Tuesday, August 14, 2012

रूप और अरूप


रूप और अरूप 

रूप और अरूप भगवान की चर्चा संसार में हो रहा है.

मूर्ती पूजा उपासक अपनी मूर्ती को ही भगवान मानते हैं.

ईश्वर की कृपा  प्राप्त  करने  ईश्वरोपासना  करना 

आवश्यक है.कम से  कम एक दीप या मोम-बत्ती -या 

प्रकाश या  ध्वनी की जरूरत  अरूपोपासक   के लिये भी   हैं.
मेरे दादा करुप्पानासामी की पूजा करते थे.

उन के बाद मेरे काका ,चाचा किसीने याद नहीं की.मेरे 

अंतर्मन में एक उत्तेजना उठती  रही,मेरी मां

 और बहन- भाई मेरी प्रेरणा से उपासना करते हैं.

आश्चर्य की बात है कि मेरे भाई ने मेरे घर से तीन -चार 

किलो-मीटर की दूरी पर एक घर खरीदा

.मैं उसे देखने के पहले ही मेरी अंतःप्रेरणा से बताया कि 

वहां करुप्पानासामी है. वह तेरी रक्षा करता है.मेरे भाई ने 

वहां जाकर देखा तो सचमुच  घर  की  थोडी दूर  पर एक 

 करुप्पानासामी की मूर्ती   हैं.ऐसी कई घटनाएं 

हिंदुवो  के  जीवन में होती  रहती हैं.

 ईश्वर मनुष्य के रूप में आते हैं

कई रूपों में मूर्ती  बनकर  यत्र - -तत्र -सर्वत्र   विद्यमान है.

मनुष्य और धन


मनुष्य  और धन 

मनुष्य अपनी प्रतिष्ठा  बनाये रखने केलिये  धन  ही प्रधान मानता है

.एक जमाने में वह ईमान्दारी से कमाने के प्रयत्ने में कठोर मेहनत करते थे

.ऐसे भी लोग थे ,जो धनी लोगों से लूटकर गरीबों में  वितरीत करते थे.  लोगों में

अपने आडम्बर  पूर्ण आनंद मय  लौकिक जीवन के लिये लूट ने वाले  भी हैं .

अपने अहं की इच्छा पूर्ती के लिये देश द्रोही बनकर विदेशियो  के हाथ अपने को बेचनेवाले  भी है

.लोभी हैं,जो धन जोडने के लिये धन के पीछे पागल हो जाते है.

वे खुद भी खाते पीते है,दूसरो को भी खिलाते  हैं .कई लोग अपने भविष्य केलिये,अपनी संतानो के लिये

धन बचत करते हैं.जब इन सब की मृत्यू  हो जाती हैं, धन उन्हें जिंदा नहीं ला सकता.वाह! तिजोरियों  और 

लाकरों  में बंद रहकर  ,जो उनसे संबंध नहीं रखते,वे अनुभव करते हैं.

धन   को लेकर  कोई भी शाश्वत रूप में संसार में अमर नहीं हो सकते।.

नटराज  हमारे  गुरु

त्यागी स्वतत्रता सेनानी अपनी पत्रिका ज्ञान्भानु में लिखे निबंध.
अप्रैल १९१४ ई o .(तमिल से अनूदित)

नटराज का अर्थ है नृत्य मंच का नायक. इसका मतलब है यह संसार एक
नाटक मंच है.इस नाटक-मंच का नायक या
       मालिक
      सर्वव्यापक      आत्म   -वस्तु   है.  इस  आत्मा  वस्तु  की    अखंड   शक्ति   के   कारण   यह संसार सत्य  -सा   जीवित   सा  लगता   है.सभी  में यह आत्मा वास्तु नहीं  तो  यह संसार एक निकम्मा  जड़ -वस्तु मात्र  रहेगा .

मनुष्य    के गुरु आत्म वस्तु    नटराज   ही  गुरु है.
गुरु दो    प्रकार   के  होते   हैं .प्रत्यक्ष  गुरु.अप्रत्यक्ष   गुरु.
प्रत्यक्ष गुरु ही अपने  शिष्य  को  उपदेश  देकर  सत्य-मार्ग  पर  
ले  जाते  हैं.सामान्य  रूप  में ऐसे  लोगों  को ही गुरु कहते  हैं.
लेकिन  सारे  उपदेश अंतर्मन  से ही होना  चाहिए .जग  में जगदीश्वर  ही अपने अंतर  से विकास  का मार्ग दिखाना  चाहिए. दृष्टांत  के रूप में पौधे  अंतर से ही बढ़ते  हैं. खाद -पानी आदि उनके बढ़ने के अनुकूल साधन हैं.
ऐसे ही  मनको    भी बाहरी उपदेशों को अनुकूल साधन बनाकर बढना चाहिए.नटराज  ही प्रत्यक्ष  पूजनीय गुरु है.





मनुष्य ताज़ा पसंद करता है ;




   मनुष्य  ताज़ा  पसंद करता है ;

   संसार में जीने जीव जन्म लेते हैं अनेक.

    संख्या न मालूम कितनी.

कीड़े मकोड़ों ,सूक्ष्म जंतु हैं

उनमें कितने रोग कारणी.

कितने उनमें रोग हरनी;\

आदमखोर जानवर,

जंगली जानवर;

पालतू जानवर; 

फालतू जानवर;

उनमें भी चतुर;चालाक;विषैला;

मनुष्य है महान;

उसने मिटा दिया;

नामोनिशान;

कितने रंग-बिरंगे

कोमल पक्षी;

किनते तरह के पशु;

न जाने वह अपने बुद्धि बल से;

खुद जीने के लिए;

जड़-मूल नाश करता है;

वनस्पतियों को.

अपने अस्तित्व के लिए;

ईमान  बेचता है;

सत्य को गाढ़ता है;

न्याय का गला घोंटता है.

धन  धन धन

कमाने सौगुना लाभ उठाने,

अपना मत बेचता है;

मतलब की दुनिया बनाता है.

बेमतलब से बेईमानी का जीवन बिताता हैं.


सब को मिटाकर जीने  की  ख़ुशी में,

सांस   ले ने बैठता तो

दम घुटता है;

खाना नहीं पचता है;

कान नहीं सुनता है;

स्वार्थी की बात सुनता कोई नहीं.

काल कवलित हो जाताहै.

उसकी लाश जलाई जाती है.

जीवन में कुछ ही नहीं बचता.

नामी के नाम भी चंद सालों में,

भूल जाता है संसार.

