Saturday, May 30, 2015

तिरुवाचकम् --२६ --३० tiruvachakam


तिरुवाचकम् --२६ --३० 

विण णिरैंतु ---आकाश बन कर  व्यापित 

 मण णिरैंतु  =मिट्टी बनकर  व्यापित 


 मिक्काय विलंगोलियाय = महान बनकर सहज रूप में प्रकाश रूप 


एंनिरन्त ==मन लांघकर 
 तेल्लै  इलातावन = असीम 
  निन  पेरुंचीर = तेरी अति विशेषता को 

पोल्ला  विनै येन  पुकलुमा रोन्ररियेन = बुरे कर्म किये मैं  ,तेरे यशोगान करना नहीं जानता। 

मानिक्कावासकर आकाश और भूमि में व्यापित 
ईश्वर  को पंच भूतगणों में व्यापित मानते हैं ;
वे खुद नहीं  जानते कि  सर्वेश्वर की प्रशंसा कैसे करें।

पुल्लाहिप  पूड़ाय   पुलुवाय मरमाहिप = घास -फूस ,कीड़े-मकोड़े , पेड़ 


पल विरुक  माकीप  परवैयायप पाम्बाहिक -- नाना प्रकार के पशु  -पक्षी ,सांप ,

कल्लाय मनिताराय्प   पेयाय  गणंगलाय =पत्थर ,मनुष्य ,भूत-प्रेत ,पंच भूत गण 


वल्लरसुराहि   मुनिवरायत्  देवरायच -महाबली राक्षस असुर ,मुनि -देव 

चेल्ला अ निंरा इत्तावर जंगमत्तुल --आदि से गतिशील इस जड़ -चेतन की सृष्टियों में 

एल्लाप  पिरप्पुम  पिरंतिलैत्तेन  एम्पेरुमान --सभी जन्म लेकर दुर्बल गो गया हूँ। 

मेय्ये युन  पोन्नडिकल कंडिनॄ  वीडुपेट्रेन।  --वास्तव में तेरे स्वर्ण चरण शोभित चरण देखकर मुक्ति पा लिया। 

कवि ईश्वर शिव के चरणों से मुक्ति पाने को 
जीव -वास्तु वैज्ञानिक दृष्टी से  समाज के विकास में घास से लेकर देव तक  की सृष्टि  क्रम को खूब चित्रण करते हैं.