Monday, March 4, 2013

४.छांडी --------दूजो रंग।।

सन्दर्भ :- सूरदास  इस पद में अपने मन को संबोधित करते है। मनुष्य  मन को सत्संगति की ज़रुरत है।
बुरी संगती से भजन में भंग होता है। इस पद में सोदाहरण सत्संगति और ईश्वर भक्ति का महत्त्व समझा  रहे  हैं।

व्याख्या :--   सूरदास अपने मन को संबोधित करते हैं  कि  हे मन!तू बुरा संग  छोड़ दो। बुरे संग के  कारण बुद्धि भ्रष्ट  हो जाती है। ईश्वर भजन में अडचनें आ जाती है। ऐसेबुरे संग छोड़ने में ही भलाई है;बुरे संग में पड़कर फिर अच्छे विचार आना असंभव है। कौआ काला है;क्या उसको कपूर खिलाने पर सफेद होगा?कभी नहीं।
कुत्ते को गंगा में नहाने से क्या वह पवित्र बनेगा?कभी नहीं। क्या गधे पर सुगन्धित द्रव्य लगाने से कोई परिवर्तन होगा? उसको तो धुल में लोटने में आनंद होता है। बन्दर को आभूषणों से सज्जित करने से उसके गुण में बदलाव होगा ?नहीं। हाथी को नदी में नहाने से क्या लाभ होगा?वह तो अपने सर पर धुल डालकर आनंद का अनुभव करेगा। पत्थर पर तीर चलने से क्या कोई असर होगा?तरकस ही खाली होगा। काले कम्बल पर दूसरा रंग नहीं चढेगा। कवी के कहने का तात्पर्य है--बुरे संग में पड़ने पर सुधारना-सुधारना असंभव है।

विशेष :-  मन अपवित्र हो तो भजन में बाधाएँ  होंगी। अतः मन को कुसंग और कुविचार से दूर रखना चाहिये।