नए विचार,नए सिद्धांत ;

नयी रीति -नीति;नया  उत्साह;

नए भगवान;

मनुष्य ताज़ा-पसंद करता है;

पुरानी कूड़े दान में चले जाते   हैं

मेंढक और कमल विवेक चिंतामणि


मेंढक  और कमल

विवेक चिंतामणि 

मेंढक नहीं जानता ,कमल का शहद.
पैदा  हुआ  है  वह भी कमल के तालाब में ही
पर भ्रमर जंगल के जानते है,कमल का मधु-रस.
आते हैं मधु चूसने.
वैसे ही शिक्षित घर में रहते ,
उनके ज्ञान नहीं जानते
शिक्षित ही शिक्षितों को पहचानकर,
करते हैं इज्जत.
தன்டாமரையினுட் பிறந்தும் அன்தேனுகரா மண்டூகம்,
வண்டோ காணத் திடையிருந்து வந்து கமல் மதுண்ணும்
பண்டே பழகிஇருந்தாலும்  அறியார் புல்லர் நல்லோரை,
கண்டே களித்தங் குறவாடி,தம்மிற் கலப்பர் கற்றோரே.
6.
वेद-मंत्र    पठन करनेवाले   विप्रों के लिए  एक बार वर्षा.
नीति-नियम पसंद राजा के लिए एक बार  वर्षा.
पति-व्रता नारी के लिए एक बार वर्षा.
यों ही एक मास . .में तीन बार होगी वर्षा .

வேதம் ஓதும்  வேதியர்க்கு ஓர் மழை
நீதி மன்னர் நெறியினுக்   கோர் மழை.
மாதர்  கற்புடை மங்கையர்க்கோர் மழை.
மாதம் மூன்று   மழை என
 பெய்யுமே

विवेक चिंतामणि -2**


விவேக் சிந்தாமணி --பார்ட்-2

विवेक चिंतामणि 

மங்கை கைகேயி சொற்கேட்டு மன்னர் புகழ் தசரதனும் மரணமானான்.
செங்கமலச் சீதையின் சொல் ராமன் கேட்டவுடன் சென்றான் மான் பின்.
தங்கையவள் சொற்கேட்ட ராவணனும் கிளையோடு தானும் மாண்டான்.
நங்கையர் சொற் கேட்பதெல்லாம் கேடுவரும் பேருலகோர் நகைப்பர் தாமே.

नरेशों में प्रसिद्ध  नरेश दशरथ ने   नारी कैकेयी की बातें सुनी,.मृत्यु  का गले लगाया.
लाल कमल-सी सुंदरी सीता के बात राम ने सुनी,दुःख का साथी बना.
सहोदरी सूर्पनखा की बातों में आकर रावण अपने रिश्तों और नातों सही चल बसा.
नारियों की बातें सुनना  हानिप्रद है.संसार के लोग हंसेंगे ही .

२. विवेक हीन गुरु अपनी शिष्या राजा कुमारी के मोह में,
राजा से कहा-तेरी बेटी अशुभ दिन में बनी है पुष्पवती.
दोष निवारण करने उसे संदूक में रख, नदी की धारा में ,
बहा दो. गुरु भक्त राजा ने ऐसा ही किया.
ठग गुरु ने संदूक की खोज में गया.
उसके पहले ही संदूक को देखा एक  राजकुमार  ने.
खोलकर देखा तो सुन्दर राजकुमारी.
सानंद उसे  साथ ले गया.
धोखेबाजी   गुरु नदी के किनारे पर गया,तो मिला संदूक.
शिकारी राजा  ने  उसमें एक शेर को बंद कर रखा था.
सानंद गुरे ने देखा संदूक खोला तो,
शेर झपटा उस पर .अपनी भूख मिटाई.
गुरु अपनी बद-इच्छा के फल-स्वरुप,
पहुंचा नरक.


மதியிலா மறையோன் மன்னர் மடந்தையை வேட்கையாமே.
ருதுவது  காலன் தன்னில் தோஷமேன்ருரைத்தே யாற்றில்,
புதுமையா எடுத்த போது பெட்டியில் புலிவாயாலே
அதிருடன்  தடியுடன் றே யாரு நரகடைந்தன் மாதோ.

प्रार्थना गीत. तिरुक्कुरल


प्रार्थना  गीत.   तिरुक्कुरल 
१.
अक्षरों का आरम्भ  "अ".आदि अक्षर.मूल स्वर.
.वैसे ही संसार  ईश्वर के आधार पर है.
அகர முதல எழுத்து எல்லாம் ஆதி பகவன் முதற்றே உலகு.
२.
विद्या अध्ययन  का फल ही ईश्वर  की प्रार्थना है.
शिक्षा  सीखने के बाद भी  ईश्वर की प्रार्थना न करें तो
उस शिक्षा से क्या प्रयोजन.?ज्ञान स्वरुप  ईश्वर की 
प्रार्थना  ही शिक्षितों के लिए फलप्रद है.

கற்றதனாலாய பயனென் கொல் வாலறிவன்  நற்றாள் தொழார் எனின்.

௩.
सुमन -सा  सब के मन में वास करनेवाले ईश्वर के शरणार्थी ही 
शाश्वत संतोष  प्राप्त कर सुखी जीवन बिता सकते हैं. 

மலர் மிசை ஏகினான் மாணடி சேர்ந்தார் 
நிலமிசை நீடு வாழ்வார்.
௪.
ईश्वर को प्रेम -द्वेष नहीं है.वे हैं सब के कृपालु.
ईश्वर पर विश्वास रखनेवाले ऊँचे चातित्रवान बनकर
संतापों को पारकर  सुखी जीवन पायेंगे 
வேண்டுதல் வேண்டாமை இலான் அடி சேர்ந்தார்க்கு  யாண்டும் இடும்பை இல.
5.
ईश्वर  को  पहचानकर  खूब   समझकर जो  
रहते हैं, उनको  कभी  दुःख नहीं होगा.
இருள் சேர் இரு வினையுஞ்  சேரா இறைவன் 
பொருள் சேர் புகழ்   புரிந்தார்      மாட்டு   
௬.
अभिलाषाओं  को  बढ़ानेवाले पंचेंद्रियों  को 
नियंत्रण   में रखकर  अनुशासन  प्राप्त करने ईश्वर की कामना करनेवाले 
स्थायी सुखी जीवन जीसकते हैं.
பொறிவாயில் ஐந்தவித்தான் போய் தீர் ஒழுக்க 
நெறி  நின்றார் நீடு வாழ்வார்.
7.
अनुपम ईश्वर के चरण स्पर्श न करनेवाले ,अपने दुखों से मुक्ति 
पा नहीं सकते.
தனக்கு உவமை இல்லாதான் தாள் சேர்ந்தார் கல்லால்,மனக்கவலை மாற்றல் அரிது.
௮.
धर्म सागर ईश्वर पर उम्मीद रखनेवाले ही भव सागर पार कर सकते है.
அறவாழி அந்தணன் தாள் சேர்ந்தார்க்கல்லால் 
பிற ஆழி நீந்தல் அரிது.
௯.
கோளில்  பொறியில்  குணமிலவே   என் குணத்தான்  தாளை வணங்காத்தலை.
पंचेंद्रिय काम नहीं करेंगे तो जीव जी नहीं सकते.
दिमाग काम नहीं करेगा.
ऐसे  ही  सर्वशक्तिमान ईश्वर पर प्रेम और विश्वास नहीं 
रखनेवाले श्रेष्ठ  नहीं बन सकते.

१०.
भगवान् के नैतिक सिद्धांतों का जीवन   में पालन  करनेवाले ही इस जन्म में भव सागर पार कर सकta hai.
பிறவிப்  பெருங்கடல் நீந்துவர் நீந்தார்
 இறைவனடி சேராதார்.

