Tuesday, August 14, 2012

तिरुक्कुरल----प्यार

तिरुक्कुरल----प्यार

अज्ञानी ही कहेंगे,धर्म का सहायक प्यार है.

खोज से पता चलेगा शौर्य पूर्ण कार्यों को करने और जीतने में भी प्यार ही साथ देता है
.
அறத்திற்கே அன்புசார் என்ப அறியார்,மறத்திற்கும் அஹ்தே துணை.

௭.७.7 धूप जैसे हड्डी -हीन कीड़े-मकोड़ों को सुखा देती है, वैसे ही धर्म देव प्यारहीन लोगों को सुखा देगा.

जिसमें प्यार नहीं है,उसको संसार में जीना दुर्लभ है.

என்பிலதனை வெயில் போலக் காயுமே அன்பிலதனை அறம்.

८.8 बिना प्यार का गृहस्थ जीवन ,मरुभूमि के बीच खड़े सूखे पेड़ के समान है.I, दिल में प्यार नहीं रहेगा तो
वह जीवन अस्थिर है. वह जीवन पनपेगा नहीं.

அன்பகத்தில் இல்லா உயிர் வாழ்க்கை,வன் பாற்கண் வற்றல் மரந்தளிர்த்தன்று

९.जिस के गृहस्थ जीवन में आतंरिक दिल का अंग प्यार नहीं है ,उसके बाहर का कोई भी इन्द्रिय काम नहीं
करेगा.

புறத்துருப்பெல்லாம் என் செய்யும், யாக்கை அகத்துருப்பு அன்பிலவர்க்கு.

१०. प्राण जो है, प्यार के द्वारा ही बना है.प्यार नहीं है तो मनुष्य शरीर हड्डियों को ढके चमड़े के बना है.उसमें जीवन का सार नहीं है.

அன்பின் வழியது உயிர் நிலை அஹ்திலார்க்.கு என்பு தோல் போர்த்த உடம்பு

तिरुक्कुरल -प्यार

thirukkural --pyaar
                         तिरुक्कुरल -प्यार 
१क्या .प्यार को बन्द रखने की कुण्डी कुछ है?
नहीं.जो प्यार करते है,उनके आँसू काफी है
जो सब लोगों को अपने प्यार की बातें प्रकट कर देगी.
அன்பிற்கு உண்டோ அடைக்கும் தாழ்,ஆர்வலர் புன்கண் பூசல் தரும்.
௨.जिस में आदर्श प्रेम नहीं है, वह सब कुछ अपना समझेगा.

जिसमें सच्चा प्यार है,वह अपनी हड्डियों को भी
 दूसरों को देकर आनंद का अनुभव करेगा.
அன்பிலார் எல்லாம் தமக்குரியர் அன்புடையார்
என்பும் உரியர் பிறர்க்கு .
३.बड़ों का कहना है अनुपम प्राण के प्यार का शारीरिक नाता प्यार भरी जिंदगी केलिए है.

அன்போடு இயைந்த வழக்கென்ப ஆருயிருக்கு
என்போடு இயைந்த தொடர்பு.
௪.4 गुण जो दूसरों को जानने-समझ ने की जिज्ञासा पैदा करता है,.वह गुण प्यार है.
प्यार का गुण दोस्ती देने का बेजोड़ साधन है.
அன்பு ஈனும் ஆர்வம் உடைமை அது ஈனும்
நண்பென்னும் நாடாச் சிறப்பு
5 .इस सांसारिक सुख-वैभव प्राप्त करना ही बड़ी बात है.वह प्यार से भरे - गुज़ारे जीवन की सफलता ही है.वहीं प्यार का फल है.
அன்புற்று அமர்ந்த வழக்கென்ப வையகத்து
இன்புற்றார் எய்துஞ் சிறப்பு.

धर्म

धर्म सांसारिक सत्य को जानने में पथप्रदर्शक है।

धर्म,नीति ,अनुशासन आदि शब्द सत्य पथ को लक्ष्य करके ही


प्रयोग किया जाता है.

धर्म सत्य का अंश है.

उपदेश के नाम से कुछ धर्म के अंश


प्यार ,करुणा,,विनम्रता ,परोपकार,सत्य,अहिंसा,सदाचार ,आदि चारित्रिक

बातों पर जोर देना ही धर्म है.ये देश,काल,मत ,आदि से पार मनुष्यता पर

जोर देकर भ्रात्रु भावना जगाती है.

धर्म की सज़ा



 धर्म  की सज़ा 

इस संसार में मनुष्य अपनी इच्छा पूरी करने के लिए भागीरथ प्रयत्न करता है.


इसमें कितने लोग सफलता प्राप्त करते हैं?

यह तो प्रत्यक्ष है ,कामयाबी प्राप्त करनेवाले

कठोर परिश्रमी मात्र नहीं ,

कई प्रकार के त्याग करते हैं.

कई लोग सांसारिक सुख तजते है.

पत्नी से बिछुड़ते है.

पुत्रों से दूर रहते हैं.

माँ-बाप ,अपने नाते रिश्ते पर ध्यान नहीं देते.

अपने वांछित कर्म में लगे रहते हैं.


