाडु

हिंदी प्रेमी प्रचारक एवं स्नातकोत्तर हिंदी अध्यापक

5-9-26

+++++++++++++++

स्वर्गीय राष्ट्रपति एवं उपराष्ट्रपति

डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन जी

के जन्मदिवस को

हम अध्यापक दिवस के रूप में

मनाते हैं।

उनके जीवन का प्रारंभिक काल

महाविद्यालय में

प्राध्यापक के रूप में बीता।

वे एक नामी और

आदर्श प्राध्यापक रहे।

अध्यापक की सेवा है—

छात्रों को ज्ञान देना,

उनके अज्ञान के अंधकार को मिटाना,

भावी देश के

सुनागरिक बनाना,

अच्छे आचरण की शिक्षा देना

और उच्च महत्वाकांक्षाओं के लिए

प्रेरित करना।

ऐसे अध्यापक

सीढ़ी के समान होते हैं,

जो अपने विद्यार्थियों को

एक-एक पायदान चढ़ाते हुए

जीवन के शिखर तक

पहुँचाने का आदर्श कार्य करते हैं।

उनका सम्मान करने,

उनके प्रति अपना आभार

प्रकट करने का

शुभ दिन,

शुभ अवसर है—

अध्यापक दिवस।

संत तिरुवल्लुवर ने कहा है—

जिस प्रकार निर्धन व्यक्ति

धनी के सामने

सिर झुकाकर विनय करता है,

उसी प्रकार

धनी और अज्ञानी व्यक्ति भी

शिक्षित गुरु के सामने

विनयशील होकर झुकते हैं।

अध्यापक ही

इस जगत का ज्ञान देने वाले,

जीवन जीने की कला सिखाने वाले

और समाज में

अभिवादन एवं व्यवहार की

प्रणालियाँ सिखाने वाले होते हैं।

कबीरदास जी के अनुसार

गुरु भगवान से भी बड़े हैं।

“शिक्षक पारस मानिये,

खुद को लोहा मान।

उसको छूते ही बनें,

सारे कनक समान॥”

अर्थात् सच्चा शिक्षक

पारस पत्थर के समान होता है।

उसके ज्ञान और संस्कार का स्पर्श

साधारण विद्यार्थी को भी

अनमोल बना देता है।

“कुमति कीच चेला भरा,

गुरु ज्ञान-जल होय।

जनम-जनम का मोरचा,

पल में डारे धोय॥”

गुरु के ज्ञानरूपी जल से

शिष्य के मन की

कुमति और अज्ञान का मैल

दूर हो जाता है।

शिक्षक और शिक्षा के बिना

इस जगत की प्रगति

असंभव है।

अतः भारत में

5 सितंबर को

अध्यापक दिवस मनाया जाता है।

इस अवसर पर

केंद्र और राज्य सरकारें

उत्कृष्ट अध्यापकों को

सम्मानित करती हैं।

विश्व शिक्षक दिवस

5 अक्टूबर को मनाया जाता है।

गुरु ज्ञान का दीप जलाएँ,

अज्ञान का अंधकार मिटाएँ,

विद्यार्थियों का भविष्य सँवारें।

जय गुरु!

गुरु महान!

राधाकृष्णन जी की भूमिका स्पष्ट करें

तिरुवल्लुवर कथन सरल बनाकर लिखें

दोहराई पंक्ति एक बार रखें

ஸ்ரீகிருஷ்ண ஜெயந்தி.श्री कृष्ण जन्माष्टमी

 தமிழ் ஹிந்தி சேவை.

तमिऴ हिंदी सेवा।

से.अनंतकृष्णन।

சே.அனந்தகிருஷ்ணன்.



आज की चुनौती

श्रीकृष्ण जन्माष्टमी

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई।

4-9-26


++++++++++++


यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।

अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥


श्रीकृष्ण स्वयं भगवद्गीता में कहते हैं—


जब-जब धर्म की हानि

और अधर्म की वृद्धि होती है,

तब-तब मैं स्वयंजं अवतार लेता हूँ

सज्जनों की रक्षा

और दुष्टों के विनाश के लिए।


நல்லவர்களை கள் காக்க

தீயவர்களை அழிக்க

எப்போதெல்லாம்

அறத்திற்கு தீங்கு ஏற்படுகிறதோ 

அதர்மம் வளர்ச்சி அடைகிறதோ அப்போதெல்லாம்  நான் அவதரிக்கிறேன்.