वर्षा की विशेषता---तिरुक्कुरल


वर्षा की विशेषता---तिरुक्कुरल 
வானின்று உலகம் வழங்கி வருதலால் 
தான் அமிழ்தம் என்றுணர பற்று.


बिन वर्षा के जीव-वनस्पति  संसार में जिन्दा रह नहीं सकते.
संत तिरुवल्लुवर ने वर्षा की विशेषता पर दस दोहे लिखे  है. उनका हिंदी भावार्थ देखिये:-----

वर्षा के कारण  ही संसार के जीव-वनस्पती आदि जी रहे हैं.अतः इस संसार के लिए वर्षा ही अमृत जैसा है.

௨.
वर्षा अनाज उगाता है पेट भरने,अतः वह भोजन दाता है. साथ ही प्यास भी बुझाता  है.

துப்பார்க்குத் துப்பாய துப்பாக்கித்  துப்பார்க்குத்
துப்பாய தூவும் மழை.

௩.
सागरों  से घेरे संसार में वर्षा नहीं होगी  तो संसार के जीवों की प्यास नहीं बुझेगी .

விண் இன்று பொய்ப்பின் விரிநீர் வியனுலகத்
துள் நின்று உடற்றும் பசி.

௪.
हल है.भूमि है.पर वर्षा नहीं होगी तो हल भूमि  का   क्या   प्रयोजन.?

ஏரின் உலா அர் உழவர்  புயலென்னும்  வாரி வளங்குன்றிக்  கால்.

वर्षा की विशेषता -संत वल्लुवर




वर्षा  की विशेषता -संत  वल्लुवर 

கெடுப்பதுவும்  கெட்டார்க்குச் சார்வாய் மற்றாங்கே
எடுப்பதும் எல்லாம் மழை.


वर्षा  जब नहीं होती, जब जनता  दुखी होती,तब जनता के पुनः-जीवन  केलिए जनता की  रक्षा  केलिए .संताप दूर करने के लिए वर्षा होती है..


६.बिन  वर्षा के पृथ्वी पर घास-फूस  भी नहीं उगती.
விசும்பின் துளி வீழின் அல்லால் மற்றாங்கே  பசும் புல் தலை காண்பு அரிது.
௭.
समुद्र का पानी ही भाप बनकर  पुनः वर्षा के रूप में बरसती है.यों बरसते  समय   वर्षा का पानी  समुद्र में नहीं गिरेगा तो  समुद्र सूख जाएगा.
நெடுங்கடலும் தன் நீர்மை குன்றும்  தடிந்  தெழிலி
தான் நல்கா தாகி விடின்.


9.बिन वर्षा के अकाल  पड   जाएँ तो  मंदिरों  में पूजा अर्चना उत्सव नहीं होंगे.


சிறப்பொடு பூசனை செல்லாது  வானம்
வரைக்கு மேல் வானோர்க்கும் ஈண்டு.


௧௦.
वर्षा के बिना   अकाल हो जाने पर  दान -पुण्य तपस्या  आदि संसार में नहीं होगी .
தானம் தவம் இரண்டும் தங்கா வியன்  உலகம்
வானம் வழங்காது எனின்.

मनुष्यता


मनुष्यता

मनुष्य  कैसा था? जंगली था. अब कैसा है? सभ्य है. मतलब?

बुद्धिमान.पढ़ा-लिखा है.चन्द्रमा तक पहुँच गया है.जल्दी ही वहां घर बनाएगा.पृथ्वी पर चंद दिन अंतरिक्ष  पर चंद दिन. क्या वह खुश रहता है?

यही
 समस्या  है.
क्यों?.
वह धर्म की बातों से हट रहा है.

नहीं.

जहग जगह पर मंदिर बनवा रहा है. साधू-संतों की  संख्या बढ़ रही है.

सुना है आश्रम में  अमीर ही जा सकते हैं/?

किसने कहा? दालान तक सब जा सकते हैं .

दीक्षा लेने के लिए ही पैसे हैं.

वह तो अमीरों का महल है. नहीं राज महल.

बिन पैसे भगवान की कृपा नहीं मिलेगी.

वह तो पूर्व जन का फल है.

हम तो पैसे देकर ईश्वर के साक्षात्कार की दीक्षा लेते है.

भगनान से मिलते हैं.

विवेकानंद ने रानाकृष्ण से पैसे देकर   दीक्षा  ली?

आधुनिक मनुष्य वातानुकूल कमरे में ही प्रार्थना करता है.

विवेकानंद  के जामाना बदल गया है.

भक्त  ध्रुव  ,भक्त प्रहलाद,भक्त मार्कंडेय,संत एकनाथ ,मीरा, आंडाल सब ने ईश्वर की कृपा प्राप्त की.

क्या? उन्होंने पैसे देकर दीक्षा ली/?

 आधुनिक युग विज्ञान का -है.कलि युग.

पीने का पानी भी रूपये देने से ही मिलता है

.आगे हवा केलिए भी

पैसे देने पड़ेंगे.

मनुष्यता कहाँ है//?

बूढ़े मां-बाप भी अनाथालय में है
.
अपने  प्यारे  पुत्र  या पुत्री   से बातें करने समय नहीं है
.
पड़ोसी से बातें करने  के लिए

.मदद करने के लिए मन नहीं.

बेकार  club जाने  समय है.

संत तिरुवल्लुवर. ; गृहस्थ जीवन


                                                                       पारिवारिक जीवन.

                                                              संत  तिरुवल्लुवर.
;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;=-        गृहस्थ जीवन------------------;
तमिल संत तिरुवल्लुवर ने परवारिक जीवन की श्रेष्ठता  और जीने की रीती को अपने दस दोहों में वर्णन किया है.

१.एक परिवार के मुखिया का अनिवार्य कर्त्तव्य  है-अपने माता-पिता और संतानों का देखपाल करना  और रक्षा करना.उनका सहायक बनना.

२.एक कुटुंब के नेता  वही है ,जो अनाथ,भूखे,और साधू-संतों का सहायक बनता है.और उनका साथ देता है.

३.स्वर्ग सिधारे लोगों की याद रखना,अच्छे सुखी लोगों का यशोगान करना,
अतिथि सत्कार करना,अपने नाते-रिश्तों की सहायता करना,अपने को भी सुखी और सुरक्षित रखना  आदि एक परिवार के नेता का कर्त्तव्य है.

४.एक पारिवारिक   प्रधान को बुरे मार्ग पर धन कमाना अपयश प्रदान करता है.उसको अपने अपवाद होने का भय अनिवार्य रूप में होना चाहिए.उसको 
अपने भोजन को दूसरों में बांटकर खाना चाहिए.यह भी पारिवारिक धर्म है.

५.पारिवारिक जीवन का ऊँचा गुण प्यार और धर्म के गुणों को अपनाना है.
ऐसे दाम्पत्य जीवन आदर्श मय हो जाता है.

६.धर्म के बल पर जो  परिपूर्ण जीवन  बिता रहा है(((,वह अपने  आदर्श जीवन के द्वारा ही))) ,उसको जीवन का सारा फल अपने आप प्राप्त हो जाएगा.

