Monday, November 19, 2012

है।है।है।

मनुष्य  को नचानेवाली  बड़ी शक्ति एक है। वह शक्ति मनुष्य को अक्सर भ्रम में डाल  देती है। मनुष्य असमंजस में पड जाता है।  अपने बुद्धि बल से जीतनेवाला मनुष्य  सफलता  को भाग्य के हाथ में सौंप देता है। यह विधिवाद न हो तो मनुष्य का जीवन क्या हो जाता। कर्म-फल,पाप-पुण्य ,पूर्व जन्म का फल ये शब्द अक्सर मनुष्य के मुख से निकलते रहते हैं।
ऐसी परिस्थिति में उसको बचने-बचाने,बढ़ने बढाने,दुःख को सुख में बदलने एक ऐसी शक्ति की जरूरत होती है।
वही ईश्वरीय शक्ति है।
यह  शक्ति ,अपूर्व आत्म संतोष देने की शक्ति मनुष्य को मिलनी है। यह क्या केवल सन्यासी को ही मिलेगी?लौकिक
पुरुष क्यों प्राप्त नहीं कर सकता ? उसमें कौन सी कमी है?
उसमें नश्वर दुनिया का मोह घर कर लेता है।वह  जग को अपने इशारे पर नचाना चाहता हैं। उसमें अहम् ब्राह्मास्मी  का अहम्  हो जाता है।हर मनुष्य अपने को ही भगवान का अवतार मानने लगता है।वैज्ञानिक  जो सुख सुविधाओं का आविष्कार करता है,उससे कोई हानी नहीं हैं। जो अपने को ईश्वर मानता है,वह मानुष को अपना अधीन बनाने के लिए मानुष-मानुष में भेद भाव पैदा करता है। ईश्वर के दर्शन एकता के लिए है।वास्तव  में वह फूट डालने लगता है।
अतः ईश्वर और धर्म जो  एक बड़ी शक्ती  है,वह छोटे दायरे में फिसल जाती है।
वैज्ञानिक साधन सब के लिए हैं।धर्म मनुष्यता की रक्षक के  नाम से भक्षक  हो जाता है।अतः मनुष्य दुखी है।