ऐसे लोकरक्षक और लोकरंजक

भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव

जन्माष्टमी के रूप में मनाया जाता है।

இப்படிப்பட்ட 

உலகக் காவலர்

உலகை மகிழ்விப்பவர்

பகவானின் கிருஷ்ணருடைய பிறந்த நாள் ஜன்மாஷ்டமியாகக் கொண்டாடப்படுகிறது.



हर वर्ष श्रद्धा और भक्ति के साथ

भगवान श्रीकृष्ण का जन्मदिन

देशभर में मनाया जाता है।

ஒவ்வொரு ஆண்டும் சிரத்தையுடனும் பக்தியுடனும் நாடுமுழுவதும் பகவான் கிருஷ்ணரின் பிறந்த நாள் கொண்டாடப்படுகிறது.



मामा कंस के कारागार में

वासुदेव और देवकी के

आठवें पुत्र के रूप में

आधी रात को श्रीकृष्ण का जन्म हुआ।

 மாமா கம்சனின் சிறைச்சா லையில் 

வாசுதேவன் தேவகியின் எட்டாவது மகனாக

நள்ளிரவில் 

ஸ்ரீகிருஷ்ணர் பிறந்தார்.


कंस को आकाशवाणी से

यह ज्ञात हो चुका था कि

देवकी का आठवाँ पुत्र

उसके विनाश का कारण बनेगा।

கம்சனுக்கு அசரீராக 

தேவகியின் எட்டாவது மகனால் அவனுக்கு அழிவு ஏற்படும் என்பதை

அறிந்தான்.


श्रीकृष्ण के जन्म के बाद

उनके पिता वसुदेव

उन्हें गोकुल ले गए

और नंद तथा यशोदा के संरक्षण में

उनका पालन-पोषण हुआ।

ஸ்ரீ கிருஷ்ணன பிறந்த பின் கோகுலத்திற்கு அழைத்துச் சென்று 

 அவருடைய அப்பா  அவரை

நந்தன் மசோதாவின் பாதுகாப்பில்

அவரை வளர்ப்பதற்காக  விட்டுச் சென்றார்.


यशोदा ने कृष्ण को

अत्यंत प्यार और वात्सल्य से पाला।

नंद बाबा ने भी

उन्हें अपने पुत्र के समान

स्नेह और देखभाल दी।

யசோதா கிருஷ்ணனின் மீது மிகவும் அன்பு செலுத்தினார்.

நந்தனும்  அவரை தன் மகனாகவே  ஏற்று  நேசித்து கண்கானித்தார்.



श्रीकृष्ण के जन्मदिन को

आसेतु हिमाचल

हिंदू समाज श्रद्धा और भक्ति से मनाता है।

ஸ்ரீ கிருஷ்ணனின் பிறந்த நாளை இமயம் முதல் குமரி வரை ஹிந்து சமுதாயம் சிரத்தை பக்தியுடன் கொண்டாடுகிறது.



घर में श्रीकृष्ण की मूर्ति को

सुंदर ढंग से सजाया जाता है।


வீட்டில் கிருஷ்ண விக்ரகம்

அழகான முறையில் அலங்கரிக்கப்படுகிறது.


घर के द्वार से पूजा-गृह तक

बालकृष्ण के चरणचिह्न बनाए जाते हैं।

வீட்டு வாசலில் இருந்து பூசை அறைவரை பாலகிருஷ்ண ரின் வருவது போன்ற பாதங்கள் வரையப்படுகின்றன.


घर के छोटे बच्चों को

बालकृष्ण के रूप में सजाया जाता है।

வீட்டில் சிறிய குழந்தைகளை

பாலகிருஷ்ணனாக அலங்கரிக்கப் படுகிறது.


नैवेद्य के रूप में

तमिलनाडु में सीडै बनाया जाता है—

गुड़ से मीठा सीडै

और नमक से नमकीन सीडै।

 நைவேத்தியம் பொருளாக இனிப்பு மற்றும் உப்பு சீடை செய்யப்படுகிறது.