७.जो अपने पारिवारिक  लक्षण और  धर्म  सहज में ही निभाता है,सुखी जीवन जीने के प्रयास में लगता है,वही सर्वश्रेष्ठ कुटुंब का प्रधान है.

८ जो .खुद अनुशासित जीवन बिताकर,दूसरों को भी अच्छी चल-चलन सिखाकर अनुशासित मार्ग पर ले जाता  है,वही अनासक्त साधुवों से श्रेष्ठ है.

९ दूसरों  के अपवादों से बचकर सुचारू रूप से सन्मार्ग पर जीना ही आदर्श 
पारिवारिक जीवन है .

१० काल्पनिक .देवताओं से श्रेष्ठ  वही है,जो सांसारिक नीति -नियमों का अनुकरण करते हुए   गृहस्थ जीवन बिताता है.


अर्द्धांगिनी तिरुक्कुरल


अर्द्धांगिनी  तिरुक्कुरल 

१.
आदर्श गुणवती पत्नी वहीं है,जो अपने पति  की आमदनी  के अनुकूल मितव्यय करके  गृहस्थ चलाती है.
२. 
  १.  गृहस्थ  जीवन के योग्य गुणवती पत्नी एक पुरुष  को नहीं मिलें तो 
     उस पति को पद-धन -जो भी श्रेष्ठता  हो,उनसे कोई लाभ नहीं है.
३..
अर्द्धांगिनी  चरित्र हीन और अगुणी होने पर ,कुटुंब में सब सुविधाएं होने पर भी  वह परिवार  सुखी नहीं है.घर की धन-दौलत का भी कोई महत्व नहीं हैं.
अच्छी  पत्नी के अभाव में घर शून्य ही रहेगा.
४.
गृहस्थ  जीवन में पति व्रता नारी  मिल जायेगी तो उससे बढ़कर  
विशेषता और कुछ नहीं हैं.
५.
पतिव्रत नारी समय पर की वर्षा के सामान है.उसके कारण परिवार हरा-भरा हो जाएगा.
६.
आदर्श अर्द्धाग्नी वही है  जो अपनी पतिव्रता धर्म की  और पति के यश की 
रक्षा करते हुए दृढ़ चित से जीवन -क्रम निभाती है.
7.
एक नारी की रक्षा अंगरक्षकों से नहीं होगा.वह चाहती तो वह खुद अपने को बचा सकती है.अतः एक नारी को अबला कहना अनुचित है.
८.
योग्य पत्नी को योग्य चरित्रवान  पति के  मिलने पर  उसका गृहस्थ  जीवन एक नया संसार हो जाएगा.
९.
पत्नी  चरित्रहीनता  होने पर  पति घमंड  से  चल-फिर नहीं सकता.
१०.
एक आदर्श गृहस्थी   के लिए उस परिवार में जन्म लेनेवाली 
अच्छी संतानें ही विशेष  संपत्ति  हैं.

संतान भाग्य ==tirukkuralतिरुक्कुरल


संतान  भाग्य ==tirukkuralतिरुक्कुरल


                                                   १.

पारिवारिक जीवन की विशेषता 
अच्छे बच्चों को जन्म लेना है.
इससे बढ़कर कोई विशेषता  नहीं है.
                                      २.
बदनाम के डर  से   जीनेवाले को  ,
गुणी बच्चों के होनेपर  
जीवन भर  कोई भी हानि नहीं होगी.
३.
एक गृहस्थ  की संपत्ति  
उसकी संतानें हैं.
उन संतानों की संपत्ति 
उनके ज्ञान और शक्ति है.
४.
शिशु  अपने  हाथों से छूकर 
भोजन की थाली में खेलने पर,
वह खाना अमृत  से भी 
बढकर स्वादिष्ठ  रहेगा.

5.

अपने प्रिय पुत्र को गले लगाकर 
दुलार करने में   
सुख  और  आनंद मिलेगा. 
उनकी तुतली बोली  में बड़ी
प्रसन्नता होगी.
६.
जिन लोगों ने अपने बच्चों  की 
तुतली बोली नहीं सुनी,
वे ही कहेंगे मुरली और वीणा की ध्वनि 
मधुर है.
अर्थात संगीत से शिशु की 
तुतली बोली मधुर है.
७.
पिता का कर्त्तव्य है ,
अपने बच्चों को सुयोग्य बनाना
 जिससे वह सर ऊंचा करके
 सज्जन और शिक्षितों की सभा में चल सके.
८.
माता-पिता से पुत्र 
अधिक होशियार होना 
माता-पिता और संसार के लोगों के लिए 
बड़े गौरव की बात है.
९.
अपने पुत्र को संसार प्रशंसा  करने पर 
माता को अपने पुत्र के जन्म होते समय  जितना खुश होता है ,
उससे भी अधिक प्रसन्नता होगी.
१०
पुत्र की होशियारी और सद-व्यवहार  देखकर  दुनिया यह कहेगी  कि 
उनके माता -पिता 
 कठोर तपस्या
करके इस पुत्र को जन्म दिया है.
 ऐसा नाम माता -पिता को दिलाना ही 
पिता के प्रति पुत्र  का कर्त्तव्य  है.

अतिथि सत्कार तिरुक्कुरल




अतिथि  सत्कार   तिरुक्कुरल


१.अर्थ कमाना  अतिथि सत्कार के लिए है.धन जोड़कर 
मेहमानों को खाना खिलाने में उनकी सेवा करने में ही जीवन की सार्थकता है.


२.अतिथियों  के आने पर उनके खान-पान के  बिना विचारे ,उनको खाने का आग्रह न करके खुद खाना मनुष्यता नहीं है.भले ही वह खाना अमूल्य हो,वह अमृत हो, फिर भी अकेले खाना मनुष्य -प्रेम नहीं है.


३.उसका जीवन हमेशा सुखी रहेगा,दुखी कभी नहीं बनेगा,जो अतिथि की प्रतीक्षा करता है और अतिथि के आने पर सत्कार करता है.


४.जो मेहमान  किसी मांग पर हमारे घर आते   हैं ,उनका आदरसत्कार करनेवालों  के घर में लक्ष्मी का वास होगा.हमेशा प्रसन्नता होगी.

५.अपने घर आने वाले अतिथियों को खिला-पिलाकर बाकी जो बचा है,वही काफी है,   यों सोचनेवाले गुणी के खेत में बिना बीज के ही फसल पैदा होंगे.

५.वे ही देवों के प्यार के पात्र बनेंगे,जो आये हुए अतिथि का सत्कार करके सादर उनके जाने के बाद आगे आनेवाले  अतिथि के इंतजार में आँखे फैलाकर बैठते हैं.


६.अतिथि को स्वादिष्ट भोज देने में या अधिक भोजन खिलाने में कोई बड़प्पन नहीं है.अतिथि भोजन का बड़प्पन खिलानेवाले के मन से सम्बंधित  है.


