Monday, March 4, 2013

५.  प्रभु -----जात टरो।

सन्दर्भ :-  सूरदास इस पद में अपने अवगुणों को माफ करके अपने को उद्धार  करने  की प्रार्थना अपने इष्ट देव से करते हैं।

व्याख्या:-  सूरदास ईश्वर से प्रार्थना करते हैं --हे प्रभु! मेरे अवगुणों को क्षमा कर दो। अपने मन में मेरे  अवगुणों को स्थान मत दो। तुम तो सब को सामान दृष्टी से देखते हो। अतः मेरा उद्धार करो।
मैं गंदे नाले का पानी हूँ। तुम तो पवित्र गंगा हो। नाले का पानी नदी में संगम होने पर दोनों ही पवित्र हो जाता है।
वैसे ही तुम में मैं मिल्जाऊँ,तो पवित्र हो जाता। एक ही लोहा तलवार के रूप में वध करता है;वहीं लोहा पूजा का भी काम आता है। इसी लोहे को पारस मणि सोना बना देता है। वैसा ही मेरा उद्धार करो। मेरे उद्धार न करने का मतलब है,तुम समदर्शी  अर्थात सब का उद्धारक नहीं हो।
विशेष :-- सूरदास ईश्वर से अपना अधिकार माँगते  हैं। उनका कहना है कि  पापियों की रक्षा करना समदर्शी ईश्वर के अद्भुत गुण है.
६. सरन--------कंस प्चार्यो।
सन्दर्भ:- इस पद में सूरदास ईश्वर के शरानागात्वत्सलता  की महिमा गाते हैं।
व्याख्या:-  भगवान तो अपने सच्चे भक्तो की पुकार  तुरंत सुनकर उद्धार करते हैं। जो उनकी पूर्ण शरणागति में आ जाते हैं, वे उनके रक्षक हैं।
व्याख्या:--सूरदास कहते हैं  कि  भगवान कृष्ण  ने  उनके शरण में आये सभी भक्तों का उद्धार किया है। किसका उद्धार उनहोंने नहीं किया? वे  कृष्ण की शरणागत वत्सलता के कई उदाहरण देते हैं। कवी सूर कहते हैं कि  भक्तों की रक्षा के लिए भगवान श्री कृष्ण सुदर्शन चक्र के साथ दौड़ आये हैं। श्री कृष्ण ने दुर्वासा मुनि के क्रोध से उनके भक्त अम्बरीश को बचाया था। गोवर्धन  गिरी को अपनी उंगली से उठाकर गोपियों की रक्षा की और इंद्र के गर्व का नाश किया। अपने भक्त प्रहलाद  की रक्षा के लिए नरसिम्हावतार  लेकर उसके पिता हिरण्य काशीपु  का वध किया था। गजेन्द्र के भक्ति  भरी पुकार सुनकर अपने चक्र से मगर-मच्छ को मारकर बचाया
था। कंस  को पछाड़ने की शक्ति श्री कृष्ण के सिवा किसमें  हैं?
विशेष:-भगवान की भक्तवत्सलता और शरागत वत्सलता का वर्णन सरल शैली में प्रकट करने की क्षमता सूर को छोड़कर अन्य  कवी में हो ही नहीं सक्ति।