उड़द दाल आदि से बनाए जाने वाले

छोटे-छोटे स्वादिष्ट पकवान

भगवान श्रीकृष्ण को अर्पित किए जाते हैं।

உளுந்தப்பருப்பால் ஆனா சின்ன சின்ன ருசிகரமான பலகாரங்கள்

பகவானின் கிருஷ்ணருக்கு சமர்ப்பிக்கப் படுகின்றன.


श्रीकृष्ण की प्रिय वस्तु

मक्खन भी नैवेद्य के रूप में

उन्हें अर्पित किया जाता है।

ஸ்ரீ கிருஷ்ணருக்கு மிகவும் பிரியமான வெண்ணெய்யும் அர்ப்பணம் செய்கின்றனர்.


श्रीकृष्ण की मूर्ति को सजाकर

भक्ति-गीत गाए जाते हैं

और उनका नाम स्मरण किया जाता है।

ஸ்ரீ கிருஷ்ணனின் விக்ரஹம் அலங்கரித்து பக்தி பாடல்கள் பாடப்படுகிறது.

அவருடைய பெயர் ஜபிக்கும் படுகிறது. 


जन्माष्टमी के अगले दिन

तमिलनाडु में उरियडी उत्सव मनाया जाता है,

जिसे हिंदी में प्रायः दही-हांडी उत्सव कहा जाता है।

ஜன்மாஷ்டமிக்கு அடுத்த நாள் உறியடி உத்சவம் நடைபெறுகிறது. அதை ஹிந்தியில் தஹி டாண்டி  உற்சவம் என்று சொல்லப் படுகிறது.


माखनचोर, गोपाल, गोविंद

और भक्तवत्सल श्रीकृष्ण

केवल एक देवता नहीं,

बल्कि धर्म, प्रेम, करुणा,

नीति और

 लोककल्याण के

प्रेरणास्रोत हैं।


வெண்ணெய் திருடன்,ஞ

கருணை,நீதி உலக நலம்  ஆகியவற்றின்

 தூண்டல் ஊற்று.



लोकरक्षक, लोकरंजक और भक्तवत्सल

भगवान श्रीकृष्ण को

जन्माष्टमी के पावन पर्व पर

शत-शत नमन!

உலக பாதுகாவலன் 

உலகை மகிழ்விப்பவன்

பகவான் ஸ்ரீ கிருஷ்ணனின் ஜன்மாஷ்டமி தினத்தில் 

 பல முறை (நுறுமுறை) வணக்கம்.

 


Wednesday, September 2, 2026

तिरु मंतिरम திருமந்திரம்.

 श्रीमंत्र --तिरुमंतिरम्(683)

तमिऴ हिंदी सेवा।

தமிழ் ஹிந்தி சேவை.

तमिऴ हिंदी सेवा

एस.अनंतकृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक।



तिरुमूलर रचित तिरुमंत्र 

भगवान के दर्शन कैसे?

  तमिऴ मूल पद्य 

 वाय ऒन्ऱु चोल्ल, =வாய் ஒன்று சொல்ல

मानम् ऒन्ऱु चिंतिक्क, =மனம் ஒன்று சிந்திக்க 

ती ऍन्रु उन्नै तेलिन्तेन् तेलिन्तपिन =தீ என்ற உன்னை நெளிந்தேன்.

पेय ऍन्रु इंगु ऍन्नै पिऱर् तेळियारे।।

பேய் என்று என்னை பிறர் தெளியாரே.