७.अतिथियों को,रिश्तेदारों को उचित आदर-सत्कार न करके धन जोड़नेवाले ,अपने धन खो जाने के बाद पछतायेंगे क़ि हम अपने नाते-रिश्ते -अतिथि से प्यार भरे व्यवहार न करके बड़े बरबाद उठाये है

.
९.धन-दौलत  पाकर भी दूसरों की सेवा में न लगने का गुण मानसिक दरिद्रता के कारण होता है.यह उनकी बेवकूफी के कारण है.


१०.भोज के समय मुरझाये हुए फूल के सामान चेहरा 
दिखाना  मेजबान  और  मेहमान   दोनों  को शोभा   नहीं देती. 

तिरुक्कुरल मधुर बोली






तिरुक्कुरल  मधुर बोली

.


सज्जनों की बोली मीठी और प्यार भरी होती है.उनकी बोली में  ठगने की बात नहीं रहेगी.
२.
हँस -मुख़ मीठी बातें बोलनेवाले के दिल से प्रकट होनेवाली बातें मधुर होती हैं साथ ही देनेवाली सामग्री से श्रेष्ठ होती है.
३.
खिले मुख़ से अंतर -मन से मधुर वचन कहना ही धर्म है.
४.
दूसरों को सुख देनेवाली मधुर बोली बोलनेवालों की गरीबी दूर हो जायेगी.वे कभी दुखी नहीं होंगे.
५.
विनम्र और मधुर बोली बोलना एक व्यक्ति का आभूषण है.
६.
पाप मिटकर धर्म बढ़ने का एक मात्र मंत्र है  मीठी बोली बोलना.
७.
दूसरों को लाभप्रद ,सुमार्ग के मधुर वचन बोलनेवालों को भी हित पहुंचाकर 
उपकार करेगा.
८.
नीच विचारों के बिना बोलनेवाली मीठी बातें केवल इस जन्म कोही नहीं अगले जन्म  कोभी सुख देगा.
९.
जो मधुर वचन से आनेवाले सुख समझ लेता है,फिर वह क्यों कठोर 
वचन का प्रयोग करता है.नहीं करेगा.
१० 
मधुर वचन के होते कठोर वचन बोलना,फल  होने पर भी कच्चा फल उखड़ने के सामान है.


तिरुवल्लुवर का तिरुक्कुरल


तिरुवल्लुवर का   तिरुक्कुरल

१.
कृतज्ञता    ज्ञापन   
१. जब  हमें  जरूरत  होती  है ,तब  अचानक  
कोई  मदद  करें  तो उससे  मिलनेवाला  फल  बेजोड़  है.उसकी  तुलना  आकाश  और  भूमि  के 
साथ   भी  नहीं  कर  सकते .
2..
समय  पर  की  हुई मदद ,छोटी  होने  पर भी 
जरूरत के वक्त  करने  से  ,वह  मदद संसार  से बड़ी  है.
3.
जो  निष्काम  मदद करते  हैं ,वह मदद इस  संसार से बहुत   बड़ी  है.
4.
जो कृतज्ञ  है,वे  तिल  
बराबर  की हुई मदद को  भी ताड़- सम  बड़ा  मानेंगे .
5.
कोई मदद करें तो उसके  परिमाण  पर ध्यान  न  देकर ,उसके  गुण  के आधार  पर 
मूल्यांकन  करना  चाहिए 
६.
सज्जनों  की दोस्ती  को कभी  छोड़ना  नहीं चाहिए,.उनकी  मित्रता  को 
भूलना  भी ठीक नहीं है. .वैसे  ही कष्ट  के  समय हमारे  साथ जो   
रहे ,उनका  संग  तोड़ना  नहीं चाहिए.
7.
किसी   एक   की  सच्ची  और पवित्र  दोस्ती को हमेशा  हर  घडी 
सोच -सोचकर  बहुत  ही हर्ष  मनाना  चाहिए.
8.
जिसने  हमारी  मदद  की है,उसकी याद  हमेशा रखनी  चाहिए.  उसे 
 कभी  भूलना  नहीं चाहिए.किसीने  हमारी बुराई  की तो उसको 
तुरंत  भूलना चाहिए.वही श्रेष्ठ  गुण है .
9
हमको  किसीने कई   बुराईयाँ  करने पर भी उसकी की हुई छोटी सी  भलाई  की याद करने पर उसके अत्याचारों  को हम  भूल  जायेंगे 
10.
सभी  प्रकार  की भलायियों को नाश  करने  पर भी पाप  से बच  सकते 
है.लेकिन मदद भूलकर  कृतघ्न  जो होते  हैं  ,उस  पाप  का कोई 
प्रायश्चित  नहीं है.. 

तटस्थता



तटस्थता 
(न्याय)
किसी अपराधी को दंड  देते  समय  न्यायाधीश   को अपराधी  के अपराध पर ही  ध्यान देकर  सजा  देनी चाहिये
यह देखना  नहीं चाहिये कि वह दोस्त है या दुश्मन,अपना  है या पराया .अपने मन को गवाह बनाकर तटस्थता 
से फैसला  देना ही उचित धर्म है.
२.
सच्चे न्यायाधीश की  संपत्ती और यश कभी  नाश नहीं होगा.वह कई पीढी को  यश दिलात रहेगा.
३.
फैसला झूठा सुनाकर धन जोडकर सुखी जीवन   जीने  से .उन सुख  को त्यागकर आदर्श मन के साक्षी 
बनाकर जीने में ही भलाई है.  
4.
किसी  एक  को  सज्जन या दुर्जन जानना  हो तो उसको मिलनेवाले यश या अपयश  के द्वारा जान सकते है.
5.
मनुष्य का जीवनोनुन्नति होना और अवनती होना तो सहज बात है.लेकिन वही मनुष्य श्रेष्ठ है,जो अपने मन को 
गवाह बनाकर किसी भी हालत में न्याय से न हटकर दृढ रहता है.
६.
मनुष्य  को यह महसूस करना है कि न्याय से हटने पर उसका सर्वनाश हो जायेगा.जो  न्याप्रिय    है,उसकी  तटस्थता  उसको  गरीबी के  गड्ढे  में धकेल  देने  पर  भी   संसार  उसकी   प्रशंसा  ही   करेगा 

महा कवि भारती

तमिल भाषा भारत की प्राचीनतम भाषा है

.स्वतंत्रता संग्राम में सुप्त जनता को जगाकर स्वतंत्रता के लिए तमिल में जोशीली कवितायें गूंजने लगी.

उन कवितओं के महाकवि सुब्रह्मनिय भारती का जन्म दिन है आज .

११ -१२-१८८२ ई. में आपका जन्म हुआ .१९२१ ई. में ३९ साल की कम उम्र में स्वर्ग सिधारे.

आजादी के पहले ही उन्होंने गाया :

नाचेंगे गायेंगे यह कहते कहते,

,
हम आनंद स्वतंत्र प्राप्त कर चुके हैं।

बिल्ली को लेकर उनहोंने जो एकता गीत गाया हैं ,

उसकी तुलना की कविता अन्यत्र दुर्लभ है.

बिल्ली ने बच्चे दिए.

दिए बच्चे रंबिरंग के.

सफेद रंग की एक,

बिल्ली

हमारे घर में पली
बच्चे दिए .