ऐसे लोगों में वे ही नाम पाते है,

जो विश्व कल्याण के काम में लगे रहते हैं.

ऐसे महान लोगों को विरोध करनेवाले व्यक्ति,

उनको सर्वनाश करना चाहते है.

फिर भी महान महान ही होते है.

ईसा मसीह को शूली पर चढ़ाकर फूले न समाने वालों का नामों निशान तक नहीं.

पत्थर फेंककर मुहम्मद नबी को मक्का तक भगानेवाले कहाँ गए पता नहीं.

दुसरे प्रकार के लोग है, जो अपने भावी पीढी के लिए
संपत्ति जोड़ रहे हैं. लेकिन उनके उत्तराधिकार कैसे जियेंगे ?

उसे देखने नहीं रहेंगे.
कुछ लोगों की संपत्ति वे अनुभव करते है,

जो उनसे किसी प्रकार का सम्बन्ध नहीं रखते.
वास्तव में धर्म और विज्ञानं जग की भलाई में काम करते हैं.

नीति ग्रन्थ

नीति ग्रन्थ

नीति ग्रन्थ हमेशा मानव समाज को जीने के उपदेश देते है

.जीना तो जन्म लेने वाले सब जीव- रासियों केलिए प्राकृतिक देन है

.पर मनुष्य अन्य जीवों की तुलना में कृत्रम जीवन जीना श्रेष्ठ समझता है.

वह अपने बुद्धि बल से सब से सर्वोत्तम जीव है.

इतना होने पर भी वह सुखी नहीं है.क्यों?

वह एक नयी चीज़ का पता लगाकर संतोष नहीं हो रहा है


.एक नयी चीज़ खरीदकर संतोष नहीं हो रहा है.

उसके असंतोष में ही उन्नति है.

जो अपने प्राप्त जीवन से या वस्तु को पर्याप्त मानता है ,

वह चंद दिनों में ऊब जाताहै.

निष्क्रिय बनता है.जीने से मरना बेहतर मानता है.
ताज़ी हवा में उसकी जान है

.वैसे ही नयी चीज़ में ही आनंद है.

एक कन्या नए पुरुष से शादी करके बहुत खुश होती है,

क्या वह स्थायी है, नहीं.

एक बच्चे के जन्म लेते ही अपने पति से बढ़कर

नए बच्चे पर प्यार की वर्षा करती है.


अपना ज्यादा वक्त तो अपने नवजात शिशु से बिताती है.

यही आनंद नयी चीजों और आविष्कारों का सम्बन्ध है.
को जीने के उपदेश देते है


.जीना तो जन्म लेने वाले सब जीव- रासियों केलिए प्राकृतिक देन है

.पर मनुष्य  अन्य जीवों की तुलना में कृत्रम जीवन जीना श्रेष्ठ समझता है.

वह अपने बुद्धि बल से सब से सर्वोत्तम जीव है.

इतना होने पर भी वह सुखी नहीं है.क्यों?

वह एक नयी चीज़ का पता लगाकर संतोष नहीं हो रहा है


.एक नयी चीज़ खरीदकर संतोष नहीं हो रहा है.

उसके असंतोष में ही उन्नति है.

जो अपने प्राप्त जीवन से या वस्तु को पर्याप्त मानता है ,

वह चंद दिनों में ऊब जाताहै.

निष्क्रिय बनता है.जीने से मरना बेहतर मानता है.
ताज़ी हवा में उसकी जान है

.वैसे ही नयी चीज़ में ही आनंद है.

एक कन्या नए पुरुष से शादी करके बहुत खुश होती है,

क्या वह स्थायी है, नहीं.

एक बच्चे के जन्म लेते ही अपने पति से  बढ़कर 

 नए बच्चे पर प्यार की वर्षा करती है.


अपना ज्यादा वक्त तो अपने नवजात शिशु से बिताती है.

यही आनंद नयी चीजों और आविष्कारों का सम्बन्ध है.

संतोष

संतोष और आनंदप्रद जीवन जीने केलिए संसार है.

वास्तव में विश्व ऐसा है/? नहीं .क्यों?

मनुष्य जो कुछ सहज रूप में प्राप्त करता है उससे संतोष नहीं होता. वह अपने कठोर प्रयत्न द्वारा और नया

जीवन जीना चाहता है.आगे वह हमेशा दूसरों की प्रगति,दूसरों की बहुमूल्य वस्तुएं ,आधुनिक सुविधाएं आदि

सुनकर या देखकर उन्हें हासिल करने के लिए तड़पता है.

परिणाम स्वरुप अपनी मिली सहज सुख का ध्यान ही नहीं रहता.

अपनी शक्ति के विपरीत आशा में उसको कैसे शान्ति मिलेगी.

कुदरत

कुदरत

अजब की कुदरतें देखो ,

अरुण की लालिमा देखो,

चमकते चाँद देखो,

टिमटिमाते तारे देखो,

नील सागर की लहरें देखो,

नील गगन का विस्तार देखो.

कुदरत की सुन्दरता देखो,


परमेश्वर की लीला देखो,

सीखो समय पालन

इन कुदरत के चक्र से.