शब्दार्थ 

 वाय --मुख

ऒन्ऱु --एक

चोल्ल --कहता है।

मनम्  --मन  और चिंतन में 

नी ऒन्रु चेय्य =तुम एक करते हो।

उऱुति ऍन्रू आका-- स्थाई रूप में कुछ न होगा।

कोई प्रयोजन नहीं है।

ती = आग

एन्ऱु = 

तेलिन्तेन् = स्पष्ट रूप में जाना पहचाना।

तेलिंतपिन --जान पहचान के बाद 

पेय  --भूत  मरनेवाला हूँ

इंगु =यहाँ

ऍन्नै =मुझे

पिऱर् --अन्य लोग

तेळियारे ==न सोचेंगे।

भावार्थ ==

 मुख से एक बात,

 मन से एक बात 

कर्म से एक बात 

 तीनों एक दूसरे से संबंधित नहीं।

तभी मैंने  जाना पहचाना कि

तू मेरे मन के अग्नि हो।

वैसे स्पष्ट रूप में जान पहचानने के बाद,

इस संसार के भगवान को समझ लिया।

अब मुझे कोई न समझेंगे कि मैं नश्वर हूँ।भूत हूँ।

 अर्थात 

मन,वचन और कर्म तीनों एक ही चिंतन  तीनों एक हो तो वह हमें ज्ञानी आत्मज्ञानी बनाएगा।

हमें अपने मन में रहनेवाले ईश्वर को जानकर पहचानकर समझकर चलें तो आगे यह जन्म पुनर्जन्म न होगा।

 अनुवादक =एस.अनंतकृष्णन् , चेन्नई।

















Sunday, August 30, 2026

தமிழ் ஹிந்தி பணி

 



தமிழ் ஹிந்தி சேவை.

तमिळ हिंदी सेवा।

एस.अनंतकृष्णन, चेन्नई 


मानवता रहित मनुष्य पशु ही है।

 மனித நேயம் இல்லா மனிதன் மிருகம் தான்.

 मनितनेयम् इल्ला मनियन मिरुगम तान।


भक्ति स्वार्थ के लिए नहीं,जगत कल्याण केलिए होनी चाहिए।

 பக்தி சுயநலத்திற்காக  கிடையாது.

உலக நன்மைக்காக இருக்கவேண்டும்.


 भक्ति व्यापार नहीं है,

 आत्मज्ञान के लिए।

 பக்தி வணிகம் அல்ல.

 ஆன்ம ஞானத்திற்காக .

भक्ति वणिखम् अल्ल।


अन्य ज्ञानत।तिर्काक।

 मनुष्य मनुष्य में 

 परस्पर प्रेम के लिए।

 மனிதற்களுக்குள் பரஸ்பர




मनितर्कल्टळुक्कुत्वत्व परस्पर 

 अन्बुक्काक।


 जाति संप्रदाय मजहब 

 मनुष्य मनुष्य में 

 राग द्वेष, भैद भाव बढ़ाते हैं।

சாதி சம்பிரதாயங்கள் அன்பு வெறுப்பு  வேற்றுமை உணர்வுகளை அதிகரிக்கச் செய்கின்றன.जाति संप्रदायंकळ्  अन्बु वेरुप्पु वेट्रुमैकळै 

अतिकरिक्कच्चेय्किनऱन।

 




Tuesday, August 25, 2026

अदृश्य धागा

 

अदृश्य धागा

एस. अनंतकृष्णन, चेन्नई

अदृश्य धागा
जादूगर के हाथों में,
मकड़ी के जाल में
अदृश्य धागा।

मैंने सुना है—
चंद्रमुखी का मंगलसूत्र
केवल हरिश्चंद्र ही देख सकते थे।

विवाह का बंधन भी
एक अदृश्य धागा है।

मित्रता का बंधन भी
एक अदृश्य धागा है।

मेरे और हिंदी के बीच का
प्रेम-बंधन भी
एक अदृश्य धागा है।

दिखाई नहीं देता,
फिर भी बाँधे रखता है—
यही तो है
अदृश्य धागा!

तिरुक्कुरळ--तिरुवळ्ळुवर् राजनीति ==अरसियल அரசியல்.

  अर्थ भाग।

 राजनीति । 

1.

 .इयट्रलुम ईट्टलुम कात्तलुम् कार्य

वकुत्तलुम  वल्लतरसु।


इयट्रलुम==आर्थिक तरक्की के नये नये मार्गों को बनाना।

ईट्टल् == आय को एकत्रित करके जमा करना

कात्तल् --बचत पैसे को सुरक्षित रखना

वकुत्तलुम्--जमा किये धन को धर्म,अर्थ,काम और देश के कल्याण कार्य के लिए बाँटकर  खर्च करना।