श्याम रंग का था एक बच्चा.

काले रंग का एक.

लाल रंग का एक.

भोरे रंग का एक.

कबरी बिल्ली .

सांप रंग का एक.

रंग अनेक.

पर माँ तो एक.

यों ही भारत माँ एक.

भिन -भिन जाति धर्म के

भारतीय


उसकी संताने.

एकता का जितना आदर्श नमूना है यह कविता.

महा कवि भारती की आज

हम श्रद्धांजलियां समर्पण करेंगे.

तमिल के नीति ग्रन्थ

तमिल के नीति ग्रन्थ

वेट्री वेर्ककै

वेट्री वेर्कई ई.११-१२ वीं सदी के नीति ग्रन्थ है.इस ग्रन्थ के कवि कोर्कई देश के नरेश अति वीर राम पांडियन थे.
vetriverkai a moral book written by athi veera raama paandian king of korkai city. this is written in the year 11th -12th century.
इस में कई तत्व और नैतिक बातों को सुन्दर तमिल शब्दों में बताया हैं.

तमिल परिपाटी के अनुसार यह ग्रन्थ भी ईश्वर वन्दना से शुरू होता है.

ப்ரவணப் பொருளாம் பெருந்தகை ஐங்கரன்
சரண அற்புத மலர் தலைக்கு அணிவோமே .

प्रणव मंत्र का अर्थ स्वरुप पंचकर गणेश के

अद्भुत चरण -पुष्प को अपने सर पर धारण करेंगे.


१.अक्षर शिक्षक ईश्वर है.==எழுத்து அறிவித்தவன் இறைவன் ஆகும்.
alphabet teacher is God.

௨.கல்விக்கு அழகு கசடு அற மொழிதல்.
शिक्षा की खूब सूरति बिन गलती के बोलने में है,
Beauty of education is speaking without mistake.

3.செல்வருக்கு அழகு செழும் கிளை தாங்குதல்.

धनियों की खूबसूरती अपने नातों-रिश्तों की सहायताकरने और आश्रय देने में है.
Beauty of rich is to help his relations and to give shelter.

4.வேதியர்க்கு அழகு வேதமும் ஒழுக்கமும் .

ब्राह्मण की खूब सूरती वेद ज्ञान और अनुशासन में है.
Beauty of Brahman is in his knowledge in ved and discipline.

5 .மன்னவருக்கு அழகு செங்கோல் முறைமை.
राजा अर्थात शासकों की खूबसूरती तटस्थ और नैतिक शासन में.है.
Beauty of a king or administrator is in neutral and moral administraion.

6.வைசியர்க்கு அழகு வளர் பொருள் ஈட்டல்.
वैश्यों की खूबसूरती बढती धन कमाने में है.
Beauty of merchant is badhti dhan kamaanen mein hai.
7.உழவர்க்கு அழகு இங்கு உழுது ஊண் விரும்பல்.
किसानों की खूब सूरती खेती करके खाने में है.
. Beauty of a former is to cultivate the land and eat.

8.மந்திரிக்கு அழகு வரும் பொருள் உரைத்தல்.
मंत्री की खूबसूरती भविष्यवाणी कहने में है.
.

Beauty of a minister is to tell about the future.

9.தந்திரிக்கு அழகு தறுகண் ஆண்மை.

सेनापति की खूबसूरती उसकी वीरता और निडरता में है.
Beauty of a captan is in his bravary and his fearlessness.

10.உண்டிக்கு அழகு விருந்தோடு உண்டல்.
भोजन करने में खूब सूरती मेहमानों के साथ खाने में है.

Beauty of eating food is eating with guests.

वेट्री वेर्कई ई.११-१२ वीं सदी के नीति ग्रन्थ है.इस ग्रन्थ के कवि कोर्कई देश के नरेश अति वीर राम पांडियन थे.
vetriverkai a moral book written by athi veera raama paandian king of korkai city. this is written in the year 11th -12th century.
इस में कई तत्व और नैतिक बातों को सुन्दर तमिल शब्दों में बताया हैं.

तमिल परिपाटी के अनुसार यह ग्रन्थ भी ईश्वर वन्दना से शुरू होता है.

ப்ரவணப் பொருளாம் பெருந்தகை ஐங்கரன்
சரண அற்புத மலர் தலைக்கு அணிவோமே .

प्रणव मंत्र का अर्थ स्वरुप पंचकर गणेश के

अद्भुत चरण -पुष्प को अपने सर पर धारण करेंगे.


१.अक्षर शिक्षक ईश्वर है.==எழுத்து அறிவித்தவன் இறைவன் ஆகும்.
alphabet teacher is God.

௨.கல்விக்கு அழகு கசடு அற மொழிதல்.
शिक्षा की खूब सूरति बिन गलती के बोलने में है,
Beauty of education is speaking without mistake.

3.செல்வருக்கு அழகு செழும் கிளை தாங்குதல்.

धनियों की खूबसूरती अपने नातों-रिश्तों की सहायताकरने और आश्रय देने में है.
Beauty of rich is to help his relations and to give shelter.

4.வேதியர்க்கு அழகு வேதமும் ஒழுக்கமும் .

ब्राह्मण की खूब सूरती वेद ज्ञान और अनुशासन में है.
Beauty of Brahman is in his knowledge in ved and discipline.

5 .மன்னவருக்கு அழகு செங்கோல் முறைமை.
राजा अर्थात शासकों की खूबसूरती तटस्थ और नैतिक शासन में.है.
Beauty of a king or administrator is in neutral and moral administraion.

6.வைசியர்க்கு அழகு வளர் பொருள் ஈட்டல்.
वैश्यों की खूबसूरती बढती धन कमाने में है.
Beauty of merchant is badhti dhan kamaanen mein hai.
7.உழவர்க்கு அழகு இங்கு உழுது ஊண் விரும்பல்.
किसानों की खूब सूरती खेती करके खाने में है.
. Beauty of a former is to cultivate the land and eat.

8.மந்திரிக்கு அழகு வரும் பொருள் உரைத்தல்.
मंत्री की खूबसूरती भविष्यवाणी कहने में है.
.

Beauty of a minister is to tell about the future.

9.தந்திரிக்கு அழகு தறுகண் ஆண்மை.

सेनापति की खूबसूरती उसकी वीरता और निडरता में है.
Beauty of a captan is in his bravary and his fearlessness.

10.உண்டிக்கு அழகு விருந்தோடு உண்டல்.
भोजन करने में खूब सूरती मेहमानों के साथ खाने में है.

Beauty of eating food is eating with guests.

श्रवण तिरुक्कुरल

shravan
श्रवण      तिरुक्कुरल 

greatest wealth in the wold is listening.

1. सब से श्रेष्ठ दुर्लभ धन श्रवण ही है.श्रवण करना ही सब धनों से विशिष्ठ धन है.

செல்வத்துள் செல்வம் செவிச்செல்வம் அச் செல்வம்
செல்வத்துள் எல்லாம் தலை.

2.जब श्रवण के लिए भोजन सामग्री नहीं मिलती ,तभी ज्ञानी लोग थोडा भोजन पेट को देते है.