वल्लतरसु == ऐसे करना ही सरकार का काम है।


2.  उऱुपसियुम् ओवाप्पिणियुम् चेऱुपकैयुम घेरातियल्वतु नाडु।

उरु पसियुम ==असाध्य भूख

ओवाप्पिणियुम् == लगातार संक्रामक रोग

चेऱुपकै =नाशकारक दुश्मनी 

चेरातु इयल्वतु ==में सब रहित संचालन करना ही

नाडु --  देश है।






 


मुक्ति

 मुक्ति का मार्ग।

एस. अनंत कृष्णन चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना 

25-8-26

+++++++++++++

मुक्ति है का मार्ग है

 लौकिकता तज अलौकिकता अपनाना।

 नश्वर जगत,

 मृत्यु निश्चित।

 प्रिया अर्द्धांगिनी की मृत्यु,

 दुखी मन,

मुक्ति के चिंतन में।

 ऐतिहासिक विचार।


राम और कृष्ण  के कारण मन को सांत्वना।

++++++++

मेरी प्राण प्रिया धर्मपत्नी मेरे एक मात्र शुभचिंतिका 

 इक्कावन  साल 

के दुखी जिंदगी,

 सुखी जिंदगी जीकर,

 पोती पोते को दुलार कर  मुझे असीम दुख सागर में धकेलकर चल बसी।

 मैं अत्यंत दुखी था।

 उसकी मृत्यु के कारण 

 क्या मैं हूँ।

 क्या मैं ने उसको 

‌बेगार रखा?

 सही इलाज न करवाया?

 सही डाक्टर के यहाँ सलाह न ली?

 तब रामायण के पात्र याद आयीं।

 राम को पति के जिंदा रहते दुख सहना पड़ा।

सुंदरी सीता को रावण ले गया।

 पत्नी की तलाश में भटकना पड़ा। 

युद्ध में रावण का वध करके,  पतिव्रता सीता की जाँच करके  

राजमहल ले आया।

 एक धोबी के अपवाह सह न सके।

 भाई के द्वारा निर्दयता से पत्नी को  घने जंगल में छोड़ दिया।

ऐसा अपराध तो मैं ने 

पत्नी के साथ नहीं किया।

 पांडव जो धर्म के रक्षक माने जाते हैं,

 उन्होंने पत्नी रखकर जुए में हारा। भरी सभा में पत्नी के अपमान सहते रहे।

 ऐसा व्यवहार पत्नी से नहीं किया।

 उसकी हर माँग पूरी करता रहा।

गौतम ऋषि  ने इन्द्रको कठोर शाप न देकर 

अहिल्या को पत्थर बनाया।

 ऐसा  व्यवहार पत्नी से न किया।

पत्नी के आज्ञाकारी  पति रहा।

 नल महाराज आधी रात अंधेरे में पत्नी को जंगल में छोड़कर गया।

 सिद्धार्थ ज्ञान की खोज में,

अपनी प्यारी पत्नी और बच्ची को छोड़कर  गया।

  लक्ष्मण ने उर्मिला को छोड़कर  भाई के साथ वनवास किया।

 मैं तो इक्कावन साल तक उसके साथ रहा।

 पत्नी का बेगार रहा।

 अतः मेरा दुखी होना अपने को पापी समझना,

 इलाज कराने में कमी,

 प्यार भरे व्यवहार में कमी,

 उनकी माँगें पूरी करने में कमी,

नहीं कह सकता।

 ‌विधि की विडंबना।

 वह चल बसी।

मेरे जिंदा रहने के लिए 

 भगवान  की सूक्ष्म लीला मैं समझ न सका।

अब  भगवान के स्मरण करके 

अंत तक जीना है।

 निद्रा में ही मेरे प्राण पखेरू उड़जाना चाहिए।

 भारतीय  ऐतिहासिक घटनाएँ अधिक सांत्वना देती है।

 मीरा की  भक्ति,

 रानी लक्ष्मीबाई का जीवन।

 सबहीं नचावत राम गोसाईं।

एस. अनंत कृष्णन, चेन्नई तमिलनाडु हिंदी प्रेमी प्रचारक द्वारा स्वरचित भावाभिव्यक्ति रचना।

[25/08, 12:42 am] sanantha.50@gmail.com: ல் மொழிபெயர்த்துள்ளேன்.

விடுதலையின் பாதை

எஸ். அனந்த கிருஷ்ணன், சென்னை, தமிழ்நாடு

இந்திப் பற்றாளர், பிரச்சாரகர்

சுயமாக இயற்றிய உணர்வுப் படைப்பு

25-8-2026

விடுதலைக்கான வழி என்பது

உலகியல் பற்றுகளைத் துறந்து,

அலௌகிகமான ஆன்மிக வாழ்வை ஏற்றுக்கொள்வதாகும்.

இந்த உலகம் நிலையற்றது.

மரணம் நிச்சயமானது.

அன்புக்குரிய வாழ்க்கைத் துணைவியின் மரணம்,

துயரத்தில் ஆழ்ந்த மனம்,

விடுதலை பற்றிய சிந்தனையில் மூழ்குகிறது.

ராமரும் கிருஷ்ணரும் நினைவுக்கு வரும்போது

மனதிற்கு ஆறுதல் கிடைக்கிறது.

+++++++++++++

என் உயிருக்கு உயிரான

என் தர்மபத்தினி,

என் ஒரே நலம் விரும்பி,

ஐம்பத்தொரு ஆண்டுகள்

துன்பமும் இன்பமும் கலந்த வாழ்க்கையை வாழ்ந்து,

பேரன், பேத்திகளைக் கொஞ்சி மகிழ்ந்து,

என்னை அளவற்ற துயரக் கடலில் தள்ளிவிட்டு

சென்றுவிட்டாள்.

நான் மிகவும் துயருற்றேன்.

அவளுடைய மரணத்திற்கு

நான்தான் காரணமா?

அவளை வேலைக்காரியைப் போல நடத்தினேனா?

சரியான சிகிச்சை அளிக்கவில்லையா?

சரியான மருத்துவரிடம் ஆலோசனை பெறவில்லையா?

அப்போது இராமாயணத்தின் கதாபாத்திரங்கள்

என் நினைவுக்கு வந்தன.

ராமர், தம் மனைவி உயிருடன் இருந்தபோதும்

பல துயரங்களை அனுபவிக்க வேண்டியிருந்தது.

அழகிய சீதையை ராவணன் கடத்திச் சென்றான்.

அவளைத் தேடி ராமர் அலைந்தார்.

போரில் ராவணனை வென்று,

கற்புக்கரசியான சீதையை மீட்டுக்கொண்டு

அயோத்தி அரண்மனைக்கு அழைத்து வந்தார்.

ஆனால் ஒரு வண்ணானின் அவதூறான பேச்சைக்கூட

அவரால் பொறுத்துக்கொள்ள முடியவில்லை.

தம் சகோதரன் மூலம்

தம் மனைவியை இரக்கமின்றி

அடர்ந்த காட்டில் விட்டுவிடச் செய்தார்.

அத்தகைய குற்றத்தை

நான் என் மனைவியிடம் செய்யவில்லை.

தர்மத்தைப் காப்பவர்களாகக் கருதப்படும்

பாண்டவர்கள்,

தங்கள் மனைவியையே பணயம் வைத்து

சூதாட்டத்தில் இழந்தார்கள்.

நிறைந்த சபையில்

தங்கள் மனைவி அவமதிக்கப்படுவதையும்

பொறுத்துக்கொண்டார்கள்.

அத்தகைய நடத்தையை

நான் என் மனைவியிடம் காட்டவில்லை.

அவள் கேட்ட ஒவ்வொரு தேவையையும்

என்னால் முடிந்தவரை நிறைவேற்றினேன்.

கௌதம முனிவர்,

இந்திரனுக்கு கடுமையான சாபம் அளித்ததோடு,

அகலிகையை கல்லாகும்படி சபித்தார்.

அத்தகைய நடத்தையை

நான் என் மனைவியிடம் காட்டவில்லை.

நான் அவளுக்கு

கீழ்ப்படிந்து வாழ்ந்த கணவனாக இருந்தேன்.

நள மகாராஜா,

நள்ளிரவில் இருளில்

தம் மனைவியை காட்டில் விட்டுச் சென்றார்.

சித்தார்த்தர்,

ஞானத்தைத் தேடி

தம் அன்பு மனைவியையும் குழந்தையையும் விட்டுச் சென்றார்.