செவிக்கு உணவு இல்லாதா போழ்து சிறிது வயிற்ருக்கு ஈயப்படும் .

when there is nothing to listen, that time only scholars give some little food to their stomach.

3.श्रवण कर ज्ञान प्राप्त करनेवाले इस संसार में रहें तो वे देव तुल्य ज्ञानी है.

the people who are intrest to get knowledge through listening they are like gods

செவயுணவிர் கேள்வி உடையார் அவிஉணவின் ஆன்றோரொடு ஒப்பர் நிலத்து.


४.अशिक्षित होने पर भी,शिक्षि लोगों से ज्ञान की बातें सुना करेंगे तो वह ज्ञान दुःख के समय बैसाखी -सा सहारा देगा

when illiterates are ready to get knowledge through listening from litterates,the knowledge what they get ,supports them like a crutch.

கற்றிலன் ஆயினும் கேட்க,அஹ்து ஒருவற்கு ஒற்கத்தின் ஊற்றாம் துணை.

௫.मौखिक अनुशासन की बातें, श्रवण करने पर श्रोता को हमेशा सहायता करेंगी जैसा कीचड में फिसले लोगों को लकड़ी सहारा देकर गिरने से बचाता है.

oral discipline word supports a man who is listening it.it supports him always like a stick which helps a man when he slips in the clay.


இழுக்கல் உடையுழி ஊற்றுக்கோல் அற்றே ஒழுக்கம் உடையார்ச் சொல்.

विवेक चिंतामणि

विवेक चिंतामणि

तमिल भाषा में कई कवितायें मनुष्य के आदर्श जीवन के मार्ग दर्शक हैं. वैसे ही जीवन से सम्बंधित कविता संग्रह है विवेक चिंतामणि. इस कविता संग्रह के कवि नाम का पता नहीं है.यह कविता संग्रह विनय भगवान की प्रार्थना से आरम्भ होता है.

तिरुवरुनै गोपुर में विराजे,विनायक भगवान् से प्रार्थना करें तो,

मात्रु गर्भ से जन्मे इस जन्म के सकल दुखों से मिलेगी मुक्ति.

प्रारब्ध कर्म के पाप मिटेंगे.पीडाएं सारी दूर हट जायेंगी.

அல்லல்போம் வல்வினைபோம் அன்னை வயிற்றில் பிறந்த தொல்லை போம்.

போகாத்துயரம் போம்.;நல்ல குணமதிக மாமருணைக் கோபுரத்துள் மேவும்

கணபதியைக் கை தொழுதக் கால்.
==============================

सातों से लाभ नहीं,

बच्चा संकट में सहायता नहीं करता, तो उससे नहीं प्रयोजन.
भोजन अति भूख के समय भूख नहीं मिटाता तो उससे नहीं प्रयोजन.
पानी प्यास नहीं बुझाता तो उससे नहीं प्रयोजन.
स्त्री दरिद्रिय नहीं जानती तो उससे नहीं प्रयोजन.
राजा क्रोधी है तो उससे नहीं प्रयोजन.
शिष्य गुरु की बात नहीं मानता तो उससे नहीं प्रयोजन
तीर्थ पाप नहीं मिटाता तो उससे प्रयोजन नहीं.
उपर्युक्त सातों से नहीं कोई प्रयोजन.जो आवश्यक समय पर साथ नहीं देता.

ஆபத்துக்குதவாப்பில்லை,அரும்பசிக்கு உதவா அன்னம்,
தாபத்தைத் தீராத் தண்ணீர்,தரிந்திரம் அறியாப் பெண்டிர்
கோபத்தை அடக்கா வேந்தன் குருமொழி கொள்ளாச் சீடன்
பாபத்தை தீராத் தீர்த்தம் பயனிலை எழுந்தானே.

सत्य

सत्य
सत्य क्या है? सत्य वही है,जो दूसरों की बुराई न करें. हमेशा ऐसे शब्द बोलना,जिससे दूसरों को हानि न पहुंचे.

வாய்மை எனப்படுவது யாதெனில் யாதொன்றும் தீமை இலாத சொலல்.

तिरुक्कुरल----प्यार

तिरुक्कुरल----प्यार

अज्ञानी ही कहेंगे,धर्म का सहायक प्यार है.

खोज से पता चलेगा शौर्य पूर्ण कार्यों को करने और जीतने में भी प्यार ही साथ देता है
.
அறத்திற்கே அன்புசார் என்ப அறியார்,மறத்திற்கும் அஹ்தே துணை.

௭.७.7 धूप जैसे हड्डी -हीन कीड़े-मकोड़ों को सुखा देती है, वैसे ही धर्म देव प्यारहीन लोगों को सुखा देगा.

जिसमें प्यार नहीं है,उसको संसार में जीना दुर्लभ है.

என்பிலதனை வெயில் போலக் காயுமே அன்பிலதனை அறம்.

८.8 बिना प्यार का गृहस्थ जीवन ,मरुभूमि के बीच खड़े सूखे पेड़ के समान है.I, दिल में प्यार नहीं रहेगा तो
वह जीवन अस्थिर है. वह जीवन पनपेगा नहीं.

அன்பகத்தில் இல்லா உயிர் வாழ்க்கை,வன் பாற்கண் வற்றல் மரந்தளிர்த்தன்று

९.जिस के गृहस्थ जीवन में आतंरिक दिल का अंग प्यार नहीं है ,उसके बाहर का कोई भी इन्द्रिय काम नहीं
करेगा.

புறத்துருப்பெல்லாம் என் செய்யும், யாக்கை அகத்துருப்பு அன்பிலவர்க்கு.

१०. प्राण जो है, प्यार के द्वारा ही बना है.प्यार नहीं है तो मनुष्य शरीर हड्डियों को ढके चमड़े के बना है.उसमें जीवन का सार नहीं है.

அன்பின் வழியது உயிர் நிலை அஹ்திலார்க்.கு என்பு தோல் போர்த்த உடம்பு

तिरुक्कुरल -प्यार

thirukkural --pyaar
                         तिरुक्कुरल -प्यार 
१क्या .प्यार को बन्द रखने की कुण्डी कुछ है?
नहीं.जो प्यार करते है,उनके आँसू काफी है
जो सब लोगों को अपने प्यार की बातें प्रकट कर देगी.
அன்பிற்கு உண்டோ அடைக்கும் தாழ்,ஆர்வலர் புன்கண் பூசல் தரும்.
௨.जिस में आदर्श प्रेम नहीं है, वह सब कुछ अपना समझेगा.

जिसमें सच्चा प्यार है,वह अपनी हड्डियों को भी
 दूसरों को देकर आनंद का अनुभव करेगा.
அன்பிலார் எல்லாம் தமக்குரியர் அன்புடையார்
என்பும் உரியர் பிறர்க்கு .
३.बड़ों का कहना है अनुपम प्राण के प्यार का शारीरिक नाता प्यार भरी जिंदगी केलिए है.

அன்போடு இயைந்த வழக்கென்ப ஆருயிருக்கு
என்போடு இயைந்த தொடர்பு.
௪.4 गुण जो दूसरों को जानने-समझ ने की जिज्ञासा पैदा करता है,.वह गुण प्यार है.
प्यार का गुण दोस्ती देने का बेजोड़ साधन है.
அன்பு ஈனும் ஆர்வம் உடைமை அது ஈனும்
நண்பென்னும் நாடாச் சிறப்பு
5 .इस सांसारिक सुख-वैभव प्राप्त करना ही बड़ी बात है.वह प्यार से भरे - गुज़ारे जीवन की सफलता ही है.वहीं प्यार का फल है.
அன்புற்று அமர்ந்த வழக்கென்ப வையகத்து
இன்புற்றார் எய்துஞ் சிறப்பு.

धर्म

धर्म सांसारिक सत्य को जानने में पथप्रदर्शक है।

धर्म,नीति ,अनुशासन आदि शब्द सत्य पथ को लक्ष्य करके ही


प्रयोग किया जाता है.

धर्म सत्य का अंश है.

उपदेश के नाम से कुछ धर्म के अंश


प्यार ,करुणा,,विनम्रता ,परोपकार,सत्य,अहिंसा,सदाचार ,आदि चारित्रिक

बातों पर जोर देना ही धर्म है.ये देश,काल,मत ,आदि से पार मनुष्यता पर

जोर देकर भ्रात्रु भावना जगाती है.

धर्म की सज़ा



 धर्म  की सज़ा 

इस संसार में मनुष्य अपनी इच्छा पूरी करने के लिए भागीरथ प्रयत्न करता है.


इसमें कितने लोग सफलता प्राप्त करते हैं?

यह तो प्रत्यक्ष है ,कामयाबी प्राप्त करनेवाले

कठोर परिश्रमी मात्र नहीं ,

कई प्रकार के त्याग करते हैं.

कई लोग सांसारिक सुख तजते है.

पत्नी से बिछुड़ते है.

पुत्रों से दूर रहते हैं.

माँ-बाप ,अपने नाते रिश्ते पर ध्यान नहीं देते.

अपने वांछित कर्म में लगे रहते हैं.


ऐसे लोगों में वे ही नाम पाते है,

जो विश्व कल्याण के काम में लगे रहते हैं.

ऐसे महान लोगों को विरोध करनेवाले व्यक्ति,

उनको सर्वनाश करना चाहते है.

फिर भी महान महान ही होते है.

ईसा मसीह को शूली पर चढ़ाकर फूले न समाने वालों का नामों निशान तक नहीं.

पत्थर फेंककर मुहम्मद नबी को मक्का तक भगानेवाले कहाँ गए पता नहीं.

दुसरे प्रकार के लोग है, जो अपने भावी पीढी के लिए
संपत्ति जोड़ रहे हैं. लेकिन उनके उत्तराधिकार कैसे जियेंगे ?

उसे देखने नहीं रहेंगे.
कुछ लोगों की संपत्ति वे अनुभव करते है,

जो उनसे किसी प्रकार का सम्बन्ध नहीं रखते.
वास्तव में धर्म और विज्ञानं जग की भलाई में काम करते हैं.

नीति ग्रन्थ

नीति ग्रन्थ

नीति ग्रन्थ हमेशा मानव समाज को जीने के उपदेश देते है

.जीना तो जन्म लेने वाले सब जीव- रासियों केलिए प्राकृतिक देन है

.पर मनुष्य अन्य जीवों की तुलना में कृत्रम जीवन जीना श्रेष्ठ समझता है.

वह अपने बुद्धि बल से सब से सर्वोत्तम जीव है.

इतना होने पर भी वह सुखी नहीं है.क्यों?

वह एक नयी चीज़ का पता लगाकर संतोष नहीं हो रहा है


.एक नयी चीज़ खरीदकर संतोष नहीं हो रहा है.

उसके असंतोष में ही उन्नति है.

जो अपने प्राप्त जीवन से या वस्तु को पर्याप्त मानता है ,

वह चंद दिनों में ऊब जाताहै.

निष्क्रिय बनता है.जीने से मरना बेहतर मानता है.
ताज़ी हवा में उसकी जान है

.वैसे ही नयी चीज़ में ही आनंद है.

एक कन्या नए पुरुष से शादी करके बहुत खुश होती है,

क्या वह स्थायी है, नहीं.

एक बच्चे के जन्म लेते ही अपने पति से बढ़कर

नए बच्चे पर प्यार की वर्षा करती है.


अपना ज्यादा वक्त तो अपने नवजात शिशु से बिताती है.

यही आनंद नयी चीजों और आविष्कारों का सम्बन्ध है.
को जीने के उपदेश देते है


.जीना तो जन्म लेने वाले सब जीव- रासियों केलिए प्राकृतिक देन है

.पर मनुष्य  अन्य जीवों की तुलना में कृत्रम जीवन जीना श्रेष्ठ समझता है.

वह अपने बुद्धि बल से सब से सर्वोत्तम जीव है.

इतना होने पर भी वह सुखी नहीं है.क्यों?

वह एक नयी चीज़ का पता लगाकर संतोष नहीं हो रहा है


.एक नयी चीज़ खरीदकर संतोष नहीं हो रहा है.

उसके असंतोष में ही उन्नति है.

जो अपने प्राप्त जीवन से या वस्तु को पर्याप्त मानता है ,

वह चंद दिनों में ऊब जाताहै.

निष्क्रिय बनता है.जीने से मरना बेहतर मानता है.
ताज़ी हवा में उसकी जान है

.वैसे ही नयी चीज़ में ही आनंद है.

एक कन्या नए पुरुष से शादी करके बहुत खुश होती है,

क्या वह स्थायी है, नहीं.

एक बच्चे के जन्म लेते ही अपने पति से  बढ़कर 

 नए बच्चे पर प्यार की वर्षा करती है.


अपना ज्यादा वक्त तो अपने नवजात शिशु से बिताती है.

यही आनंद नयी चीजों और आविष्कारों का सम्बन्ध है.

संतोष

संतोष और आनंदप्रद जीवन जीने केलिए संसार है.

वास्तव में विश्व ऐसा है/? नहीं .क्यों?

मनुष्य जो कुछ सहज रूप में प्राप्त करता है उससे संतोष नहीं होता. वह अपने कठोर प्रयत्न द्वारा और नया

जीवन जीना चाहता है.आगे वह हमेशा दूसरों की प्रगति,दूसरों की बहुमूल्य वस्तुएं ,आधुनिक सुविधाएं आदि

सुनकर या देखकर उन्हें हासिल करने के लिए तड़पता है.

परिणाम स्वरुप अपनी मिली सहज सुख का ध्यान ही नहीं रहता.

अपनी शक्ति के विपरीत आशा में उसको कैसे शान्ति मिलेगी.

कुदरत

कुदरत

अजब की कुदरतें देखो ,

अरुण की लालिमा देखो,

चमकते चाँद देखो,

टिमटिमाते तारे देखो,

नील सागर की लहरें देखो,

नील गगन का विस्तार देखो.

कुदरत की सुन्दरता देखो,


परमेश्वर की लीला देखो,

सीखो समय पालन

इन कुदरत के चक्र से.