இலட்சுமணன்,

உர்மிளையை விட்டுவிட்டு

தம் அண்ணன் ராமருடன் வனவாசம் சென்றார்.

ஆனால் நான்

என் மனைவியுடன் ஐம்பத்தொரு ஆண்டுகள் வாழ்ந்தேன்.

அவளுக்காக உழைத்தேன்;

அவளுடைய வாழ்க்கைத் துணையாக இருந்தேன்.

ஆகையால்,

என் மனைவியின் மரணத்திற்காக

என்னைப் பாவியாகக் கருதுவதையும்,

சிகிச்சை அளிப்பதில் குறை இருந்தது என்றும்,

அன்பான நடத்தையில் குறை இருந்தது என்றும்,

அவளுடைய தேவைகளை நிறைவேற்றுவதில் குறை இருந்தது என்றும்

என்னால் கூற முடியாது.

இது விதியின் விந்தை.

அவள் என்னை விட்டுப் பிரிந்துவிட்டாள்.

நான் இன்னும் உயிருடன் இருப்பதற்குப் பின்னால்

இறைவனின் நுட்பமான திருவிளையாடல் என்ன என்பதை

என்னால் புரிந்துகொள்ள முடியவில்லை.

இனி இறைவனை நினைத்துக்கொண்டு

என் வாழ்நாளின் இறுதிவரை வாழ வேண்டும்.

ஒருநாள்

தூக்கத்திலேயே

என் உயிர்ப்பறவை பறந்து செல்ல வேண்டும்.

இந்திய வரலாற்றில் நிகழ்ந்த நிகழ்வுகள்

எனக்கு மிகுந்த ஆறுதலை அளிக்கின்றன.

மீராவின் பக்தி,

ராணி இலட்சுமிபாயின் வாழ்க்கை—

இவை அனைத்தும் எனக்கு வழிகாட்டுகின்றன.

“எல்லோரையும் ஆட்டுவிப்பவன்

ராம கோசாயி.”

எஸ். அனந்த கிருஷ்ணன், சென்னை, தமிழ்நாடு

இந்திப் பற்றாளர், பிரச்சாரகர்

சுயமாக இயற்றிய உணர்வுப் படைப்பு.

ओणम् त्योहार ज्ञ

 வணக்கம் நமஸ்தே.

 ஓணம்.


ஹிந்தி பணி.

तमिऴ हिंदी सेवा।

 रहीम का दोहा।

 ரஹீம் ஈரடி.

 திரு ஓணம் சிறப்பாக கொண்டாடப்படுகிறது.

  அதில் ஆண்டவனே ஆனாலும் 

மற்றவர்களிடம் கேட்கச் சென்றால் உருவம் குள்ளமாகும்.

மதிப்பு குறைந்து விடும்.


माँगे घटत रहीम पद, कितौ करो बड़ काम।तीन पैग वसुधा करी, तऊ बावने नाम॥

   दूसरों से माँगने में जाने पर हमारा आकार और हमारी मर्यादा घट जाता है। यहां विष्णु ने इंद्र के अपने देवराज पद घटाने महाबली चक्रवर्ती को पाताल भेजने तीन पग भूमि माँगने  वामनावतार ल जो ना पड़ा।

 राजनीति में पद बचाने  भले ही भगवान  हो,

ईमानदारी लोकप्रिय राजा को पाताल भेजने छद्मवेश में ही जाना पड़ा। 


மாங்கே --கேட்டால் 

Ghatath -(கடத்) குறைந்து விடுகிறது.

பத் --பதவி.

கிதோ கரோ bad (பட்) --எவ்வளவு பெரிய பதவியில்  இருந்தாலும் (பகவானாக  இருந்தாலும்)

. மஹாவிஷ்ணு  மகாபலி சக்கரவர்த்தியிடம்  மூன்றடி நிலம் தான் மாகப் பெற  குள்ளமான அந்தணர் வடிவம் எடுத்தார்.

 இதுவும் அரசியல். இந்திரனுக்கு பதவி போகக்கூடாது. மஹாபலி சிறந்த நேர்மையான அரசன். அவனை சூழ்ச்சியால் பாதாளம் அனுப்பிய விழா ஓணம்.

 இது தான்  இன்றைய அரசியல்.